'इंडिया, हिंडिया नहीं'. उसी भूभाग से 1960 के दशक में अलगाववाद की हद तक विरोध का जो राग छेड़ा गया था, उसी का यह नरम और बदला हुआ संस्करण है. पर राष्ट्रीय भाषा के रूप में हिंदी को अस्वीकार करने की दृढ़ता अभी भी वैसी ही है. एक और अलहदा बात: तमिलनाडु इस बार अकेला नहीं है. इस बीच छह दशकों में इस बात की जागरूकता बढ़ी है कि भारत विविध भाषाई संस्कृतियों का समृद्ध भंडार है. एकरूपता और आंतरिक औपनिवेशिक राष्ट्र की पुरानी अवधारणा की बजाए, इस समृद्धि को अब आधिकारिक दर्जा प्रदान करने का विचार अधिक से अधिक भारतीयों के मुफीद बैठता है. इस तरह, तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने समान भाषा अधिकार अभियान को विपक्षी खेमे तक पहुंचा दिया है.
स्टालिन ने आठवीं अनुसूची में शामिल सभी 22 भाषाओं को हिंदी के समान केंद्र सरकार की आधिकारिक (राजभाषा) बनाने के बड़े सुधार की मांग की है. इस मांग का तमिलनाडु से बाहर भी असर हो रहा है. कई गैर-हिंदी भाषी राज्यों के मुख्यमंत्रियों और अन्य नेताओं ने ऐसी ही मांग उठाई है. वे अपनी भाषाओं के लिए वही दर्जा चाहते हैं जो हिंदी को मिला है. तमिलनाडु के अलावा, कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल में यह भावना फैल गई है. 'स्टॉप हिंदी इम्पोजिशन' जैसे सामूहिक ट्विटर अभियान शुरू किए गए हैं और कैम्पेन फॉर लैंग्वेज इक्वलिटी ऐंड राइट्स जैसे नए संघीय संगठन बनाए गए हैं.
सूरत में 14 सितंबर को अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन में हिंदी को लेकर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के बयान के बाद स्टालिन ने यह मांग उठाई है. हिंदी दिवस पर शाह ने कहा कि अन्य भारतीय भाषाएं तभी समृद्ध होंगी जब हिंदी समृद्ध होगी और यह दोनों ओर से होगा. शाह ने 'सह-अस्त्वि' की बात की और हिंदी के साथ-साथ स्थानीय भाषाओं को मजबूत करने की जरूरत पर जोर देते हुए दावा किया कि मराठी तथा तमिल जैसी अन्य भाषाओं को हिंदी के खिलाफ खड़ा करने के लिए 'दुष्प्रचार' अभियान चल रहा था. पर उनके बयान को 'राष्ट्रीय भाषा' के पुराने ढर्रे को ही पुष्ट करने वाला माना गया. स्टालिन को शाह का यह कहना चिंताजनक लगा कि भारत की संस्कृति और इतिहास की आत्मा को समझने के लिए लोगों को हिंदी सीखनी चाहिए. वे कहते हैं, ''यह प्रभुत्व स्थापित करने का खुला संकेत है.'' वे 'हिंदी दिवस' को 'भारतीय भाषा दिवस' में बदलने का सुझाव भी देते हैं.
स्टालिन कहते हैं कि केंद्र सरकार नई शिक्षा नीति के जरिए हिंदी और संस्कृत को अन्य राज्यों पर थोपने के लिए बेचैन है. उनका कहना है कि केंद्र अगर क्षेत्रीय भाषाओं के बारे में वास्तव में चिंतित है, तो उसे पहले अन्य भाषाओं और संस्कृत तथा हिंदी के प्रचार के लिए धन आवंटन में असमानता दूर करनी चाहिए. भारतीय भाषाओं के प्रोत्साहन के लिए आवंटित धन में केंद्रीय बजट 2022 में बड़ी गिरावट आई है. 2022-23 में यह गिरकर 250 करोड़ रुपए रह गया है. वर्ष 2019-20 में इस मद में 561.47 करोड़ रुपए आवंटित हुए थे.
इसमें से अधिकांश राशि राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान और केंद्रीय हिंदी संस्थान को अनुदान के रूप में जाती है. राष्ट्रीय उर्दू भाषा विकास परिषद, राष्ट्रीय सिंधी भाषा विकास परिषद, केंद्रीय शास्त्रीय तमिल संस्थान, और 'भारतीय भाषाओं में गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा हेतु राष्ट्रीय पहल' को इसका बहुत कम हिस्सा मिलता है. संस्कृत को छोड़कर अन्य पांच शास्त्रीय भारतीय भाषाओं—तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम और ओड़िया—के विकास पर सरकार बहुत कम निवेश करती है.
गैर-हिंदी भाषी राज्यों में, खासकर युवाओं के बीच, 'एक राष्ट्र, एक भाषा' नीति के प्रति बढ़ती नाराजगी एक नई चिंता का विषय है. वहां इसे भाषाई साम्राज्यवाद के रूप में देखा जा रहा है. सभी भारतीय भाषाओं को समान दर्जा देने की उनकी मांग अब तीखी हो रही है. इस स्थिति के तब तक बने रहने की संभावना है जब तक कि केंद्र सरकार अपना रुख सुधार न ले.
कर्नाटक में, यहां तक कि भाजपा सरकार को इस भावना के आगे झुकना पड़ा. राज्य विधानमंडल के चालू सत्र के दौरान सरकार स्कूल-कॉलेजों में कन्नड़ को शिक्षा का माध्यम बनाने और सरकारी तथा निजी क्षेत्रों में कन्नड़भाषियों को आरक्षण देने के लिए 'कन्नड़ भाषा व्यापक विकास विधेयक' पेश करने वाली है. वहां के मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई कहते हैं, ''कोई भी इस राज्य में कोई दूसरी भाषा थोपने पर जोर नहीं दे सकता.'' चेन्नै के संघीय और भाषा अधिकार कार्यकर्ता आझी सेंथिलनाथन कहते हैं, ''स्टालिन ने जो आवाज उठाई है वह संवैधानिक समानता की बात है. यही अधिकतर गैर-हिंदी राज्यों के नेताओं की असल आवाज है.''

