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शिक्षा 'सुधार' पर पीछे खींचे कदम

काफी विरोध के बीच गुजरात सरकार ने मेधावी छात्र-छात्राओं के लिए विशेष विद्यालय स्थापित करने की योजना को रद्द कर दिया

सबक गुजरात में मेधावी छात्र-छात्राओं के लिए अब एक नई स्कॉलरशिप
सबक गुजरात में मेधावी छात्र-छात्राओं के लिए अब एक नई स्कॉलरशिप
अपडेटेड 21 जून , 2023

राज्य सरकार ने गुजरात में नया शैक्षणिक सत्र शुरू होने से महज कुछ दिन पहले एक आश्चर्यजनक कदम उठाया. उसने अपनी महत्वाकांक्षी और विवादित ज्ञान सेतु डे स्कूल योजना को रद्द कर दिया. उसके तहत मेधावी छात्र-छात्राओं के लिए विशेष स्कूल शुरू करने की तैयारी थी. सरकार ने उसकी जगह उसी नाम से नई छात्रवृत्ति योजना की घोषणा की है. इस मुख्यमंत्री ज्ञान सेतु मेरिट स्कॉलरशिप योजना का लक्ष्य छठी से लेकर 12वीं कक्षा के 30,000 मेधावी छात्रों को लाभ देना है. अगले सात साल के लिए सभी कक्षाओं के लाभार्थी छात्र-छात्राओं की पहचान के बाद राज्य को सरकारी खजाने से सालाना 500 करोड़ रुपए खर्च करने होंगे. इसकी पात्रता के लिए जरूरी होगा कि बच्चों ने प्राथमिक शिक्षा (कक्षा 1 से 5 तक) किसी सरकारी या वित्त पोषित (जीआइए) स्कूल से पूरी की हो. स्कूल का चयन उनकी पसंद पर निर्भर है. वे अपनी पसंद के स्कूल में पढ़ाई जारी रख सकेंगे या चाहें तो किसी निजी स्कूल में भी प्रवेश ले सकते हैं. वैसे उस मामले में शर्तें काफी बदल जाएंगी.

इसके उलट, पिछली योजना के तहत कक्षा-5 के बाद मेधावी छात्रों को सरकारी और जीआइए स्कूलों से नए द्विभाषी-माध्यम ज्ञान सेतु डे स्कूलों में भेजा जाना था. उन्हें 12वीं कक्षा तक मुफ्त शिक्षा मिलती. प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी पर भी ध्यान दिया जाता. हर तालुका में कम-से-कम एक ऐसे स्कूल के साथ करीब 400 स्कूलों की कल्पना की गई थी. इसके लिए मौजूदा निजी स्कूल भी आवेदन कर सकते थे. 2023-24 के लिए निर्धारित 64 करोड़ रुपए के बजट के साथ, उन्हें सरकार से हर साल प्रति बच्चा 20,000 रुपए मिलने थे. शिक्षा विभाग ने 27 अप्रैल को एक प्रवेश परीक्षा भी आयोजित की थी, जिसमें पांचवीं कक्षा के 4,65,000 छात्र शामिल हुए थे.

फिर, सरकार उससे पीछे क्यों हटी? वह कूटनीतिक ढंग से इसे सही ठहराने की कोशिश कर रही है, पर रद्द योजना की पृष्ठभूमि को देखें तो कुछ संकेत मिलते हैं. जनवरी, 2023 में घोषित वह नीति सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) मॉडल पर आधारित थी और इस पर पूरे राज्य के सरकारी स्कूलों और शिक्षकों ने गहरा रोष जताया था. उनकी नजर में वह स्कूली शिक्षा के निजीकरण की चाल थी. उनकी मुख्य चिंता थी—जब पहले से सरकार और जीआइए स्कूलों का मजबूत नेटवर्क है तो इस राशि को उसमें लगाने के बजाए, नए स्कूल बनाने और उन्हें फंड करने पर क्यों खर्च किया जाएगा? गुजरात माध्यमिक एवं उच्चतर माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के सदस्य प्रियवदन कोराट कहते हैं कि जीआइए स्कूलों को दसवीं कक्षा के उनके नतीजों के आधार पर अनुदान मिलता है. उनके अनुसार, ''अगर मेधावी छात्र वहां से बाहर हो जाते तो सैकड़ों स्कूल अनुदान के योग्य नहीं रह पाते और अंतत: बंद हो जाते.''

सरकार के कदम पीछे खींचने के बावजूद, कोराट और सरकारी तथा वित्त पोषित स्कूलों के तीन लाख से अधिक शिक्षण और गैर-शिक्षण कर्मचारियों की यूनियनें सशंकित हैं. नई योजना के तहत, सरकारी या जीआइए स्कूल में पढ़ने वाले छात्र को छठी से लेकर आठवीं कक्षा तक 5,000 रुपए, नौवीं और दसवीं कक्षा में 6,000 रुपए और 11वीं तथा 12वीं कक्षा में 7,000 रुपए सालाना छात्रवृत्ति मिलेगी. अगर छात्र किसी निजी स्कूल में प्रवेश लेता है तो यही राशि बढ़कर क्रमश: 20,000 रुपए, 22,000 रुपए और 25,000 रुपए सालाना हो जाएगी. कोराट कहते हैं, ''निजी स्कूल के बच्चों को चार गुना छात्रवृत्ति देने का मतलब निजी शिक्षा को बढ़ावा देना है. इसके बजाए सरकार को अपने संस्थानों में निवेश पर ध्यान देना चाहिए.''

गुजरात में 32,000 सरकारी स्कूलों और 7,000 जीआइए स्कूलों का अच्छा-खासा नेटवर्क है. इसकी तुलना में निजी स्कूलों की संख्या करीब 14,000 है, जो गुणवत्ता और स्थानिक वितरण के लिहाज से पीछे हैं. इसे ही डे स्कूल योजना रद्द किए जाने का प्रमुख कारण बताया जा रहा है. योजना के तहत अर्हता के लिए अन्य मानदंडों के अलावा यह भी अनिवार्य था कि पिछले पांच में से तीन साल में संबंधित स्कूल के दसवीं कक्षा के 80 फीसद छात्रों ने अपने पहले ही प्रयास में परीक्षा उत्तीर्ण की हो. जब निजी स्कूलों ने आवेदन शुरू किया तो पता चला कि 225 तालुकाओं में से 139 यानी 63 फीसद इस मानदंड पर खरे नहीं उतर रहे थे. वहीं, सियासी चुनौती भी कम नहीं थी, स्थानीय दबंगों ने मंत्रियों-अधिकारियों पर अपने स्वामित्व वाले स्कूलों को चुनने का दबाव बनाना शुरू कर दिया था.

भूपेंद्र पटेल के नेतृत्व वाली सरकार ने अंतत: इसे ठंडे बस्ते में डालने का फैसला लिया. सरकार अगले साल आम चुनाव से पहले हजारों शिक्षकों को नाराज नहीं करना चाहती. शिक्षा विभाग के 7 जून के प्रस्ताव में कहा गया, ''कुछ तालुकाओं में कई स्व-वित्तपोषित स्कूल योग्यता मानदंडों को पूरा करते हैं, पर कुछ में ऐसे इक्का-दुक्का स्कूल ही हैं या फिर नहीं भी हैं.'' ऐसे में कुछ तालुकाओं के मेधावी छात्रों को ''पढ़ाई के लिए हर दिन लंबी यात्रा करनी पड़ती, जो उचित नहीं.''

वहीं, कांग्रेस प्रवक्ता मनीष दोशी ने कहा, ''सरकार ने ज्ञान सेतु योजना अभी भले वापस ले ली. पर चुनाव बाद उसे दूसरी तरह से लाया जा सकता है.'' इसे शिक्षा के निजीकरण का नाकाम प्रयास करार देते हुए दोशी ने कहा, ''यह एक खतरनाक मानसिकता है जो समाजवादी व्यवस्था को खत्म करके बेहद खर्चीली और आम लोगों की पहुंच से दूर निजी शिक्षा को बढ़ावा देना चाहती है.'' इसके जवाब में सरकार का दावा है कि 2023-24 में 100 स्वामी विवेकानंद ज्ञान शक्ति आवासीय विद्यालय खुलने वाले हैं, और इसमें से हर विद्यालय में 300 छात्रों को छठी कक्षा में लिया जाएगा, जिनमें 50 आदिवासी बच्चे भी होंगे. सैनिक स्कूलों की तर्ज पर इस शैक्षणिक सत्र में 10 रक्षा शक्ति आवासीय विद्यालय भी खुलेंगे जिसमें 500 छात्रों के पढ़ने की व्यवस्था होगी. इसके लिए 100 करोड़ रुपए का वार्षिक बजट अलग रखा गया है. 

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