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पायलट की चुनौती

सचिन पायलट ने गुर्जरों के नेता रूप में खुद को स्थापित किया था, लेकिन अब उन्हें पार्टी के भीतर से ही चुनौती मिल रही है

भारी विरोध : राजस्थान के मंत्री अशोक चांदना के साथ भीड़ ने पुष्कर  के कार्यक्रम में दुर्व्यवहार किया. उन्होंने पायलट समर्थकों को इसका जिम्मेदार ठहराया
भारी विरोध : राजस्थान के मंत्री अशोक चांदना के साथ भीड़ ने पुष्कर के कार्यक्रम में दुर्व्यवहार किया. उन्होंने पायलट समर्थकों को इसका जिम्मेदार ठहराया
अपडेटेड 26 सितंबर , 2022

वहां का माहौल गमगीन, पर सियासी रूप से अहम था. 12 सितंबर को गुर्जर समुदाय के लोग राजस्थान में गुर्जरों के लिए आरक्षण की मांग उठाने और उसके आंदोलन का नेतृत्व करने वाले कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला की श्रद्धांजलि सभा में भाग लेने जयपुर से करीब 150 किलोमीटर दूर पुष्कर पहुंचे थे. लेकिन जो मौका गुर्जरों की ताकत दिखाने का हो सकता था, वह इसी समुदाय के दो कैबिनेट मंत्रियों के साथ भीड़ के दुर्व्यवहार के चलते बदमजा हो गया. इसके साथ ही समुदाय के भीतर की फूट सामने आ गई. गुर्जर समुदाय राजस्थान की 200 सदस्यीय विधानसभा की कम से कम एक दर्जन सीटों पर चुनाव परिणामों को प्रभावित करता है. इस घटनाक्रम ने खुद को गुर्जरों के निर्विवाद नेता के रूप में स्थापित कर लेने वाले राज्य के पूर्व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट के सामने एक नई चुनौती खड़ी कर दी है.

करीब डेढ़ दशक पहले सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी बैंसला ने गुर्जरों को एकजुट करने की पहल शुरू की थी, तब तक गुर्जरों का कोई सर्वमान्य नेता नहीं था. बैंसला ने राजस्थान में समुदाय के लिए विशेष दर्जे की मांग के आंदोलन का नेतृत्व किया. आरक्षण आंदोलन के लिए गुर्जरों को एकजुट करने में वे सफल हुए, पर वे इसका सियासी लाभ नहीं उठा सके. 2009 में भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़कर वे कम अंतर से लोकसभा चुनाव हार गए थे. 

बाद में सचिन पायलट ने समुदाय के लोकप्रिय जननेता के रूप में उभरकर इस रिक्त स्थान को भरा. 2014 में राजस्थान कांग्रेस का अध्यक्ष नियुक्त किए जाने के बाद उन्होंने 2018 में पार्टी की जीत में अहम भूमिका निभाई और उपमुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली. लेकिन 2020 में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के खिलाफ तख्तापलट की कोशिश में उन्हें दोनों पद गंवाने पड़े. अब पार्टी के दोनों नेताओं के बीच प्रतिद्वंद्विता के नतीजतन गुर्जर समुदाय के भीतर अशोक चांदना के रूप में एक नया शक्तिकेंद्र उभरा है. 38 वर्षीय चांदना, गहलोत मंत्रिमंडल में सबसे कम उम्र के सदस्य हैं.

पुष्कर में 12 सितंबर को बैंसला के अस्थि विसर्जन के मौके पर चांदना मौजूद थे. उन्हें दिवंगत गुर्जर नेता (जिनका 31 मार्च को निधन हुआ था) के बेटे और भाजपा नेता विजय सिंह ने निमंत्रित किया था. श्रद्धांजलि सभा के भाषणों ने जल्द ही सियासी रंग लेना शुरू कर दिया और भाजपा नेताओं के बोलने पर भीड़ उनकी जय-जयकार कर रही थी.

हालात और खराब तब हुए जब चांदना के बोलना शुरू करते ही जूते और खाली बोतलें हवा में उछाली जाने लगीं. इसके बाद, भीड़ के एक हिस्से ने बोलने के लिए उठी उद्योग मंत्री शकुंतला रावत को भी बुरा-भला कहा. पायलट के पक्ष में भी नारे सुने गए. अराजकता बढ़ने के साथ ही वहां मौजूद राजस्थान पर्यटन विकास निगम (आरटीडीसी) के अध्यक्ष धर्मेंद्र राठौर और मुख्यमंत्री के बेटे वैभव गहलोत सहित सभी कांग्रेसी नेता कार्यक्रम छोड़कर बाहर आ गए.

पुष्कर प्रकरण पर रावत ने कोई टिप्पणी नहीं की, जबकि राठौर ने किसी का नाम लिए बिना कहा है कि 'गुंडे' बिना किसी शह के दो मंत्रियों के साथ दुर्व्यवहार करने की हिम्मत नहीं कर सकते. वहीं, पार्टी और गुर्जर समुदाय में अपना दबदबा बना चुके पहली पीढ़ी के राजनेता चांदना ने स्पष्ट कर दिया है कि वे इस अपमान को चुपचाप बर्दाश्त नहीं करेंगे. उन्होंने पायलट को खुली चुनौती देते हुए कहा कि पायलट समर्थक पिछले दो साल से उन्हें निशाना बनाने की कोशिश कर रहे हैं. उन्होंने ट्विटर पर लिखा, ''अगर सचिन पायलट मुझ पर जूता फेंककर मुख्यमंत्री बन सकते हैं, तो वे जल्द ही ऐसा कर लें क्योंकि मैं उनसे टकराने के मूड में नहीं हूं. जिस दिन मैं लड़ाई पर उतारू होऊंगा, हम दोनों में से कोई एक ही बचेगा, और मैं ऐसा नहीं चाहता.''

कभी पायलट के करीबी माने जाने वाले चांदना ने 2020 में गहलोत का समर्थन किया. उनका कहना है, ''तब से पायलट समर्थक मुझ पर निशाना साध रहे हैं. गहलोत को मुख्यमंत्री बनाकर उनका समर्थन करना आलाकमान का फैसला था. मैंने बस एक सच्चे कांग्रेसी की तरह इसका पालन किया.'' उन्होंने यह भी कहा कि, पुष्कर की घटना 'पूर्व नियोजित' थी.

मुख्यमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा पाले पायलट ने चुप्पी साध रखी है. भाजपा नेता इस घटनाक्रम का लाभ लेते हुए पायलट का समर्थन कर रहे हैं और उनका दावा है कि कांग्रेस ने उन्हें मुख्यमंत्री बनने से वंचित किया जिससे पायलट समर्थकों में नाराजगी थी. गहलोत खेमा इस समर्थन को भाजपा नेताओं से पायलट का संपर्क बने रहने के 'सबूत' के रूप में में देखता है. पायलट के सहयोगी इसे अगले साल विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस को बांटने के प्रयास के रूप में देखते हैं.

जहां तक गुर्जरों में फूट का प्रश्न है, विजय सिंह कहते हैं कि कुछ ऐसे नेता हैं जो इस धारणा को चुनौती देते हैं कि पायलट समुदाय के एकमात्र नेता हैं. पुष्कर में हुई गड़बड़ का अर्थ है कि समुदाय तीखे विभाजन की ओर बढ़ सकता है और दूसरे गुर्जर नेता भी अब अपना आधार बचाने की कोशिश में जुट सकते हैं. पायलट के लिए इसका मतलब पार्टी और समुदाय दोनों जगहों पर एक नई चुनौती है.

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