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अंधेरगर्दी की नई मिसाल

ये आरोप बेबुनियाद और राजनीति से प्रेरित हैं. जो लोग टीएमसी को बदनाम करना चाहते हैं, उन्हें व्यापम घोटाले पर बात करनी चाहिए

नाराजगी : मध्य कोलकाता में 2019 में भूख हड़ताल पर बैठे प्रदर्शनकारी एसएलएसटी उम्मीदवार
नाराजगी : मध्य कोलकाता में 2019 में भूख हड़ताल पर बैठे प्रदर्शनकारी एसएलएसटी उम्मीदवार
अपडेटेड 23 मई , 2022

राज्य सरकार के स्कूलों में करीब 30,000 रिक्तियां बेरोजगारी की मार झेल रहे युवाओं के लिए दशक भर में एक बार मिलने वाले बेहतरीन अवसर की तरह थीं. लेकिन राज्य स्तर की चयन परीक्षा (एसएलएसटी) में बैठने वाले हजारों उम्मीदवारों की उम्मीदें गहरी निराशा में बदल गईं. वजह? कथित रूप से बहुत से 'अयोग्य' उम्मीदवारों ने योग्यता सूची में जगह बना ली और नौकरी हासिल कर ली, जबकि योग्य आवेदक सूची से बाहर हो गए. जल्दी ही कथित रूप से सियासी संरक्षण मिलने और पैसा लेकर पदों की बिक्री की बातें उठने लगीं. तृणमूल कांग्रेस सरकार ने इन आरोपों से इनकार किया. करीब 4,000 ग्रेजुएट और पोस्टग्रेजुएट आवेदक अनिश्चय की स्थिति में फंस गए. उनके पास अदालत का दरवाजा खटखटाने के अलावा और कोई रास्ता नहीं रह गया. लेकिन अदालती कार्रवाई की सुस्त रफ्तार को देखते हुए उन्हें मध्य कोलकाता में धरने पर बैठने को मजबूर होना पड़ा.

उन्हें पुलिस के डंडे खाने पड़े, गिरफ्तारियां हुईं और हादसे भी हुए—दो प्रदर्शनकारियों ने आत्महत्या कर ली और दो अन्य खराब स्वास्थ्य के कारण मर गए. घोटाले की संभावना को देखते हुए राज्य सरकार ने प्रलोभन का पांसा भी फेंका, लेकिन उसका भी कोई खास फायदा नहीं हुआ. इस लड़ाई में पहली सफलता 28 फरवरी, 2022 को मिली जब कलकत्ता हाइकोर्ट के जस्टिस अभिजीत गंगोपाध्याय की एकल जज की पीठ ने कथित गड़बड़ी के लिए सीबीआइ को जांच का आदेश दे दिया. इसके बाद 5 मई को सरकार को पीछे हटना पड़ा—उसने प्रदर्शनकारियों को नौकरी देने के लिए 5,000 अतिरिक्त अध्यापकों की भर्ती करने की घोषणा कर दी.

सरकारी अध्यापकों की भर्ती एसएलएसटी के जरिए स्कूल सर्विस कमिशन (एसएससी) करता है. 2017 में परीक्षा (इसमें 5,00,000 अभ्यर्थी बैठे थे) के तुरंत बाद 2,030 याचिकाकर्ताओं ने तरह-तरह की गड़बड़ियों का आरोप लगाते हुए कलकत्ता हाइकोर्ट में याचिका लगा दी थी. लंबे अदालती मुकदमे के दौरान नियत प्रक्रिया के उल्लंघन के करीब 6,200 मामले सामने आए. 

वेबसाइट पर पूरे नतीजों को प्रकाशित करने की सामान्य परिपाटी के बजाए उम्मीदवारों को एक पोर्टल में अपना नाम और रोल नंबर भरना होता था. इसके बाद एक क्रिप्टिक सिग्नल के जरिए उन्हें बताया जाता था कि वे क्वालीफाइ कर चुके हैं और इंटरव्यू के लिए योग्य हैं. उसमें लिखा होता था: ''(प्रमाणपत्रों के) सत्यापन के लिए आमंत्रण.'' युवा छात्र अधिकार मंच के अध्यक्ष मोहिदुल इस्लाम कहते हैं, ''चूंकि सफल उम्मीदवारों की कोई सूची नहीं थी, इसलिए यह पता लगाने का कोई तरीका नहीं था कि इंटरव्यू और नियुक्ति पत्र पाने के लिए किसे बुलाया गया है. इसमें हमें कोई छुपा हुआ एजेंडा नजर आया.''

कुछ छात्र अंकों और रैंक के साथ पूरा नतीजा प्रकाशित करने की मांग को लेकर 29 दिन की भूख हड़ताल पर चले गए, कुछ ने अदालत का रास्ता अपनाया. हाइकोर्ट के एक आदेश के तहत एसएससी ने जनवरी 2019 में एक प्रिंटेड सूची पेश की, वह भी अपूर्ण थी—एक ऐसी सूची जिसमें नाम, रोल नंबर और रैंक तो थे लेकिन अंक नहीं थे. एक प्रतीक्षा सूची भी प्रकाशित की गई. अंकों की लगातार अनुपस्थिति से संदेह बढ़ गया कि बहुत से असफल उम्मीदवारों को इंटरव्यू के लिए बुला लिया गया था. इसके अलावा, प्रतीक्षा सूची में काफी नीचे रहने वाले उम्मीदवारों की रैंक कथित रूप से ऊपर कर दी गई. 

इस्लाम कहते हैं, ''यह पता लगाने का कोई तरीका नहीं था कि क्या सही उम्मीदवारों को इंटरव्यू के लिए बुलाया गया. यहां तक कि जिन लोगों के पास बीएड की डिग्री नहीं थी, उनका नाम भी सूची में आ गया जबकि बीएड की डिग्री अनिवार्य थी.'' मंच के सुदीप मंडल के मुताबिक, ''कम अंक पाने वाले करीब 100 उम्मीदवारों को नौकरी मिल गई और ऊंची रैंक के उम्मीदवार बाहर रह गए.''

अदालत ने एसएससी को अपने कर्तव्य का ठीक से निर्वहन न करने के लिए जब लताड़ लगाई तो मुख्यमंत्री ममता बनर्जी मार्च 2019 में धरनास्थल पर पहुंचीं. उन्होंने 10 सदस्यीय जांच समिति बनाई जिसमें पांच उम्मीदवार और शिक्षा विभाग के पांच अधिकारी शामिल थे. बाद में उनमें से कुछ उम्मीदवारों को कथित रूप से नौकरी का लालच देकर खरीद लिया गया. इससे आंदोलन का स्वर कुछ वक्त के लिए धीमा पड़ गया.

सरकार ने इस मामले की जांच के लिए 1 नवंबर, 2019 को पांच सदस्यों का एक पैनल बनाया जिसमें एसएससी के संयोजक और सलाहकार शांति प्रसाद सिन्हा, शिक्षा विभाग के उपनिदेशक आलोक कुमार सरकार, तत्कालीन शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी के सचिव सुकांत आचार्जी, पी.के. बंद्योपाध्याय (मंत्री के ओएसडी) और वरिष्ठ विधि अधिकारी टी. पांजा शामिल थे. प्रदर्शनकारियों का कहना था कि पैनल के प्रस्ताव सही उम्मीदवारों के हितों पर चोट करने वाले थे. एक उम्मीदवार के वकील फिरदौस शमीम कहते हैं, ''पैनल मनमाने तरीके से काम कर रहा था, उनमें से पीड़ित उम्मीदवारों का प्रतिनिधित्व करने वाला कोई नहीं था.'' अदालत ने 12 मई को अपने नए आदेश में एसएससी से कहा कि वह ताजा सूची प्रकाशित करे जिसमें मूल्यांकन श्रेणियों के साथ अंकों की स्पष्ट जानकारी दी गई हो. 

इन कथित अनियमितताओं की सीबीआइ जांच का आदेश देने से पहले, जस्टिस गंगोपाध्याय नवंबर, 2021 में गैर-टीचिंग स्टाफ की भर्ती में अनियमितताओं के आरोपों को लेकर सीबीआइ की प्राथमिक जांच का आदेश दे चुके थे. गंगोपाध्याय ने फरवरी 2022 में जांच का एक अन्य आदेश भी दिया था, लेकिन उस आदेश पर जस्टिस हरीश टंडन और रवींद्रनाथ सामंत की खंड पीठ ने स्थगन का आदेश लगा दिया था. कथित घोटाले पर एक स्वतंत्र रिपोर्ट देने के लिए रिटायर्ड जस्टिस रंजीत बाग के अधीन एक न्यायिक जांच शुरू की गई थी. जस्टिस बाग की रिपोर्ट में बताया गया था कि सरकारी स्कूलों के ग्रुप सी (लिपिक के पद) और ग्रुप डी की भर्ती में करीब 990 अवैध नियुक्तियां की गई थीं.

गंगोपाध्याय ने 12 अप्रैल को पाया कि ''मंत्री के निर्देश के बिना शिक्षा विभाग का कोई भी अधिकारी इस तरह का काम नहीं कर सकता.'' उन्होंने सीबीआइ को अधिकार दिया कि जरूरत हो तो अध्यापकों की भर्ती के मामले में वह पार्थ चटर्जी को पूछताछ के लिए हिरासत में ले सकती है. लेकिन एक खंड पीठ ने उन्हें चार हफ्ते की मोहलत दे दी जो इस महीने खत्म होगी. चटर्जी ने इस मामले में अपनी किसी भी तरह की भागीदारी से इनकार किया है. सीबीआइ ने सिन्हा से गहन पूछताछ की, जिन्होंने कथित तौर पर बताया कि उन्होंने प्रभावशाली लोगों के दिए हुए नामों को केवल अपलोड किया था.

छात्रों और शिक्षकों के मुताबिक, बीरभूम जिले में लाभपुर ब्लॉक के जमना, काजी पाड़ा, वत्रा और किरनाहर के करीब 400 उम्मीदवारों को एक प्रभावशाली मंत्री के सुरक्षा अधिकारी के जरिए मेरिट सूची में जगह मिली, जो इस क्षेत्र के रहने वाले हैं. लाभपुर के एक स्कूल अध्यापक आरोप लगात हैं, ''हर उम्मीदवार ने 12 लाख रु. दिए, जो नियुक्ति पत्र मिलने और दो महीने का वेतन मिलने के बाद दिए जाने थे.'' टीएमसी के एक नेता कहते हैं, ''बीरभूम के 11 विधायकों का 100 से 500 के बीच कोटा था.'' नादिया जिले में तेहट्टा और पलाशीपाड़ा से भी भ्रष्टाचार की खबरें थीं. बहुत से लोगों ने टीएमसी विधायक तपस साहा की ओर उंगलियां उठाई थीं जिन्होंने कथित तौर पर अध्यापक की नौकरी के लिए साहा को पैसे दिए थे. साहा ने इन आरोपों से इनकार किया है.

वहीं, राज्यसभा सांसद और टीएमसी के प्रवक्ता सुखेंदु शेखर ने कहा, ''ये आरोप बेबुनियाद हैं और राजनीति से प्रेरित हैं. जो लोग टीएमसी को बदनाम करना चाहते हैं, उन्हें मध्य प्रदेश के व्यापम (परीक्षा और भर्ती) घोटाले पर बात करनी चाहिए. मुख्यमंत्री ने इस समस्या को हल करने के लिए मानवीय आधार पर कदम उठाया है.'' वाकई, ममता ने पदों का निर्माण करने और गलत को सही करने का फैसला किया है, लेकिन इस मामले की सीबीआइ जांच चल रही है और इसमें अदालत की मंजूरी की जरूरत होगी. केवल तभी पीड़ित लोगों का लंबा इंतजार खत्म हो सकता है.

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