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राजस्थानः (सियासी) दुर्ग हमारा, बाघ तुम्हारे!

नए रिजर्व के लिए एनटीसीए की मंजूरी हासिल करना आसान नहीं है. राज्य सरकार को मेरी कोशिश को बेकार नहीं जाने देना चाहिए

कहां तुम चले गए सरिस्का में सबसे ज्यादा शावकों का पिता एसटी 13 बाघ फरवरी से नहीं दिखा
कहां तुम चले गए सरिस्का में सबसे ज्यादा शावकों का पिता एसटी 13 बाघ फरवरी से नहीं दिखा
अपडेटेड 31 मार्च , 2022

सरिस्का में 2003-04 में बाघों के शिकार के दो मामलों के आखिरी आरोपी बाल्या बावरिया को जब सीबीआइ ने इसी 11 मार्च को गिरफ्तार किया, तो राजस्थान के अलवर के इस टाइगर रिजर्व से बाघों के सफाए की यादें ताजा हो गईं. उस बहुत खराब अनुभव के बाद भारत में पहली बार बाघों को एक जगह से दूसरे स्थान—सरिस्का—पर बसाया गया, जिसकी शुरुआत 2008 में हुई. सरिस्का में उस प्रयोग के दौरान आए कई तनाव भरे पलों और नाकामियों के बावजूद राजस्थान के प्रमुख राजनेता रणथंभौर से बाघों के सुरक्षित ठिकाने बनाने के लिए इसे दोहराने को इच्छुक हैं. वे ऐसी चार जगहों पर उन्हें ले जाना चाहते हैं जहां कभी बाघ रहा करते थे. रणथंभौर राष्ट्रीय उद्यान अपनी पूरी क्षमता तक भर चुका है, ऐसे में बाघ बाहर निकलकर एक-दूसरे पर यहां तक कि मनुष्यों पर भी हमले कर रहे हैं. अगले साल विधानसभा चुनाव हैं. ऐसे में राजनेता भी अपने-अपने चुनाव क्षेत्रों में बाघों के नए आवास स्थापित करवाने के लिए जोर-आजमाइश कर रहे हैं ताकि वे इसे उपलब्धि के रूप में दिखा सकें.

पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और उनके सांसद पुत्र दुष्यंत सिंह मुकुंदरा हिल टाइगर रिजर्व में झालावाड़ जिले के दरा रेंज में बाघों का पुनर्वास करने के इच्छुक हैं. वहीं, राज्य के शहरी विकास और आवास मंत्री शांति धारीवाल की पसंद उसी रिजर्व का एक अलग हिस्सा—कोटा जिले में सेल्जर रेंज है. लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला बूंदी जिले के रामगढ़ विषधारी में बाघों को स्थानांतरित करवाना चाहते हैं, लेकिन राजसमंद से सांसद दीया कुमारी अपने निर्वाचन क्षेत्र में पड़ने वाले कुंभलगढ़ का नाम आगे बढ़ा रही हैं. हालांकि पंजाब के पूर्व राज्यपाल और सरिस्का रिजर्व में पुनर्वास के टास्क फोर्स प्रमुख रहे वी.पी. सिंह बदनौर जोर देकर कहते हैं कि नए रिजर्व की योजना बनाने से पहले वहां अधिक बाघ लाए जाने चाहिए.

राजस्थानः (सियासी) दुर्ग हमारा, बाघ तुम्हारे!
राजस्थानः (सियासी) दुर्ग हमारा, बाघ तुम्हारे!

राजस्थान के प्रधान मुख्य वन संरक्षक और फॉरेस्ट फोर्स के प्रमुख दीप एन. पांडे कहते हैं, ''बाघों का नई जगह पर स्थानांतरण वैज्ञानिक फैसला होना चाहिए. इसके लिए बाघों के पारिस्थितिकी तंत्र के पुनर्निर्माण में कई साल की तैयारी और फिर कई साल की लगातार निगरानी की जरूरत होती है ताकि बाघ नई जगह के अनुकूल हो सकें.'' उन्हीं की तरह कई अधिकारी बताते हैं कि सरिस्का अभी सीखने की प्रक्रिया से ही गुजर रहा है और वे अभी इसे पूरी तरह से कामयाब घोषित करने से बचते हैं. पिछले साल तक वे अत्यधिक लैंगिक असंतुलन को दूर करने के लिए बाघों को सरिस्का लाने की मांग पर विचार कर रहे थे. लेकिन दो बाघों के आगमन से माना जाता है कि वे कुछ शावकों के पिता बने हैं और कुछ नर शावकों का भी जन्म हुआ है. इससे वह योजना फिलहाल टाल दी गई है.

डेढ़ महीने पहले जब नए शावकों के जन्म से सरिस्का में बाघों की संख्या—पिछले कुछ दशकों में सबसे अधिक—27 हो गई थी, रिजर्व में सबसे अधिक शावकों का पिता बाघ लापता हो गया. एसटी 13 नाम का यह बाघ कम से कम आठ शावकों का पिता था. अधिकारी उसके लापता होने को एक चेतावनी के रूप में देखते हुए इशारा करते हैं कि किसी रिजर्व में कुछ भी गलत हुआ नहीं कि सब बंटाढार हो सकता है. नए अभयारण्यों की मांग से चिंतित वे हैं जिन्हें स्थानांतरण का जिम्मा सौंपा गया है. वे जानते हैं कि किसी भी स्थान को बाघों का स्थायी आवास बनाने में दीर्घकालिक और लगातार प्रयास की जरूरत होती है.

सरिस्का और पन्ना (मध्य प्रदेश) में बाघों की आबादी का सफाया होने के बाद कुछ वर्षों के भीतर ही वहां बाघों को दोबारा लाया गया. बाघों को छोड़ दें तो वहां उनके रहने-बसने के लिए जरूरी जैव विविधता में किसी तरह का नुक्सान नहीं हुआ था. लेकिन नई प्रस्तावित जगहों पर दशकों से बाघ नहीं हैं और बाघों के शिकार के आधार समेत पारिस्थितिकी तंत्र में भारी क्षति देखी गई है. सरिस्का और पन्ना में उनके सफाये की मुख्य वजह अवैध शिकार थी. ऐसे में वहां बाघों का पुनर्वास शिकार रोकने पर केंद्रित था. अन्य जगहों से बाघों के सफाये का अभी पर्याप्त विश्लेषण नहीं किया गया है. अधिकारियों के मुताबिक, मुकुंदरा हिल टाइगर रिजर्व पुनर्वास की नाकामी की मिसाल है. उसने 2020 में कुछ दिनों के भीतर तीन बाघों और चार शावकों को खो दिया था, तो एक बाघिन का जख्मी हो जाने के बाद इलाज करना पड़ा.

रणथंभौर से जिन चार जगहों पर बाघों को पुनर्वास की मांग की जा रही है, उनमें से रामगढ़ विषधारी को राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) ने राज्य के चौथे बाघ अभयारण्य के रूप में मंजूरी दे दी है. रणथंभौर राष्ट्रीय उद्यान के नजदीक, यह ओम बिरला के बूंदी-कोटा संसदीय क्षेत्र में है. इसे बाघ अभयारण्य घोषित करने की अधिसूचना पाइपलाइन में है. बाघ इस क्षेत्र में कभी-कभी आते हैं, लेकिन वे शायद ही कभी यहां लंबे वक्त तक रहते हैं. फिर भी, इसके उत्तर-पूर्व की ओर रणथंभौर से इसकी निकटता ने रामगढ़ विषधारी को नए अभयारण्य के लिए अनुकूल बना दिया है. इसके दक्षिण में मुकुंदरा हिल का सेल्जर रेंज है. रणथंभौर और सरिस्का के बाद वह राजस्थान का तीसरा बाघ अभयारण्य है.

झालावाड़ जिले के झालरापाटन से विधायक और पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे तथा उनके बेटे और झालावाड़-बारां से सांसद दुष्यंत रामगढ़ विषधारी से पहले 2017 में मुकुंदरा को टाइगर रिजर्व घोषित कराने में कामयाब रहे थे. और फिर उन्होंने बाघों को दरा रेंज में स्थानांतरित करवा दिया था, जो कोटा जिले के सेल्जर रेंज की बजाए झालावाड़ में फैला हुआ है. राज्य के कुछ वन्यजीव अधिकारियों का तर्क था कि दरा में बाघों के भोजन के लिए शिकार का पर्याप्त इंतजाम नहीं था. लेकिन उनके विरोध के बावजूद राजे और दुष्यंत एनटीसीए की मंजूरी हासिल करने में कामयाब रहे थे. दरा में निर्मित एक विशाल बाड़े में बाघ के जोड़े को रखना सेल्जर से ज्यादा सुरक्षित दांव बताया गया था.

वहां कुछेक साल में शिकार आधार मजबूत हुआ है, लेकिन उसके आसपास मानव आबादी भी ज्यादा है. हालांकि 24 हेक्टेयर का वह बाड़ा भी बाघों को नहीं बचा पाया. असल में, कुछ लोगों को संदेह है कि वह बाड़ा उनकी मौत का कारण बना क्योंकि नवजात शावकों के साथ बाघिन ने आक्रामक बाघ से दूर जाने की कोशिश की तो उसे बचाव के लिए कोई जगह नहीं मिली.

एक या दो बाघों को फिर से दरा रेंज में छोड़ने की योजना है. वहां मंत्री धारीवाल पहले सेल्जर में बाघों को छोड़ने की मांग कर रहे हैं. कोटा धारीवाल का निर्वाचन क्षेत्र है. हालांकि अधिकारियों की सलाह है कि रणथंभौर से सटे कैला देवी सरीखे अभयारण्यों को ज्यादा बाघों के रहने लायक विकसित किया जाना चाहिए. कैला देवी अभयारण्य अधिकतर समय करीब आधा दर्जन बाघों का आवास होता है. उनका कहना है कि एक और विकल्प सरिस्का को राष्ट्रीय उद्यान का दर्जा हासिल करने और इसकी क्षमता को बढ़ाकर 40 बाघों के आवास में तब्दील करने के लिए सरिस्का के भीतर स्थित गांवों को हटाना है.

वहीं कुंभलगढ़ के लिए सांसद दीया कुमारी के जोर पर एनटीसीए ने कहा था कि अगर कुंभलगढ़़ को बाघों के अनुकूल बनाने के लिए उसकी सिफारिशों पर राज्य सरकार काम करती है तो दो साल में वहां बाघों का पुनर्वास शुरू हो सकता है. लेकिन छह महीने बीत जाने के बाद भी कांग्रेस सरकार ने उसके लिए कोई कदम नहीं उठाया है. दीया कुमारी का मानना है कि कुंभलगढ़ में अभयारण्य होने से यह पर्यटन स्थल के रूप में तब्दील हो जाएगा, जहां वन्यजीव और विरासत दोनों का आकर्षण मौजूद होगा. उनके मुताबिक, इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था में भी जबरदस्त उछाल आएगा. वे कहती हैं, ''नए रिजर्व के लिए एनटीसीए की मंजूरी हासिल करना आसान नहीं है. राज्य सरकार को मेरी कोशिश को बेकार नहीं जाने देना चाहिए.''

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