अरुण पुरी
कोविड-19 के हमारे शब्दकोष में दाखिल होने से बहुत पहले कैंसर 'बिग सी’ था. अज्ञात कुलशील के उस वायरस के चुपचाप हमारे इतिहास में आ धमकने—या आम सर्दी-जुकाम की तरह निरीह सर्वव्यापी बन जाने—के बहुत बाद भी कैंसर के रहस्य डरावने ढंग से मंडराएंगे. महामारी के दौरान यह रहस्यमयी केकड़ा खामोशी से कीमत वसूल रहा था.
2020 में भारत में कैंसर से करीब 8,00,000 लोग मारे गए, जो कोविड की भेंट चढ़े लोगों के मुकाबले करीब सात गुना ज्यादा थे. ये आंकड़े हमारे लिए कोड रेड स्तर की चेतावनी और सतर्कता की वजह हैं, क्योंकि कैंसर हालांकि किसी भी तरह खालिस आधुनिक यंत्रणा नहीं है, पर हमारे वक्त में इसका बढ़ता ग्राफ अवसादपूर्ण ढंग से महामारी के ग्राफ से मिलता-जुलता है.
यहां कुछ बड़े और गंभीर आंकड़े हैं, जो इस जानलेवा दैत्य की कद-काठी का खाका खींचने में मदद करेंगे. 1990 में कैंसर ने भारत में 3,82,000 लोगों की जान ली. 2016 तक यह आंकड़ा दोगुना हो चुका था. कैंसर के मामलों में सालाना बढ़ोतरी के खालिस आंकड़े भी इसी के अनुरूप दिखाई देते हैं, जो 1990 में 5,48,000 से बढ़कर 2016 में 11.6 लाख हो गए. दरअसल, पूर्वानुमान के हर स्तर पर आंकड़े दोगुने होते मालूम देते हैं—तकरीबन उसी तरह जैसे कैंसर की कोशिकाएं कई गुना बढ़ती हैं. 2025 तक भारत में तकरीबन 3 करोड़ या हमारी समूची आबादी के करीब 2 फीसद मामले होंगे.
हाल तक लोग कैंसर का पता चलते ही इसे मौत का परवाना मान लेते थे, तो इसकी दो वजहें थीं. एक, जहां कैंसर से जुड़ी विकृतियों का खाका अच्छी तरह खींच लिया गया है, उसकी पैदाइश अब भी उन्नत से उन्नत विज्ञान की पकड़ से बाहर है. इसे जन्म देने वाले कई आनुवंशिक और पर्यावरणीय कारणों की पहचान कर ली गई है.
फिर भी इस बीमारी में अज्ञात क्रियाओं से शरीर अपने को दुरुस्त करने के सामान्य काम को तिलांजलि दे देता है, यही वजह है कि यह बीमारी मौत का भय उपजाती है. दूसरे, जैसा कि हार्वर्ड से प्रीसिजन ओंकोलॉजी के इस नए रूप की पढ़ाई करके आए इम्यूनोथेरैपिस्ट राहुल पुरवार बताते हैं, ''एक दशक पहले तक मरीज के पास तीन विकल्प थे—कीमोथेरैपी, रेडिएशन या सर्जरी. ये कारगर नहीं हुए तो कैंसर आपकी मौत का परवाना था.’’
मगर अब, पुरवार और उनके सरीखे दूसरे लोगों की बदौलत, खुश होने की वजह है. पुरवार 2013 में भारत लौटे, तो उन्होंने पाया कि इम्यूनोथेरैपी भारत के रक्षा शस्त्रागार से गायब थी. तभी से उन्होंने और कई अन्य लोगों ने इस बुनियादी तथ्य को बदलने के लिए काम किया कि यह बीमारी शरीर के स्व-चिकित्सा तंत्र की नाकामी का पर्याय है. चिकित्सा की इसी आंतरिक शक्ति को सजा-संवारकर वे कैंसर के इलाज में क्रांतिकारी बदलाव लाए. इम्यूनोलॉजी रोगों से लड़ने की शरीर की अपनी ताकत पर ध्यान केंद्रित करती है और इसे दमदारी से लड़ने के लिए तैयार करती है.
बायोकॉन की चेयरपर्सन किरण मजूमदार शॉ भारत में कैंसर के ऐसे इलाज की लागत में 300 फीसद तक बड़ी कमी लाने में जुटी हैं, जिन्होंने प्रसिद्ध लेखक और अनुसंधानकर्ता सिद्धार्थ मुखर्जी के साथ मिलकर 2019 में भारतीय इम्यूनोथेरैपी कंपनी इम्यूनील की सहस्थापना की. शॉ बताती हैं, ''सर्जरी, कीमोथेरैपी और रेडियोथेरैपी से कुछ निश्चित किस्म के कैंसर ऐंटीजन को निशाना बनाने वाली ऐंटीबॉडी इम्यूनोथेरैपी तक हमने लंबा रास्ता तय किया है.’’
वे यह भी बताती हैं कि स्तन कैंसर से जीवित बचने की दर एक दशक पहले 10 फीसद थी, जो आज करीब 90 फीसद है. ''कुछ कैंसरों का पूर्वानुमान इतना अच्छा है कि आप कह सकते हैं कि आप अमुक से मर सकते हैं पर उससे मरेंगे नहीं.’’ यही वजह है कि इम्यूनोथेरैपी और कुछ मुट्ठी भर इसी से जुड़ी और समानांतर प्रगतियां सचमुच सुरंग के मुहाने पर रोशनी की तरह हैं.
इस हफ्ते हमारी आवरण कथा के लिए सीनियर एसोसिएट एडिटर सोनाली अचार्जी ज्यों-ज्यों इस रोमांचक किस्म के कोशकीय हस्तक्षेप की बीहड़ गहराइयों में उतरीं, यह साफ होता गया कि एक ऐसी समझ इसे रास्ता दिखा रही है जो पहले हासिल नहीं थी. इसी की बदौलत, जो घोषणा होने पर मौत की घंटी हुआ करती थी, अब दूसरी बीमारियों की तरह दिखाई देती है: शायद जानलेवा, पर लाइलाज नहीं.
पुरवार की पेटेंट की गई पद्धति—सीडी-19 सीएआर-टी, जो भारत की पहली स्वदेशी किमेरिक ऐंटीजन रिसेप्टर टी-सेल थेरैपी है—मोर्चों पर तैनाती का इंतजार कर रही है. इसके दूसरे और तीसरे चरण के परीक्षणों की तैयारी करते हुए उन्हें उम्मीद है कि अगले साल की शुरुआत तक वे भारतीय अस्पतालों में इलाज के लिए इसे पेश कर देंगे.
इस पद्धति में मानव शरीर की टी कोशिका—रोग प्रतिरोधक प्रतिक्रियाओं से जुड़ी एक श्वेत रक्त कोशिका—को लेकर उसे कैंसर की कोशिकाओं से लड़ना सिखाया जाता है. असल में कैंसर होता ही तब है जब असामान्य रूप से कई गुना बढ़ने वाली कोशिकाएं शरीर के प्रतिरक्षा तंत्र की नजर से बचकर ऐसा करने में कामयाब हो जाती हैं.
भारत में इम्यूनोथेरैपी के लिए अब ऐसे कई उल्लेखनीय उद्यम हैं, जिनमें क्यूराडेव, बगबर्क्स रिसर्च, इम्यूनील थेरैप्यूटिक्स, जुमुटर और ऑरिजीन डिस्कवरी टेक्नोलॉजीज शामिल हैं. जोर जितना इस थेरैपी को बेहतरीन बनाने पर है, उतना ही लागत कम करने पर भी. निवेश का तो तांता लग गया है. शॉ और मुखर्जी की इम्यूनील थेरैप्यूटिक्स ने पिछले महीने अपने सीरीज ए फंडरेजिंग दौर से 1.5 करोड़ डॉलर जुटाने का ऐलान किया.
उधर, बगबर्क्स 1.8 करोड़ डॉलर उन अणुओं के प्री-क्लिनिकल विकास के लिए उगाहे जो ट्यूमर पर वहां निशाना साधेंगे जहां मानव कोशिका में पाया जाने वाला रासायनिक यौगिक एडीनोसिन न्यूरोट्रांसमिशन में भूमिका निभाता है. जुमुटर अपने एनके-सेल थेरैपी अणु (सीएआर-टी थेरैपी के समान, जिसमें फोकस टी-कोशिका पर नहीं बल्कि एनके या 'नेचुरल किलर’ कोशिका पर है) के लिए इस साल यूएस फूड ऐंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन में नई दवा के विकास की अर्जी दाखिल कर रहा है और उसने हाल में 63 लाख डॉलर की सीरीज ए4 फंडिंग जुटाई.
हमारी नजर अब ऐसे भविष्य पर है जिसमें मरीज के हिसाब से कैंसर का इलाज हो सकेगा. जीन और कोशिका आधारित उपचारों की इस नई पीढ़ी की समूची रक्षापंक्ति में न केवल छोटे-छोटे अणुओं और मोनोक्लोनल ऐंटीबॉडी के जरिए निशानेवार हस्तक्षेप शामिल हैं, बल्कि मॉलिक्यूलर ओंकोलॉजी अब ट्यूमर के बायोमॉलिक्यूल डीएनए, आरएनए और प्रोटीन व्यंजना—के निश्चित गुणों की पहचान भी कर पा रही है.
इलाज के टीकों सरीखी चीजों के साथ थेरैपी भी उतनी ही सघन और गहरी होती जा रही है. अभी तक बहुत कुछ प्रगति कार्सिनोमा यानी कैंसर के कुछ रूपों तक सीमित है, पर मानवता ने सरहद यकीनन पार कर ली है. केकड़ा आसानी से जाने नहीं देता, पर विज्ञान भी अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है.

