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अधूरे आरक्षण का सियासी पेच

सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश में स्थानीय चुनावों के लिए ओबीसी कोटा की इजाजत तो दे दी लेकिन अब यह आधा हो गया है

उलझन : एक कार्यक्रम में मुख्यमंत्री चौहान और अन्य नेता
उलझन : एक कार्यक्रम में मुख्यमंत्री चौहान और अन्य नेता
अपडेटेड 13 जून , 2022

सर्वोच्च न्यायालय के 18 मई के एक फैसले के बाद मध्य प्रदेश में एक अजीब विरोधाभास खड़ा हो गया है. इस फैसले में आगामी पंचायत और शहरी निकायों के चुनावों में अन्य पिछड़ी जातियों (ओबीसी) के लिए सीटों के आरक्षण की अनुमति दे दी गई है. सत्तारूढ़ भाजपा और कांग्रेस ओबीसी वोटों को अपनी ओर खींचने की कोशिश में रहती हैं. इस फैसले के बाद दोनों पार्टियां एक-दूसरे को ''ओबीसी विरोधी'' दिखाने की कोशिश कर रही हैं. भाजपा इस फैसले को अपनी कोशिशों से मिलने वाली जीत बताकर अपनी पीठ थपथपा रही है, वहीं कांग्रेस इसे उसकी भारी पराजय बता रही है. लेकिन, मामला इससे भ्रामक बन गया है कि सुप्रीम कोर्ट ने जिस बात की इजाजत मध्य प्रदेश में दे दी है, महाराष्ट्र में ठीक उसी को नामंजूर कर दिया है.

इसकी शुरुआत मध्य प्रदेश से होती है जहां प्रदेश सरकार ने नवंबर 2021 में एक अध्यादेश जारी करके घोषणा की कि पंचायत चुनाव 2014 की आरक्षण की स्थिति के अनुसार कराए जाएंगे. इस अध्यादेश को उसी महीने हाइकोर्ट में चुनौती दी गई, जिसमें मुख्य रूप से यह तर्क दिया गया कि पंचायतों में रोटेशन आरक्षण का एक अंतर्निहित पहलू होता है. अगर कोई सीट किसी खास वर्ग—अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, ओबीसी या जनरल—के लिए निर्धारित की गई है तो वह अगले चुनाव में बदल दी जाएगी. हाइकोर्ट ने जब इस अध्यादेश पर स्थगन आदेश नहीं दिया तो यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया, जहां इसे महाराष्ट्र से आए ओबीसी आरक्षण के ठीक इसी तरह के मामले से जोड़ दिया गया.

दिसंबर में सुप्रीम कोर्ट का अंतरिम आदेश सभी पार्टियों के लिए चौंकाने वाला था. उस फैसले में कहा गया कि मध्य प्रदेश में पंचायत चुनाव कराया जाना चाहिए क्योंकि वे लंबे समय से नहीं हुए हैं—असल में 2019 से—पर ओबीसी आरक्षण के बिना. फिर भाजपा ने कांग्रेस पर ओबीसी-विरोधी होने का आरोप मढ़ दिया क्योंकि उसके एक राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ वकील विवेक तन्खा ने अदालत में रोटेशन का विरोध किया था. वहीं, कांग्रेस ने भाजपा पर हमला बोला कि वह ''कोर्ट में ओबीसी हितों की रक्षा नहीं कर पाई'' और उसने कमलनाथ सरकार की उपलब्धियों को गवां दिया, जिसने 2019 में कोटा बढ़ाकर 27 फीसद कर दिया था.

सुप्रीम कोर्ट ने शुरू में ओबीसी कोटा इसलिए नामंजूर कर दिया था कि प्रदेश के पास पिछड़ी जातियों की वास्तविक जनसंख्या का कोई सही आंकड़ा नहीं है. आरक्षण को तभी मंजूरी दी जा सकती थी जब इस मामले में ''ट्रिपल टेस्ट'' हुआ होता और सही आंकड़ा दिया गया होता.

ट्रिपल टेस्ट है क्या? दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने मार्च 2021 में एक प्रक्रियागत ग्रिड तय कर दिया जिसके तहत ही ओबीसी आरक्षण पर किसी नए फैसले पर विचार किया जाए. तीन टेस्ट में एक विसंगति दिखाई देती है—जैसा कि मध्य प्रदेश के मामले में जल्दी ही दिखने वाला था. इस क्रम में राज्य को सबसे पहले सामाजिक और जनसंख्या सर्वेक्षण कराने के लिए एक आयोग का गठन करना होगा और सही संख्या बतानी होगी. (सर्वेक्षण में 11 सामाजिक-आर्थिक और प्रतिनिधि पैमानों के आधार पर विभिन्न जातियों की स्थिति का पता लगाने का काम सौंपा गया है लेकिन यह उन्हीं जातियों तक सीमित है जो पहले से ही पिछड़ी जातियों की सूची में हैं. वैसे यह सर्वेक्षण ताजा डेटा देता है. पर ओबीसी सूची स्वयं अपडेट नहीं होती है.) दूसरा, यह वैधानिक संस्था जनसंख्या के आधार पर आरक्षित सीटों के अनुपात पर अपना निर्णय लेगी. यहीं पेच फंसता है—आरक्षित सीटों की संख्या पहले सुप्रीम कोर्ट से निर्धारित 50 फीसद से ज्यादा नहीं हो सकती है.

यह विसंगति प्रकाश में तब आई जब मई के शुरू में महाराष्ट्र के मामले पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू हुई. 9 मई को मध्य प्रदेश सरकार ने अपना डेटा प्रस्तुत किया: राज्य में ओबीसी की जनसंख्या करीब 51 फीसद थी. अदालत ने 10 मई को अपने पहले के फैसले में उसको स्वीकार नहीं किया और कहा कि सरकार ने अगर ट्रिपल टेस्ट नहीं कराया है तो ओबीसी कोटे के बिना ही चुनाव कराने होंगे. मध्य प्रदेश सरकार ने अपील दायर की और फिर 17 मई को अदालत ने नई याचिका पर सुनवाई की. 19 मई को उसने ओबीसी वेलफेयर कमिशन की रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया और ओबीसी आरक्षण के साथ चुनाव कराने की मंजूरी दे दी. लेकिन, अदालत 50 फीसद कोटे की सीमा को लेकर पुराने फैसले पर अडिग थी. राज्य सरकार ने पिछला स्थानीय निकायों का चुनाव—2014 में (ग्रामीण) और 2015 में (शहरी)—ओबीसी के लिए 25 फीसद आरक्षित सीटों के साथ कराया था. उसे अब घटाकर 14 फीसद करना होगा. मौजूदा कोटा—21 फीसद एसटी, 15 फीसद एससी—से उतनी ही जगह बचती है.

इस बीच महाराष्ट्र को अपनी सुस्ती के कारण नुक्सान उठाना पड़ा—उसने तीन टेस्ट में से एक ही पूरा किया था. उसने मार्च 2021 में पूर्व जज आनंद निरगुडे की अध्यक्षता में एक ओबीसी आयोग का गठन किया था. आयोग इस साल फरवरी में अंतरिम रिपोर्ट दाखिल कर सका जिसमें 27 फीसद ओबीसी आरक्षण की सिफारिश की गई. सुप्रीम कोर्ट ने उसे नकार दिया. कोर्ट का कहना था कि यह सेकंडरी स्रोतों पर आधारित है और जमीनी काम नहीं किया गया. मार्च में एक अन्य आयोग का गठन हुआ ताकि नए सिरे से कोटा तय हो—यह जून में रिपोर्ट देगा. उप-मुख्यमत्री अजित पवार ने 16 मई को कहा, ''हम फिर सुप्रीम कोर्ट में जाएंगे.'' सभी 23 नगर नगमों, 215 नगर परिषदों और 34 जिला परिषदों का चुनाव इस साल होना है.

उधर, मध्य प्रदेश में राजनीति गरमाती जा रही है. पंचायत के चुनाव पार्टी लाइन पर नहीं होते हैं, पर शहरी निकायचुनाव पार्टी लाइन पर होते हैं और 411 में से 317 के चुनाव पंचायतों की वोटिंग के बाद होंगे. यह मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की लोकप्रियता के साथ-साथ ओबीसी के मूड का पता लगाने का एक बैरोमीटर साबित होगा. मूल याचिकाकर्ता जबलपुर के वकील रामेश्वर ठाकुर कहते हैं, ''आरक्षण आधे हो जाएंगे. यह सीधे-सीधे हार है. इसमें खुश होने की कोई बात नहीं है.'' 
—साथ में किरण डी. तारे

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