पश्चिम बंगाल में मार्च 2023 में होने वाले पंचायत चुनावों को 2024 के संसदीय चुनावों के रिहर्सल के रूप में देखा जा रहा है. ऐसे में ग्रामीण मतदाताओं को लुभाने के लिए भाजपा को एक विश्वसनीय बंगाली चेहरे की तलाश थी. आखिरकार पार्टी ने फिल्म स्टार उद्यमी, समाजसेवी और नए-नवेले राजनेता मिथुन चक्रवर्ती पर दांव लगाने का फैसला किया. हालांकि, भाजपा के इस चयन के पीछे असली कारण है मिथुन के अपने गृह राज्य में उनके प्रति लोगों का जबरदस्त आकर्षण. इस भूमिका को 72 वर्षीय मिथुन पूरी गंभीरता से निभा रहे हैं. वे भगवा पार्टी की विचारधारा की बातें कर रहे हैं, आदिवासी घरों में खाना खा रहे हैं और लोगों से कह रहे हैं कि बंगाल में भाजपा की सरकार बनती है, तो राज्य में ''बेशुमार निवेश'' आएगा. अक्तूबर में मिथुन को राज्य भाजपा की 20 सदस्यीय कोर कमेटी में शामिल किया गया था. उन्हें बड़े स्तर पर प्रोजेक्ट करने का प्रयास कुछ महीने पहले शुरू हुआ, जब पार्टी ने उन्हें उत्तर बंगाल सहित कई जिलों में भाजपा के दुर्गा पूजा पंडालों का उद्घाटन करने के लिए भेजा.
हालांकि, मिथुन की उपस्थिति से थोड़ी भीड़ आ रही है, लेकिन पार्टी को ऐसी परेशानियों से भी निबटना पड़ रहा है जो मिथुन की वजह से खड़ी हुई हैं. मसलन, उनका एक बयान, जिसमें उन्होंने कहा कि तृणमूल कांग्रेस सरकार का मुकाबला करने का एकमात्र तरीका यही है कि सारे विपक्षी दल एकजुट होकर महागठबंधन या महाजोत (शायद माकपा, कांग्रेस और भाजपा का गठबंधन) बनाएं. प्रदेश भाजपा अध्यक्ष सुकांत मजूमदार और पार्टी सांसद दिलीप घोष ने ऐसे गठबंधन की संभावनाओं को खुले तौर पर खारिज कर दिया है. फिर भी, पिछले महीनों में मिथुन ने कई बार कहा है कि कई तृणमूल विधायक, जो भाजपा में शामिल होना चाहते थे, उनके संपर्क में थे. लेकिन दूसरे दलों से आए लोग भाजपा के लिए फायदेमंद साबित नहीं हुए हैं.
हालांकि, 2021 के बंगाल विधानसभा चुनाव से ऐन पहले भाजपा में शामिल हुए मिथुन स्टार प्रचारक के रूप में कोई खास फायदा नहीं पहुंचा सके, लेकिन पार्टी को उनकी वजह से तस्वीरें जरूर अच्छी मिल गईं. हालांकि, उन्हें देखने उमड़ी भीड़ ने पार्टी के लिए कुछ माहौल तो बनाया, लेकिन उतना नहीं जितनी भाजपा को उम्मीद थी. बांकुड़ा, पुरुलिया, पश्चिम मेदिनीपुर और झारग्राम में अच्छी-खासी आदिवासी आबादी है. कुल 43 विधानसभा सीटों वाले इस क्षेत्र में मिथुन ने बहुत प्रचार किया, लेकिन तृणमूल को यहां 25 सीटें मिलीं, जबकि भाजपा को मात्र 18.
राजनेता के रूप में मिथुन के पास अनुभव की कमी है, लेकिन 40 से अधिक वर्षों से ग्रामीण और शहरी, दोनों क्षेत्रों में उनकी लोकप्रियता कायम है. इसलिए बंगाल में दमदार स्टार पावर की तलाश में जुटी भाजपा के लिए वे एक स्वाभाविक पसंद हैं. खासकर तब, जब सौरव गांगुली ने पार्टी की उम्मीदें तोड़कर राजनीति में से आने से मना कर दिया. मिथुन का साथ मिलने का एक फायदा यह भी है कि भाजपा को ''बाहरी'' लोगों की पार्टी बताने के तृणमूल के पुराने आरोप की हवा निकल जाती है. मिथुन ने इतनी लोकप्रिय बंगाली फिल्में की हैं कि उन्हें बाहरी नहीं कहा जा सकता. साथ ही, वे दशकों से राज्य में धर्मार्थ और परोपकारी कार्य कर रहे हैं, जिसकी सराहना होती रही है. बंगाली मनोरंजन क्षेत्र में भी वे लगातार मौजूद रहे हैं. उनके कई रियलिटी शो खूब पसंद किए गए. उनका नाम उत्तर कोलकाता की मतदाता सूची में दर्ज है.
मिथुन की बेबाकी और सरलता भले ही बहुत लोगों को पसंद हो, लेकिन जहां तक राजनीतिक विचारधारा का प्रश्न है, उन्होंने हर नाव में पांव रखा है. युवावस्था में वे कट्टरपंथी नक्सल राजनीति में सक्रिय थे. बंगाल में वामपंथी दलों के 34 साल के शासन के दौरान वे उनके करीब थे. कुछ समय तक वे तृणमूल के भी साथ थे और 2014 से 2016 तक उसके राज्यसभा सांसद रहे. मार्च 2021 में वे भाजपा में शामिल हो गए.
मिथुन के अलावा, भाजपा के सबसे विश्वसनीय स्टार नेता प्रतिपक्ष शुवेंदु अधिकारी रहे हैं. आक्रामक और निडर शुवेंदु ममता और उनकी पार्टी की दबंग रणनीति के खिलाफ मजबूती से खड़े रहे. लेकिन वे एक राजनीतिक बाहुबली हैं. मिथुन में पार्टी नयापन देखती है. कपड़ों से लेकर फिल्मी संवादों से भरपूर भाषणों तक, वे उस नायक के अंदाज में दिखते हैं जो दर्शकों के लिए सिनेमा का पर्दा फाड़कर निकल आया है. भाजपा इस छवि को भुनाना चाहती है. उसे लगता है कि मिथुन के स्टारडम का जादू लोगों को उसके पक्ष में ईवीएम का बटन दबाने के लिए विवश कर देगा.
हालांकि, मिथुन के विपक्षी खेमे में होने से तृणमूल बहुत चिंतित नहीं दिखती. पार्टी प्रवक्ता कुणाल घोष ने हाल ही में याद दिलाया कि करीब एक साल पहले ही मिथुन ने विधानसभा चुनावों में अपनी पूरी ताकत लगा दी थी, लेकिन वे तृणमूल को प्रचंड बहुमत हासिल करने से नहीं रोक पाए. उन्होंने यह भी दावा किया कि मिथुन निजी फायदे के लिए भाजपा में शामिल हुए हैं. बयानबाजी एक तरफ, तृणमूल किसी भी हालत में विपक्षी दल को पांव पसारने का कोई मौका नहीं देना चाहती. पुरुलिया में मिथुन की रैली के ठीक एक हफ्ते बाद, 1 दिसंबर को तृणमूल की महुआ मोइत्रा और बाबुल सुप्रिया ने भी एक रैली की.

