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बाई जावैली सिनेमाहॉल

राजस्थानी फिल्मों के लिए जरूरी है कि वे खुद को वर्तमान से जोड़ें. आज के दर्शकों को पुराना माल नहीं परोसा जा सकता

1988 में रिलीज हुई फिल्म बाई चाली सासरिये अपने दौर की सबसे हिट राजस्थानी फिल्म थी
1988 में रिलीज हुई फिल्म बाई चाली सासरिये अपने दौर की सबसे हिट राजस्थानी फिल्म थी
अपडेटेड 26 सितंबर , 2022

आनंद चौधरी

पिछले ढाई साल राजस्थानी सिनेमा के लिए सूखे रहे हैं. जनवरी 2020 के बाद से अब तक सिर्फ एक फिल्म प्यारो बाबुल रिलीज हुई है. इस साल मई में रिलीज हुई इस फिल्म का एक गीत 'जग ने आ कैड़ी रीत बनाई, बाबुल रै घर बेटी पराई' इन दिनों खासा चर्चित हो रहा है.  

प्यारो बाबुल के अलावा इस साल करीब आधा दर्जन अन्य राजस्थानी फिल्मों पर भी काम शुरू हुआ है. बाहुबली, राजा राजस्थानी और मजो आ गयो जैसी राजस्थानी फिल्में इस साल के अंत तक सिनेमाघरों में नजर आ सकती हैं. राजस्थानी सिनेमा में यह उमंग हाल ही में जारी हुई 'फिल्म निर्माण प्रोत्साहन एवं अनुदान नीति 2022' की वजह से आई है. इस नीति में राजस्थानी फिल्मों के प्रोत्साहन के लिए 25 लाख रुपए और अवॉर्डेड फिल्म को 50 लाख रुपए से एक करोड़ रुपए तक अनुदान दिए जाने का प्रावधान किया गया है. राजस्थानी फिल्मों के निर्माता-निर्देशक विपिन तिवाड़ी का इस नीति पर कहना है, ''राजस्थानी सिनेमा अभी तक बहुत ही बुरे दौर से गुजर रहा था. नई नीति के बाद इसके उबरने की उम्मीद जगी है.''

ऐसा नहीं है कि राजस्थानी फिल्मों का हमेशा ही बुरा दौर रहा हो. नब्बे का दशक राजस्थानी फिल्मों के लिए सबसे सुनहरा दौर रहा है. 1988 में रिलीज हुई नानी बाई को मायरो और बाई चाली सासरिये जैसी फिल्मों ने कई हिंदी फिल्मों से भी ज्यादा कमाई की थी. इस फिल्म ने तो कई सिनेमाघरों में लगातार 100 दिन चलने का रिकॉर्ड बनाया था. 1989 में आई रमकूड़ी-झमकूड़ी और घर में राज लुगायां को 1990 में आई बीनणी वोट देणने चाली और दादोसा री लाडली भी सफल फिल्मों की गिनती में आती हैं. इसके बाद से राजस्थानी फिल्मों का बुरा दौर शुरू हुआ जो आज तक जारी है. डूंगरपुर जिले से ताल्लुक रखने वाले बॉलीवुड के चर्चित अभिनेता गजराज राव इसकी वजह बताते हुए कहते हैं, ''राजस्थानी फिल्मों से बहुत बड़े दर्शक वर्ग का जुड़ाव नहीं हो पाता.

दरअसल राजस्थानी कई बोलियों का मिलाजुला स्वरूप है. सरकार और विशेषज्ञों को तय करना चाहिए कि किस बोली में राजस्थानी फिल्में बनाई जाएं ताकि उनसे बड़ा दर्शक वर्ग जुड़ सके.'' इसके अलावा राव राजस्थानी सिनेमा के उत्थान के लिए उसे वर्तमान से जोड़ने की भी बात कहते हैं. वे कहते हैं, ''जिस तरह गुजराती सिनेमा का पुनर्जागरण हो रहा है, वहां फॉर्मूला फिल्में बन रही हैं, उसी तर्ज पर राजस्थान को भी वर्तमान में लौटना होगा. आज के युवा, जो फिल्मों का मुख्य दर्शक वर्ग है, को पुराना और बासी माल नहीं परोसा जा सकता.''

हालांकि, इस बीच 2018 में संजय मिश्रा के मुख्य किरदार वाली राजस्थानी फिल्म टर्टल को 66वां राष्ट्रपति अवॉर्ड मिला था. यह पहली बार हुआ था जब किसी राजस्थानी फिल्म को यह अवॉर्ड मिला. 

टर्टल के निर्माता अशोक एच. चौधरी राजस्थानी फिल्मों की हालत पर कहते हैं, ''यहां बेहतरीन कहानियों और सुंदर लोकेशन की भरमार है, लेकिन राजस्थानी फिल्में इनका कुछ फायदा नहीं उठा पाईं, जबकि बॉलीवुड ने इन कहानियों और लोकेशन का खूब दोहन किया.'' हालांकि राजस्थान सरकार की नई नीति इस स्थिति को बदल सकती है. इसके तहत ऐतिहासिक स्मारकों और पुरा महत्व की इमारतों को राजस्थानी फिल्मों की शूटिंग के लिए निशुल्क उपलब्ध कराने की व्यवस्था की गई है. 

इस नीति की कुछ शर्तें भी हैं. मसलन, जुलाई 2018 के बाद रिलीज हुई उन्हीं फिल्मों को सरकारी अनुदान मिलेगा जिनकी कम से कम 80 प्रतिशत शूटिंग राजस्थान में हुई हो और जिनमें कम से कम 30 फीसद अभिनेता/टेक्निशियन राजस्थान के हों. एक शर्त यह भी है कि फिल्म बनाने पर कम से कम 30 प्रतिशत राशि राजस्थान में खर्च होनी चाहिए. 

नई नीति के मुताबिक, राजस्थानी फिल्म कम से कम 10 सिनेमाघरों में प्रदर्शित होनी चाहिए और फिल्म 2के या उससे अधिक रिजॉल्युशन वाले डिजिटल फॉर्मेट में बनी होनी चाहिए. फिल्म में दर्शाए जाने वाले निर्माता, निर्देशक, संगीतकार, कलाकार, टेक्निशियन और कंपोजर के नाम राजस्थानी भाषा में होने चाहिए. फिल्म का निर्माता/सहनिर्माता राजस्थान का मूल निवासी होगा तो उसे अनुदान में प्राथमिकता दी जाएगी. अनुदान की शर्तों के तहत ऐसी फिल्मों को सहायता नहीं मिलेगी जो सामाजिक बुराइयों को बढ़ावा देती हैं. इसके अलावा जो फिल्में किसी मौजूदा फिल्म की डब/कॉपी या मिश्रित संस्करण होंगी उन्हें भी अनुदान से वंचित रहना होगा.

इस सबके बीच अशोक चौधरी राजस्थान सरकार की इस फिल्म नीति से खुश नजर आते हैं. वे कहते हैं, ''ऐसा लग रहा है कि राजस्थानी फिल्मों का सुनहरा दौर जल्द ही लौटेगा.''

नाम के लिए भी तरस रहा है राजस्थानी सिनेमा

राजस्थानी सिनेमा सिर्फ दर्शकों के लिए ही नहीं बल्कि अपने नाम के लिए भी तरस रहा है. 80 साल पहले 1942 में राजस्थानी भाषा में पहली फिल्म नजराना आई थी. उसके बाद राजस्थानी भाषा में 173 फिल्में बन चुकी हैं लेकिन अभी तक राजस्थानी सिनेमा को कोई नाम नहीं मिला है. ऐसा नहीं है कि राजस्थानी फिल्म इंडस्ट्री को नाम देने के प्रयास नहीं हुए लेकिन इन प्रयासों में सामूहिकता का अभाव रहा. किसी ने राजस्थानी सिनेमा को रॉलीवुड नाम दे दिया तो किसी ने राजस्थान को राजघरानों से जोड़ते हुए रॉयलवुड कह दिया.

राजस्थानी फिल्म इंडस्ट्री में एकजुटता नहीं होने के कारण इसे कोई सर्वमान्य नाम नहीं मिल पाया. राजस्थानी फिल्मों के लेखक और कलाकार शिवराज गुर्जर कहते हैं, ''किसी भी चीज की पहचान उसके नाम से होती है. जैसे तेलुगु सिनेमा के लिए टॉलीवुड, पंजाबी के लिए पॉलीवुड, मलयालम फिल्म इंडस्ट्री के लिए मॉलीवुड, तमिल सिनेमा के लिए कॉलीवुड और मुंबई फिल्म इंडस्ट्री के लिए बॉलीवुड नाम प्रचलित हैं, वैसा नाम राजस्थानी फिल्म इंडस्ट्री को अभी तक नहीं मिल पाया. नाम नहीं है तो वैसी पहचान भी नहीं हैं.''

उम्मीद का सिनेमा
राजस्थानी फिल्म टर्टल को 2018 में 66वां राष्ट्रपति अवॉर्ड मिला था; 1988 में रिलीज हुई फिल्म बाई चाली सासरिये अपने दौर की सबसे हिट राजस्थानी फिल्म थी; राजा राजस्थानी और बाहुबली सहित एक दर्जन राजस्थानी फिल्में इस साल के अंत तक रिलीज होंगी

बॉलीवुड में धाक जमाने वाले राजस्थानी
राजस्थानी फिल्मों से जुड़े कलाकार अब तक खास पहचान नहीं बना पाए, लेकिन प्रदेश से निकले दूसरे कलाकारों ने जरूर बॉलीवुड के जरिए राष्ट्रीय-अंतररष्ट्रीय पहचान बनाई है

इरफान : बॅालीवुड के सबसे काबिल अभिनेताओं में शुमार रहे इरफान राजस्थान के टोंक शहर के रहने वाले थे. बॉलीवुड का रुख करने से पहले वे जयपुर में रंगमंच के क्षेत्र में नाम कमा चुके थे

इला अरुण : राजस्थानी लोकगीत-संगीत से लेकर अपने अभिनय तक का लोहा मनवाने वाली इस कलाकार ने देश-विदेश में राजस्थान का डंका बजाया है 

साक्षी तंवर: टीवी शो कहानी घर घर की से चर्चित हुर्इं एक्ट्रेस साक्षी तंवर राजस्थान के अलवर की रहने वाली हैं. फिल्मों में जाने से पहले वे भी स्थानीय रंगमंच में सक्रिय थीं

निम्रत कौर: द लंच बॉक्स, एयरलिफ्ट और दसवी जैसी फिल्मों में नजर आईं निम्रत कौर राजस्थान के झुंझुनूं जिले के पिलानी कस्बे की रहने वाली हैं 

सुमित व्यास: एक समय वेबसीरीज के सुपरस्टार कहे जाने वाले ऐक्टर सुमित जोधपुर के रहने वाले हैं. वे रूममेट और 'ट्रिप्लिंग' जैसी वेबसीरीज में आ चुके हैं. 

कीर्ति कुलहरी: पिंक, उरी : द सर्जिकल स्ट्राइक, मिशन मंगल, और सुपर से ऊपर जैसी फिल्मों में अहम किरदार निभाने वाली कीर्ति कुलहरी राजस्थान के झुंझुनूं जिले की रहने वाली हैं.

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