
इटावा जिले से मैनपुरी को जाने वाले हाइवे पर 25 किलोमीटर की दूरी पर समाजवादी पार्टी (सपा) के संस्थापक मुलायम सिंह यादव का पैतृक गांव सैफई पड़ता है. हाइवे पर पांच किलोमीटर आगे चलने पर सैफई की सीमा से सटे जैन इंटर कॉलेज, करहल से मैनपुरी जिले की करहल विधानसभा सीट की सीमा शुरू होती है. वर्ष 1955 में मुलायम ने जैन इंटर कॉलेज में कक्षा 9 में प्रवेश लिया था. बाद में 1963 में इसी कॉलेज में उन्होंने सहायक अध्यापक के रूप में नौकरी शुरू की थी. 1974 में मुलायम राजनीतिशास्त्र विभाग के प्रवक्ता बने. उनकी सियासी यात्रा का गवाह रहे इस कॉलेज में जश्न का माहौल है. मुलायम के बेटे और सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव करहल विधानसभा सीट से चुनाव लड़ रहे हैं. 31 जनवरी को नामांकन के लिए जाने से पहले पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव इस कॉलेज पहुंचे और यहां के शिक्षकों का आशीर्वाद लिया. 2022 के विधानसभा चुनाव के बाद यूपी में सपा सरकार बनने पर इस कॉलेज को विश्वविद्यालय बनाने का वादा करके अखिलेश करहल से सपा उम्मीदवार के रूप में नामांकन करने मैनपुरी चले गए.
अखिलेश, मुलायम के संसदीय क्षेत्र मैनपुरी में शामिल करहल सीट से पहली बार चुनाव लड़ रहे हैं. आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे से सटी करहल सीट सपा का गढ़ रही है. 1992 में सपा के गठन के बाद से हुए छह विधानसभा चुनावों में पांच बार सपा ने करहल सीट जीती है. केवल 2002 में भाजपा ने इस पर जीत हासिल की थी. 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की लहर के दौरान भी करहल सीट पर सपा ने कब्जा जमाया था. वैसे, सियासी रूप से यादव बेल्ट के रूप में पहचाने जाने मैनपुरी-इटावा के आसपास के जिलों में 2017 में सपा ने अपने गठन के बाद से अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन किया था (देखें ग्राफिक्स). वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में यादव बेल्ट के जिलों की कुल 28 सीटों में से 26 जीतने वाली सपा 2017 के विधानसभा चुनाव में महज छह सीट पर सिमट गई थी. अखिलेश एक रणनीति के तहत करहल सीट से चुनाव लड़ रहे हैं.

इटावा में के.के. पीजी कॉलेज में अर्थशास्त्र विभाग की प्रमुख पद्मा त्रिपाठी बताती हैं, ''मुलायम सिंह यादव का पैतृक गांव सैफई मैनपुरी, फिरोजाबाद, औरेया समेत कई जिलों की राजनीति का केंद्रबिंदु है. ये वे जिले हैं जहां की हर विधानसभा सीट पर यादव जाति का बाहुल्य है. इसके अलावा 2017 के विधानसभा चुनाव में मुलायम सिंह यादव परिवार के अंदरूनी विवाद का असर इन जिलों के चुनाव नतीजों पर साफ दिखा था. सैफई से सटी करहल सीट से चुनाव लड़कर अखिलेश सपा समर्थक वोटबैंक को सकारात्मक संदेश देना चाहते हैं. इसका असर प्रदेश में पश्चिम से लेकर पूरब तक उन 100 विधानसभा सीटों पर भी पड़ेगा जहां यादव जाति का प्रभाव है.''
मुलायम परिवार में एकता कायम करने के लिए अखिलेश ने अपने चाचा शिवपाल सिंह यादव का भी साथ लिया है. अखिलेश के चुनाव प्रचार में व्यस्त होने के कारण मुलायम परिवार के सदस्यों ने करहल सीट पर उनके प्रचार की कमान संभाल ली है. मुलायम के चचेरे भाई और राज्यसभा सदस्य रामगोपाल यादव, बदायूं से पूर्व सांसद धर्मेंद्र यादव, मैनपुरी से पूर्व सांसद तेज प्रताप सिंह और यूपी विधान परिषद के सदस्य अरविंद यादव अलग-अलग टीम बनाकर करहल सीट से अखिलेश की जीत के लिए पूरा जोर लगा रहे हैं. अरविंद बताते हैं, ''अखिलेश जी ने करहल से चुनाव लड़कर सपा संगठन में उत्साह भरा है. इससे आगरा, अलीगढ़, मेरठ से लेकर आजमगढ़ और मिर्जापुर मंडल तक सपा के जनाधार में बढ़ोतरी होगी.''
भाजपा की जातीय गोलबंदी
अखिलेश के सामने यादव-बेल्ट में सपा का पुराना गौरव वापस लाने की चुनौती है तो भाजपा के सामने 2017 विधानसभा चुनाव का प्रदर्शन दोहराने का कठिन लक्ष्य है. सपा के सबसे मजबूत गढ़ करहल में सेंध लगाने के लिए भाजपा के पास कोई उम्मीदवार नहीं था. काफी मंथन के बाद भाजपा ने केंद्र की मोदी सरकार में कानून और न्याय विभाग के राज्य मंत्री एस.पी. सिंह बघेल को करहल सीट से उम्मीवार बनाकर जातिगत समीकरणों को साधने की कोशिश की है. पद्मा त्रिपाठी बताती हैं, ''करहल विधानसभा सीट पर सर्वाधिक यादव मतदाता हैं इसीलिए सपा हमेशा यहां पर यादव जाति के नेता को उम्मीदवार बनाती रही है. करहल में करीब 35 हजार शाक्य, 30 हजार बघेल और 30 हजार ठाकुर मतदाता हैं. शाक्य और ठाकुर मतदाताओं को भाजपा का कोर वोटबैंक माना जाता है. बघेल को चुनाव लड़ाने के पीछे भाजपा की रणनीति गैर-यादव ओबीसी मतों के ध्रुवीकरण की है.'' बघेल कभी मुलायम सिंह के करीबी हुआ करते थे. 1989 में जब मुलायम पहली बार मुख्यमंत्री बने उस वक्त बघेल यूपी पुलिस में सब-इंस्पेक्टर थे.
वे 1998, 1999 और वर्ष 2004 में सपा उम्मीदवार के रूप में जलेसर से सांसद चुने गए. मुलायम से अनबन होने के कारण वे 2008 में सपा से निष्कासित कर दिया गया. बघेल ने 2009 में फिरोजाबाद लोकसभा सीट पर सपा उम्मीदवार अखिलेश के सामने बसपा उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा था. 2009 में फिरोजाबाद लोकसभा सीट पर हुए उपचुनाव में बघेल ने अखिलेश की पत्नी और सपा उम्मीदवार डिंपल यादव को चुनौती थी. 2014 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने फिरोजाबाद लोकसभा सीट पर सपा उम्मीदवार और राम गोपाल के बेटे अक्षय यादव के खिलाफ चुनाव लड़ा था. पर मुलायम परिवार के सदस्यों के सामने बघेल को हमेशा चुनावी हार का सामना करना पड़ा है. करहल में लगातार प्रचार में व्यस्त बघेल वह क्रम तोड़ना चाहते हैं. वे कहते हैं, ''गैर-यादव ओबीसी जातियों के साथ सवर्ण जातियां भाजपा के साथ हैं, इससे भाजपा की चुनौती काफी मजबूत है.''
यादव बेल्ट की अन्य विधानसभा सीटों पर भी भाजपा ने कभी मुलायम के करीबी रहे गैर-यादव नेताओं को मैदान में उतारा है. फिरोजाबाद जिले की शिकोहाबाद विधानसभा सीट पर ओम प्रकाश निषाद और मैनपुरी की किश्नी सुरक्षित सीट पर दलित नेता आशू दिवाकर को भाजपा ने उम्मीदवार बनाया है. सपा नेता और ब्लॉक प्रमुख, सैफई संतोष शाक्य बताते हैं, ''मैनपुरी-फिरोजाबाद जिले समेत आसपास की कई विधानसभा सीटों पर भाजपा के पास उम्मीवार ही नहीं थे, इसीलिए इन्होंने दूसरी पार्टियों के नेताओं को उम्मीदवार बनाया है. यह संकेत है कि 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन खराब रहने वाला है.''
शाक्य वोटों की जंग
मैनपुरी, इटावा समेत सपा के गढ़ वाले इलाकों में शाक्य मतों के लिए रोचक जंग लड़ी जा रही है. इटावा निवासी और अखिल भारतीय शाक्य महासभा के अध्यक्ष आलोक सिंह शाक्य बताते हैं, ''यूपी में शाक्य, मौर्य, कुशवाहा और सैनी, कृषि पर निर्भर एक जैसी सामाजिक संरचना वाली पिछड़ी जातियां हैं. पूर्वांचल में मौर्य जाति प्रभावी है तो कानपुर और आगरा के बीच शाक्य पिछड़ी जाति की बहुलता है. यादव बेल्ट के रूप में प्रचलित इन आठ जिलों की 28 विधानसभा सीटों में प्रत्येक पर 12 से 15 फीसद शाक्य मतदाता हैं. पार्टियां यादव जाति के बढ़ते सियासी प्रभाव के विरोध में शाक्य मतदाताओं को लामबंद करती रही हैं.'' सपा के आधार वोटबैंक यादव जाति के विरोध में शाक्य मतों को पाने का पहला प्रयास बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने किया. 2004 के लोकसभा चुनाव में मैनपुरी सीट से सपा प्रत्याशी मुलायम सिंह के सामने बसपा ने अशोक शाक्य को उम्मीदवार बनाया था. अशोक भले ही तीन लाख मतों से चुनाव हार थे पर इन्हें बड़ी संख्या में शाक्य मतदाताओं का समर्थन मिला था.
इसके बाद मैनपुरी लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने वाले मुलायम के सामने बसपा ने 2009 के लोकसभा चुनाव में अशोक और 2014 के लोकसभा चुनाव में संघमित्रा मौर्य को उम्मीदवार बनाया. 2014 के लोकसभा चुनाव में यूपी की 80 में से 71 लोकसभा सीटें जीतने वाली भाजपा ने मैनपुरी में बसपा के समर्थक शाक्य मतों में सेंध लगानी शुरू कर दी थी. 2014 में मैनपुरी लोकसभा सीट पर हुए उपचुनाव में भाजपा ने प्रेम सिंह शाक्य को उम्मीदवार बनाया था. आलोक शाक्य बताते हैं, ''प्रेम सिंह शाक्य करीब तीन लाख मतों से चुनाव हार गए, पर भाजपा यादव मतदाताओं के विरोध में शाक्य मतों को बसपा से खींचने में कामयाब हो गई थी.''
वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने करहल समेत कुल चार विधानसभा सीटों पर शाक्य जाति के उम्मीदवार उतारे थे. इनमें करहल में भाजपा हार गई थी और अमृतपुर, बिधुना और पटियाली सीटों पर शाक्य जाति के उम्मीदवारों को जीत मिली थी. शाक्य मतों पर पकड़ बनाए रखने के लिए भाजपा ने नवंबर, 2020 में औरैया जिले में पार्टी की पूर्व जिला अध्यक्ष गीता शाक्य को राज्यसभा भेजा था. 2021 में भाजपा ने गीता को प्रदेश महिला मोर्चा की अध्यक्ष बनाया. औरेया के एक निजी कॉलेज में प्राचार्य अमतेश शाक्य बताते हैं, ''2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य को मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर पेश किया था.
इसके कारण शाक्य जातियों ने भाजपा को एकतरफा समर्थन दिया था. चुनाव के बाद जिस तरह केशव मौर्य योगी सरकार में हाशिए पर रहे, उससे शाक्य मतदाताओं में भाजपा के प्रति नाराजगी है.'' भाजपा छोड़कर सपा में आए स्वामी प्रसाद मौर्य मैनपुरी, औरेया में सभा करके भाजपा पर मौर्य, शाक्य और कुशवाहा जातियों की उपेक्षा का आरोप लगा रहे हैं. वहीं, भाजपा ने उपमुख्यमंत्री केशव मौर्य को शाक्य मतदाताओं को मनाने का जिम्मा सौंपा है. भाजपा ने इटावा लोकसभा सीट से दो बार सांसद रहे कद्दावर नेता रघुराज शाक्य को शामिल कर लिया है.
मुलायम परिवार में सेंध
भाजपा ने 2022 के चुनावों में मुलायम परिवार के अंदरूनी विवाद का लाभ लेने की कोशिश की है. करहल से सटी फिरोजाबाद जिले की सिरसागंज विधानसभा सीट से हरिओम यादव लगातार दो बार विधायक बने हैं. सपा के संस्थापक सदस्यों में से एक हरिओम के मुलायम से बेहद नजदीकी रिश्ते हैं. मुलायम के बड़े भाई रतन सिंह यादव के बड़े बेटे रणवीर सिंह यादव की शादी हरिओम के भाई राम प्रकाश की बेटी मृदुला यादव से हुई थी. पिछले वर्ष मई में फिरोजाबाद जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में हरिओम ने भाजपा नेता ठाकुर जयवीर सिंह की पुत्रवधू हर्षिमता सिंह का समर्थन किया था. फलस्वरूप भाजपा समर्थित हर्षिमता जिला पंचायत अध्यक्ष चुनी गईं. इसके बाद से हरिओम और मुलायम परिवार के बीच दूरी बढ़ती गई. 13 जनवरी को हरिओम भाजपा में शामिल हो गए. भाजपा ने उन्हें को सिरसागंज सीट से उम्मीदवार बनाया है. वे कहते हैं, ''सपा के राष्ट्रीय महासचिव रामगोपाल यादव नहीं चाहते थे कि मैं उम्मीदवार बनूं. उन्होंने सपा के राष्ट्रीय महासचिव अखिलेश यादव के सामने मुझे सपा का टिकट मिलने पर आत्महत्या करने की धमकी दी थी. मैं नहीं चाहता था कि मेरी वजह से कोई आत्महत्या करे, इसलिए मैंने भाजपा ज्वाइन कर ली.''
रामगोपाल इन आरोपों को बकवास बताते हैं, ''हरिओम यादव लगातार सपा विरोधी गतिविधियों में लिप्त रहे, इसीलिए इन्हें पार्टी से बाहर निकाला गया.'' 2021 के अप्रैल में पंचायत चुनाव में संध्या यादव के भी बागी तेवर दिखे. संध्या मुलायम के छोटे भाई अभयराम यादव की बेटी और धर्मेंद्र यादव की बहन हैं. संध्या ने भाजपा उम्मीदवार के तौर पर मैनपुरी में जिला पंचायत सदस्य का चुनाव लड़ा था, पर वे सपा उम्मीदवार से हार गई थीं.
परिवार के सदस्यों में एकता कायम करने के लिए अखिलेश ने अपने चाचा और प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (लोहिया) के संस्थापक शिवपाल सिंह यादव को साथ लिया है. शिवपाल सपा उम्मीदवार के रूप में इटावा की जसवंत नगर सीट से चुनाव लड़ रहे हैं. शिवपाल कहते हैं, ''परिवार को तोड़ने की भाजपा की कोशिशों का जवाब जनता विधानसभा चुनाव में देगी. सपा को जीत दिलाने के लिए पूरा मुलायम परिवार एक है.''
विकास पर सवाल
मैनपुरी के भोगांव विधानसभा क्षेत्र में ट्रामा सेंटर का निर्माण बड़ा चुनावी मुद्दा बन गया है. पिछली सपा सरकार ने मैनपुरी के बेवर इलाके में जीटी रोड के किनारे अत्याधुनिक ट्रामा सेंटर बनाने की घोषणा की थी. तीन करोड़ रुपए में बनने वाले ट्रामा सेंटर के भवन का निर्माणकार्य 14 अगस्त, 2016 को शुरू हुआ. एक वर्ष के भीतर भवन बनकर तैयार होना था. दो महीने बाद जमीन के विवाद के कारण ट्रामा सेंटर का निर्माण कार्य रोक दिया गया. पांच साल से अधिक समय बीतने के बाद मैनपुरी के लोगों के लिए ट्रामा सेंटर एक स्वप्न ही बना हुआ है.
इसी तरह सैफई को अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस करने के लिए शुरू किया गया अरबन डेवलेपमेंट प्रोजेक्ट अधूरा पड़ा है. पूर्ववर्ती अखिलेश यादव सरकार ने अप्रैल, 2016 में 300 करोड़ रुपए की लागत वाले इस प्रोजेक्ट की शुरुआत की थी. इसके तहत सैफई में सीवेज और ड्रेनेज की व्यवस्था, बिजली के तारों को अंडरग्राउंड करना, सड़कों को चौड़ा करना, साइकिल ट्रैक का निर्माण जैसे कार्य किए जाने थे. पर भाजपा सरकार बनने के बाद से प्रोजक्ट अधूरा पड़ा है. प्रोजेक्ट के निर्माण से जुड़ी एजेंसी राजकीय निर्माण निगम के एक अधिकारी नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं, ''सीवेज और ड्रेनेज के लिए 40 करोड़ रुपए, भूमिगत तार बिछाने के लिए 19 करोड़ रुपए बजट की मांग सरकार से की गई है. जब तक पहले चरण के सारे भूमिगत कार्य नहीं हो जाते हैं तब तक इस प्रोजेक्ट के दूसरे चरण का निर्माण कार्य नहीं शुरू किया जा सकता.''
बदायूं के पूर्व सांसद और अखिलेश यादव के चचेरे भाई धर्मेंद्र यादव बताते हैं, ''योगी सरकार ने पिछले पांच साल में इटावा, मैनपुरी समेत आसपास के जिलों में विकास योजनाओं के क्रियान्वयन में भेदभाव किया है. सपा सरकार की योजनाओं के लिए बजट रोककर भाजपा सरकार ने जनता के साथ अन्याय किया है. चुनाव में यह एक बड़ा मुद्दा है.''

