मई की शुरुआत में बेंगलूरू के एक एडटेक स्टार्ट-अप में जूनियर सेल्स एग्जीक्यूटिव 29 वर्षीय प्रतीक शेट्टी (बदला हुआ नाम) को जबरदस्त झटका लगा. उन्हें ई-मेल मिला कि आपकी सेवाओं की अब और जरूरत नहीं और अगले कुछ दिनों में उन्हें इस्तीफा देना पड़ेगा. उनके कई साथियों को भी ऐसा ही संदेश मिला. परेशान शेट्टी कहते हैं, ''हमें बताया तक नहीं गया कि क्यों निकाला जा रहा है.'' छंटनी से पहले वरिष्ठों के बार-बार आ रहे ई-मेल में सेल्स घटने का जिक्र जरूर था, खासकर जब कोविड के मामले कम थे और स्कूल-कॉलेज खुल चुके थे. विभिन्न विभागों में वरिष्ठ कर्मचारियों से खर्च घटाने को कहा गया, पर छंटनी का अंदेशा तक न था. शेट्टी कहते हैं, ''मुझे पूरे महीने की तनख्वाह तक नहीं दी और हफ्ते भर में इस्तीफा देने को कह दिया.'' सालाना आठ लाख रुपए की तनख्वाह में वे बस बूढ़े मां-बाप की देखभाल और छोटे भाई की पढ़ाई का खर्च उठा पाते थे. नई नौकरी की तलाश के लिए शेट्टी ने सोशल मीडिया का रुख किया. वे कहते हैं, ''ट्विटर के मार्फत कुछ रेफरल मिले, कुछ इंटरव्यू भी दिए, पर ऑफर अभी तक नहीं मिला. स्टार्ट-अप में अब नौकरियां वैसे भी कम हैं.''
शेट्टी की स्थिति स्टार्ट-अप से एक के बाद एक आ रही बड़ी छंटनियों की बुरी खबरों का ही हिस्सा है, क्योंकि कंपनियां अंधाधुंध खर्च और कथित धोखाधड़ी के मामलों के बाद अनिश्चितता, फंड की बढ़ती लागत और ज्यादा संयम तथा सावधानी के लिए बढ़ती चीख-पुकार के माहौल में धन की किल्लत से दो-चार हैं. मीडिया रिपोर्ट से पता चलता है कि 2022 में अब तक स्टार्ट-अप के कम से कम 5,800 कर्मचारियों पर गाज गिरी है. स्टार्ट-अप तो फेरबदल के दौर से गुजर ही रहे हैं, यूनिकॉर्न भी नहीं बचे. इस साल एडटेक या शिक्षा प्रौद्योगिकी फर्म अनएकेडमी और वेदांतु ने क्रमश: 600 और 624 कर्मचारियों की छंटनी की जबकि ऑनलाइन खुदरा फर्म मीशो ने किराना कारोबार से 150 कर्मचारी निकाले.
जनवरी से मार्च के बीच प्री-ओन्ड कार सेलर कार्स24 ने 600 कर्मचारियों को निकाला तो कैब एग्रीगेटर ओला ने 2,100 कर्मचारियों को चले जाने को कहा. फर्नीचर स्टार्ट-अप फर्लेंको और सोशल कॉमर्स प्लेटफॉर्म ट्रेल (जो वित्तीय अनियमितताओं के लिए निवेशकों की जांच के दायरे में है) ने भी क्रमश: 180 और 300 कर्मचारियों की छंटनी की. भारत में ये छंटनियां तब हुईं जब दुनिया भर से ऐसी ही खबरें आ रही थीं. बताया जाता है कि टेक्नोलॉजी से जुड़ी स्टार्ट-अप कंपनियों से, जिनमें से ज्यादातर अमेरिका की हैं, अप्रैल के बाद 20,000 कर्मचारी निकाले गए हैं.
हकीकत से सामना
कुछ महीने पहले तक स्टार्ट-अप सबके लाडले थे. कैब एग्रीगेटर और फूड टेक फर्म से लेकर फर्नीचर, फैशन उत्पादों और दवाइयों के ऑनलाइन रिटेलर तक स्टार्ट-अप की नई फौज की जबरदस्त मांग थी. देश के प्रतिष्ठित पेशेवर कॉलेजों से नए पढ़कर आए कई नौजवानों ने अपना उद्यम लगाने के सपनों को उड़ान देनी चाही तो धन उनके पीछे-पीछे चला आया. इन स्टार्ट-अप में धन लगाने के लिए कई बड़े वैश्विक निवेशकों की कतार लग गई. सरकारी आंकड़ों से पता चलता है कि 2016 से 56 अलग-अलग क्षेत्रों में 60,000 से ज्यादा नए स्टार्ट-अप बने और करीब 6,00,000 लोगों को काम दिया. 2021-22 में देश में 14,000 नए स्टार्ट-अप जुड़े, जो 2016-17 के मात्र 733 के मुकाबले बड़ी छलांग थी. भारत के 100 से ज्यादा स्टार्ट-अप प्रतिष्ठित 'यूनिकॉर्न' क्लब में शामिल हुए जो 1 अरब डॉलर (7,760 करोड़ रुपए) या उससे ज्यादा का मूल्य हासिल करके बनते हैं. उद्योग के अनुमान के मुताबिक, इतने वर्षों में इन यूनिकॉर्न ने करीब 90 अरब डॉलर (लगभग सात लाख करोड़ रु.) उगाहे और उनका कुल मूल्य 333 अरब डॉलर (25.8 लाख करोड़ रु.) है. अमेरिका और चीन के बाद भारत अब सबसे ज्यादा यूनिकॉर्न वाले देशों की अव्वल जमात में है.
मगर यह कहानी अब डगमगाती दिखती है, जब यह क्षेत्र जबरदस्त संकट के दौर से गुजर रहा है. यूक्रेन युद्ध से महंगाई में आग लग गई है. इस पर काबू पाने के लिए केंद्रीय बैंक ब्याज दरें बढ़ा रहे हैं, जिससे पूंजी और महंगी हो रही है. धन की बढ़ी लागत और अनिश्चित भूराजनैतिक माहौल में निवेशक बहुत ठोक-बजाकर पैसा लगा रहे हैं, पहले के मुकाबले ढेरों सवाल कर रहे हैं, और कुछ मामलों में तो पहले जिन जोखिम भरे कारोबारों में पैसा लगाने से जरा नहीं झिझकते थे, अब उनसे कन्नी काट रहे हैं. प्राइवेट इक्विटी ऐंड वेंचर कैपिटल एसोसिएशन-ईवाइ की एक रिपोर्ट कहती है कि अप्रैल में प्राइवेट इक्विटी (पीई) और वेंचर कैपिटल (वीसी) फर्म की तरफ से स्टार्ट-अप में निवेश साल-दर-साल आधार पर आधा घटकर 1.6 अरब डॉलर (7,760 करोड़ रु.) पर आ गया.
कोविड के वर्षों में जब देश बड़े प्रोत्साहन लेकर आए, तरलता से लबालब बाजार में विशाल धन स्टार्ट-अप के पीछे भाग रहा था. यही नहीं, कोविड ने स्टार्ट-अप को उस स्थिति का फायदा उठाने का भरपूर मौका दिया जिसमें भौतिक पाबंदियां नया सामान्य बन गई थीं. ऑनलाइन रिटेलर, फूड एग्रीगेटर और एडटेक कंपनियों ने सबसे ज्यादा फायदा उठाया, क्योंकि उनके मॉडल उत्पादों और सेवाओं को उपभोक्ताओं के दरवाजे पर पहुंचाने में आने वाली रुकावटों को धता बता सकते थे. ऐसे स्टार्ट-अप का मूल्य आसमान छूने लगा और 2021 के पहले छह महीनों में हाल के वक्त की सबसे ज्यादा हलचल देखी गई. 2021 के पहले पांच महीनों में स्टार्ट-अफ फंडिंग 8.76 अरब डॉलर (67,979 करोड़ रु.) की ऊंचाई पर पहुंच गई, जो 2020 के पहले छह महीनों के मुकाबले 80 फीसद ज्यादा थी. उनमें से भुगतान फर्म पेटीएम, लाइफस्टाइल रिटेलर नायका, इंश्योरेंस एग्रीगेटर पॉलिसीबाजार और फूड टेक फर्म जोमैटो सरीखे कुछ स्टार्ट-अप शेयर बाजार में सूचीबद्ध हो गए. यह भारतीय स्टार्ट-अप के बालिग होने का प्रतीक था. वह ज्वार अब भाटे में बदल चुका है.
अनएकेडमी के सह-संस्थापक और सीईओ गौरव मुंजाल कहते हैं, ''हम संसाधनों और पूंजी से लबालब माहौल में फले-फूले. मगर अब हमें तौर-तरीके बदलने होंगे. जाड़े का मौसम आ गया है.'' हाल में स्टाफ को लिखी एक चिट्टी में मुंजाल ने कहा कि मौद्रिक नीतियों की सख्ती और बढ़ती ब्याज दरों की वजह से दुनिया भर में टेक्नोलॉजी कंपनियों के शेयर टूट रहे हैं. उन्होंने लिखा, ''कम से कम 12-19 महीनों तक धन के अकाल की स्थिति हमारे सामने है. कुछ लोग 24 महीनों की भविष्यवाणी कर रहे हैं. हमें इसके हिसाब से ढलना होगा.''
बदलता परिदृश्य
सुधार का बड़ा कारण महामारी का कमजोर पड़ना है. महामारी की तीन कमर-तोड़ लहरों के बाद चीन को छोड़कर तकरीबन सभी बड़ी अर्थव्यवस्थाएं खुल गईं. चीन ने भी पाबंदियों में कुछ ढील दी, जबकि उसकी वित्तीय राजधानी शंघाई में बीते कुछ हफ्तों से सख्त लॉकडाउन लगा था. भारत के बड़े और मझौले शहरों में ज्यादातर दफ्तर पूरी क्षमता से काम कर रहे हैं. टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज और इन्फोसिस सरीखी बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनियां भी अपने ज्यादातर कर्मचारियों को वापस काम पर बुलाने के बारे में सोच रही हैं. कुछ राज्यों में स्कूल पूरी तरह ऑफलाइन मॉडल में खुल गए हैं. भौतिक पाबंदियों में छूट के साथ भौतिक खरीदारी, बाहर खाने और यात्रा करने की मांग बढ़ी है. इससे रिटेल, फूड और शिक्षा के ऑनलाइन कारोबारों की मांग में आई असाधारण ऊंचाई की हवा निकल गई. एडटेक कारोबार पर विशेष रूप से असर पड़ा. बताया जाता है कि बेंगलूरू की एडटेक फर्म उदय 100-120 कर्मचारियों की छंटनी करने के बाद कुछ दिन पहले बंद हो गई. उसके सह-संस्थापक सौम्य यादव ने एक मीडिया इंटरव्यू में कहा, ''हमारी लेखा-बही में काफी पूंजी थी, पर ऑफलाइन दुनिया में कारोबार का मतलब नहीं रह गया...ग्राहक हासिल करने की लागत बहुत महंगी हो गई.''
अनिश्चितता की दूसरी वजह यूक्रेन पर रूस की चढ़ाई है, जिसने महंगाई में आग लगा दी और ब्याज दरें बढ़ा दीं, जिससे पूंजी मंहगी और निवेशक चौकन्ने हो गए. दुनिया के सबसे बड़े पीई निवेशक जापान के सॉफ्टबैक ग्रुप के चर्चित सीईओ मासायोशी सन मार्च में अपनी उस पारे सरीखी निवेश शैली की वजह से बेहद दबाव में आ गए जिसने भारत सहित दुनिया भर में कई स्टार्ट-अप में महंगे दांव लगाए. मार्च में मैनहटन में एक प्रस्तुति के दौरान उन्हें निवेशकों से यह कहते प्रस्तुत किया गया, ''मैं वादा करता हूं मैं ज्यादा सावधान रहूंगा और सुनूंगा. मेरे विचार नहीं बदलते, पर मेरा व्यवहार कुछ ज्यादा सतर्क हो जाता है.'' यह भरोसा कुछ देर से आया, क्योंकि फर्म का विजन फंड 2021-22 में 27.4 अरब डॉलर का घाटा दर्ज कर चुका था.
शुरुआती चरण के उद्यमों में निवेश करने वाली फर्म मुंबई एंजेल्स के सह-संस्थापक प्रशांत चौकसे कहते हैं, ''पहले स्टार्ट-अप मुनाफे की स्थिति में थे और हर कोई निवेश के लिए दौड़ा चला आ रहा था. निवेशक गैर-बाध्यकारी समझौतों पर दस्तखत करने में व्यस्त थे. सोने की खुदाई के लिए भीड़ लगी थी. मगर अब फायदे की स्थिति में स्टार्ट-अप नहीं बल्कि वेंचर कैपिटलिस्ट और पीई खिलाड़ी हैं.'' स्टार्ट-अप को अचानक एहसास हुआ कि दूसरी ओर कोई उनके इंतजार में नहीं खड़ा है. चौकसे का कहना है कि परेशानी पूंजी की कमी की नहीं है, बल्कि पूंजी का सौदा करने वालों के स्वभाव में आए एहतियात की है. वे कहते हैं, ''बाजार में तरलता है. तंत्र में भरपूर धन है... पर वह सतर्क हो गया है.'' कुछ लोगों को निवेशक भी बराबर से दोषी लगते हैं. ऑनलाइन ब्रोकिंग फर्म जेरोधा के सह-संस्थापक निखिल कामत ने एक टेलीविजन इंटरव्यू में कहा, ''मैं स्टार्ट-अप के संस्थापकों को उतना दोष नहीं दूंगा जितना वीसी और पीई को दूंगा, जो इन कंपनियों में उस किस्म का धन उलीचते रहे और बगैर किसी लागत के उनसे बढ़ने की उम्मीद करते रहे.'' जेरोधा पूरी तरह बाहरी धन के निवेश के बगैर चलने वाली फर्म है.
सावधानी सबसे जरूरी
मौजूदा स्थिति निवेशकों को बेहतर सोच-विचार के साथ काम करने का काफी मौका देती है—बिजनेस मॉडल और मुनाफे के रास्ते का अध्ययन करें और संगठन की संस्कृति और संस्थापकों की ईमानदारी को समझें. सिंगापुर स्थित फैशन टेक स्टार्ट-अप जिलिंगो से जुड़े हालिया मामले से सामने आया कि गड़बड़ियां कहां-कहां हो सकती हैं. इस मामले में वित्तीय अनियमितताओं की शिकायतों के स्वतंत्र फॉरेंसिक ऑडिट के बाद बोर्ड ने भारतीय मूल की सह-संस्थापक और सीईओ अंकिति बोस को बर्खास्त कर दिया. स्टार्ट-अप के एक निवेशक कहते हैं, ''लिमिटेड पार्टनर (एलपी, जो फंड के लिए पूंजी का इंतजाम और निवेश करते हैं) चौकन्ने होते जा रहे हैं. वैल्यूएशन का एक अरब डॉलर से शून्य पर आना कतई मंजूर नहीं. पूरा वाकया ही आंख खोलने वाला था.'' जिलिंगो का पतन इसलिए और भी भीषण हो गया क्योंकि उसके निवेशकों में अमेरिका की सिकोया कैपिटल और सिंगापुर की टेमासेक होल्डिंग सहित जाने-माने वेंचर कैपिटल फंड शामिल थे. 2019 में जब कंपनी ने इन पीई फर्मों से 22.6 करोड़ डॉलर (1,754 करोड़ रु.) उगाहे, तब उसका मूल्य 97 करोड़ डॉलर (7,529 करोड़ रु.) था.
निवेशक केवल धोखाधड़ियों के कारण पसोपेश में नहीं हैं. कई स्टार्ट-अप का झुकाव आम तौर पर प्रचार, भर्तियों व तनख्वाहों और भौतिक बुनियादी ढांचे पर अंधाधुंध खर्च करने की तरफ होता है, जिससे उनकी जेब तेजी से खाली हो जाती है. अत्यधिक प्रतिस्पर्धी बाजार में जरूरी है कि अच्छी से अच्छी प्रतिभाएं लाएं और उन पर अच्छे से अच्छा खर्च करें. मगर कुछ स्टार्ट-अप में खर्चों ने तमाम तर्कों के ताक पर रख दिया. मसलन, सूत्रों के मुताबिक कुछ एडटेक कंपनियां प्रतिस्पर्धियों से प्रतिभाओं को तोड़कर लाने के लिए 200 फीसद ज्यादा तनख्वाह की पेशकश कर रही थीं. इन फर्मों में शिक्षकों की भारी मांग थी. मगर इन शिक्षकों के हुनर की थाह लेने के बजाए कई बार वे सोशल मीडिया पर उनकी मौजूदगी या उनके फॉलोवर की संख्या से तय कर रही थीं कि वे इतनी रकम के लायक थे या नहीं. चौकसे कहते हैं, ''झाग ही झाग था और स्टार्ट-अप कंपनियों का वास्तविक से ज्यादा मूल्य निर्धारण हुआ. ज्यादातर कंपनियां ऊंची वृद्धि की राह पर थीं और ढेरों रकम फूंक रही थीं.'' ये फर्म यह सोचकर ढेरों लोगों की भर्तियां करती रहीं कि फंड आता रहेगा. मगर अब हकीकत सामने है.
कुछ स्टार्ट-अप के ऊंचे मूल्य निर्धारण को लेकर भी ऐसी ही चिंताएं हैं, जो उनके वित्तीय प्रदर्शन से मेल नहीं खाता. एनट्रैकर (जो स्टार्ट-अप को ट्रैक करता है) के आंकड़े बताते हैं कि भारत के 100 में से महज 18 यूनिकॉर्न 2020-21 में मुनाफे की स्थिति में आ पाए, जबकि 57 भारी घाटे में हैं. उसने बताया कि बाकी 25 ने, जिनमें से ज्यादातर अमेरिका या सिंगापुर में पंजीकृत हैं, अपनी कमाई, घाटे या मुनाफे के आंकड़ों का खुलासा नहीं किया है. एनट्रैकर के मुताबिक, पांच शीर्ष मुनाफेदार यूनिकॉर्न जोहो, इन्फोएज, जेरोधा, फाइव स्टार और ड्रीम11 हैं जिनका 2020-21 में मुनाफा क्रमश: 1,917 करोड़ रुपए, 1,409 करोड़ रुपए, 1,122 करोड़ रुपए, 359 करोड़ रुपए और 327 करोड़ रुपए था. दरअसल, जोमैटो, नायका और पेटीएम सरीखे स्टार्ट-अप जब शेयर बाजार में सूचीबद्ध हुए तो उनके शेयरों की कीमतों में उन्हीं चिंताओं की झलक थी जो निवेशकों को थीं. सबसे ज्यादा मार पेटीएम पर पड़ी, जिसके शेयर की कीमत उसकी इश्यू प्राइस से एक-तिहाई पर आ गई.
आगे का रास्ता
ये दुख भरे दिन कब तक रहेंगे और स्टार्ट-अप उथल-पुथल से भरे इस समुद्र से निकालकर खुद को किनारे पर कैसे ला सकते हैं? स्टार्ट-अप की निवेशक के कैपिटल के एमडी और संस्थापक साशा मीरचंदानी कहते हैं कि यह कुछ वक्त का दौर है. वे कहते हैं, ''स्टार्ट-अप की कहानी अगले 20 साल चलेगी. कुछ फर्मों के मूल्य निर्धारण का जो हाल हुआ है, तो सुधार होना ही था.'' उनके मुताबिक, इस पड़ाव पर सबसे ज्यादा समझदारी इसी में होगी कि खर्चों में कटौती करें. उधर जो कंपनियां अच्छे ढंग से चलाई जा रही हैं, जिनका भरोसेमंद बिजनेस मॉडल है और जो मुनाफे का साफ रास्ता बतला सकती हैं, उन्हें धन मिलता रहेगा. वे यह भी कहते हैं, ''स्टार्ट-अप को निवेशकों को भरोसा दिलाना होगा कि वे विशाल गड्ढा नहीं हैं.''
दूसरों का कहना है कि यह सब स्वभाव से ही गोल-गोल घूमने वाली प्रक्रिया है—निवेशक कुछ वक्त एहतियात बरतेंगे और बाजार फिर झाग उगलने लगेगा, हो सकता है, छह महीने या एक साल में. मगर कुछ अन्य लोगों का कहना है कि फंड के मोर्चे पर सख्ती कम से कम दो साल चल सकती है. मुंजाल कहते हैं, ''यह हम सबके लिए इम्तहान है. हमें हर हाल में मुनाफे पर ध्यान देना होगा.'' अनएकेडमी इस वित्त वर्ष में अपने केंद्रों को मुनाफे में लाने का लक्ष्य लेकर चल रही है. कर्मचारियों की छंटनी के अलावा इसने मार्केटिंग का बजट भी कम किया है.
निवेशक सावधानी बरतते हुए ऐसा कर सकते हैं कि कार्य प्रदर्शन में मील का पत्थर जुड़ने के बाद ही फंड जारी करना शुरू करें, ताकि हर चरण में प्रगति की थाह ली जा सके. उनकी प्राथमिकता अब भी मेधावी और नवोन्मेषी विचार ही हैं और यह भी कि नया कारोबार कितने बड़े बाजार तक पहुंच सकता है. मगर फिलहाल अनिश्चितता का बोलबाला है. स्टार्ट-अप के एक निवेशक कहते हैं कि चीजें फिर सामान्य होंगी, बस कोई जानता नहीं कि कब होंगी.

