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मुकाबला तीरों और तलवारों में

जनमानस में अवधारणा की लड़ाई शिवसेना की विरासत हासिल करने के लिए जारी कानूनी लड़ाई पर भारी पड़ सकती है

गई विरासत हाथ से : मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे शिवसेना का पुराना चुनाव चिन्ह धनुष-बाण हाथ में लिए हुए
गई विरासत हाथ से : मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे शिवसेना का पुराना चुनाव चिन्ह धनुष-बाण हाथ में लिए हुए
अपडेटेड 18 अक्टूबर , 2022

अब शिवसेना नहीं रही. या कह सकते हैं कि फिलहाल उसका भविष्य अधर में लटक गया है. सोमवार 10 अक्तूबर को चुनाव आयोग ने उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे की अगुआई वाले परस्पर-विरोधी गुटों को अलग-अलग नाम का आवंटन करके इस 56 साल पुरानी पार्टी के विभाजन पर मुहर लगा दी. इसके साथ ही आयोग ने अंतरिम उपाय के रूप में दोनों को 'असली' शिवसेना होने के अधिकार से वंचित कर दिया. यह विवाद जून में शिंदे की ओर से हुए तख्तापलट के साथ शुरू हुआ. इसके तहत उद्धव के नेतृत्व वाली महाराष्ट्र विकास अघाड़ी सरकार को गिरा दिया गया था और भारतीय जनता पार्टी ने चौंकाते हुए आखिरी मिनट के फैसले में बागियों के नेता शिंदे को मुख्यमंत्री बना दिया था.

अब उद्धव गुट को जलती मशाल चुनाव चिन्ह के साथ शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) नाम से जाना जाएगा, वहीं शिंदे गुट को बालासाहेबांची शिवसेना (बालासाहेब की शिवसेना) नाम और तलवार ढाल चुनाव चिन्ह मिला है. पार्टी का पुराना चुनाव चिन्ह धनुष-तीर दोनों में से किसी के पास नहीं रहेगा.  

लेकिन शिवसेना और उनके संस्थापक बाल ठाकरे की विरासत की जंग अभी खत्म नहीं हुई है. 23 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने उद्धव और शिंदे के नेतृत्व वाले गुटों की ओर से दायर याचिकाओं को पांच न्यायधीशों की पीठ को सौंप दिया. इन याचिकाओं में दलबदल, विलय और अयोग्यता से जुड़े संवैधानिक प्रश्नों को उठाया गया है. यह मामला अभी भी सुप्रीम कोर्ट में है लेकिन अदालत ने उद्धव गुट की एक याचिका को खारिज कर दिया था जिसमें चुनाव आयोग को पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह पर शिंदे टीम के दावे पर फैसला लेने से रोकने की मांग की गई थी. 

चुनाव आयोग यह फैसला लेने में असमर्थ था कि दोनों में से कौन पुरानी मूल पार्टी का प्रतिनिधित्व करता है. ऐसे में उसने दोनों गुटों को 3 नवंबर को होने वाले अंधेरी ईस्ट के उपचुनाव में पुरानी पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह का इस्तेमाल करने से रोक दिया. शिंदे को पार्टी के 55 विधायकों में से 40 और 22 सांसदों में 12 का समर्थन हासिल है, वहीं उद्धव को ज्यादातर पदाधिकारियों का समर्थन है. मुख्यमंत्री के गुट को एक और दिन का इंतजार करना पड़ा क्योंकि चुनाव चिन्ह के लिए उनके सभी तीनों पसंदीदा विकल्पों को खारिज कर नए सिरे से विकल्प मांगे गए थे.

पार्टी को नया नाम आवंटित होने के बाद शिंदे ने ट्विटर पर लिखा कि इससे साबित हुआ, ''हम बालासाहेब के विचारों के उत्तराधिकारी हैं.'' पहली नजर में लगता है कि उद्धव ने बालासाहेब के नाम से मशहूर अपने पिता की विरासत पर एकमात्र अपना दावा होने का अवसर खो दिया है. लेकिन उनके करीबी सहयोगी और लोकसभा सदस्य अरविंद सावंत का दावा है कि शिवसेना के समर्थक ''बहुत जल्द'' ही खुद को उद्धव की टीम के साथ जोड़ना शुरू कर देंगे. वे कहते हैं, ''हर कोई जानता है कि शिवसेना का मतलब बालासाहेब ठाकरे है. और उद्धव जी उनके असली वारिस हैं.''

चुनाव आयोग को सौंपी गई तीन प्राथमिकताओं में दोनों गुटों की पहली पसंद यही थी कि उन्हें शिवसेना (बालासाहेब ठाकरे) नाम दिया जाए. उद्धव अपने गुट के प्रस्तावित नामों की सूची साझा करने के लिए 9 अक्तूबर को सोशल मीडिया पर लाइव आए. वहीं शिंदे ने अपने भरोसेमंद सहयोगियों के साथ विचार-विमर्श किया. दोनों की पहली पसंद एक ही होने की वजह से आयोग ने अगले दिन दोनों को उनकी अपनी-अपनी दूसरी पसंद को आवंटित किया. राजनीतिक विश्लेषक हेमंत देसाई कहते हैं, ''बालासाहेब की शिवसेना नाम से ही पता चलता है कि यह उस महान शख्स की विरासत से जुड़ी हुई है.'' लेकिन वे तुरंत जोड़ते हैं, ''यह केवल धारणा है. आगामी चुनावों में दोनों गुटों के प्रदर्शन पर ही यह निर्भर करेगा कि असली राजनीतिक उत्तराधिकारी कौन है.''

दोनों गुटों की पहली परीक्षा 3 नवंबर का उपचुनाव है. यह उपचुनाव अगले कुछ महीनों में मुंबई और ठाणे समेत संसाधनसंपन्न 15 नगर निगमों और 200 नगर परिषदों तथा 30 जिला परिषदों के होने वाले चुनावों से पहले है. उद्धव के बेटे आदित्य ने ऐलान किया है कि आने वाले दिनों में उनका गुट हर घर में अपना 'जलती मशाल' चुनाव चिन्ह लेकर जाएगा. ऐसी संभावना है कि यह गुट पूर्व विधायक रमेश लटके की विधवा ऋतुजा लटके को मैदान में उतारेगा. रमेश की मौत की वजह से ही यहां उपचुनाव हो रहा है. शिंदे गुट अभी तक तय नहीं कर पाया है कि वह यहां अकेले चुनाव लड़े या भाजपा के साथ मिलकर. पूरी संभावना है कि दोनों पार्टियां कोई साझा प्रत्याशी उतारेंगी, पर यह अभी साफ नहीं कि वह उम्मीदवार बालासाहेबांची शिवसेना का होगा या भाजपा का.

दांव बहुत ऊंचे हैं. जनमानस के बीच धारणा की इस लड़ाई का नतीजा 'विरासत' के दावे की चल रही कानूनी लड़ाई पर भारी पड़ सकता है. उद्धव समर्थक जलती मशाल के साथ शिवसेना के पहले ''भाग्यशाली'' प्रयास की ओर ध्यान दिलाते हैं, जब छगन भुजबल ने इसी चिन्ह से 1985 में विधानसभा चुनाव जीता था. भुजबल अब राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के नेता हैं. उन दिनों शिवसेना का कोई एक तय चुनाव चिन्ह नहीं था, ऐसे में उसके नेताओं ने अलग-अलग चिन्हों पर चुनाव लड़ा था. भुजबल पार्टी के एकमात्र नेता थे जिन्होंने जीत हासिल की. पार्टी को आखिरकार 1989 में 'धनुष-तीर' चुनाव चिन्ह मिला. अब देखना है कि क्या जलती मशाल मुश्किलों से जूझते संगठन की संभावनाओं को रोशन कर सकेगी और उद्धव को पिता की विरासत बचाए रखने में मदद करेगी?

वहीं, शिंदे और भाजपा की हार दोनों के लिए बहुत बड़ी शर्मिंदगी होगी. लेकिन उद्धव की नाकामी उनके सियासी करियर के अंत की शुरुआत हो सकती है.

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