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पश्चिम बंगालः दीदी-भतीजे के बीच खिंचने लगी तलवार

कोलकाता के पुलिस आयुक्त के चयन को लेकर भी दोनों शक्ति केंद्रों के बीच मतभेद सामने आए थे. ममता की पसंद विनीत गोयल थे जबकि अभिषेक ज्ञानवंत सिंह के पक्ष में थे

अलग राह पर दक्षिण दिनाजपुर जिले में  टीएमसी की एक रैली में अभिषेक बनर्जी
अलग राह पर दक्षिण दिनाजपुर जिले में टीएमसी की एक रैली में अभिषेक बनर्जी
अपडेटेड 15 फ़रवरी , 2022

तृणमूल कांग्रेस के भीतर की 'पीढिय़ों की लड़ाई' के सोशल मीडिया पर आ जाने के लगभग एक पखवाड़े बाद पार्टी अध्यक्ष ममता बनर्जी ने आखिरकार 2 फरवरी को जल्दबाजी में आयोजित संगठनात्मक चुनावों में अपनी चुप्पी तोड़ी. अध्यक्ष पद पर दोबारा निर्विरोध निर्वाचित होने के बाद उन्होंने पहला काम पार्टी पर वर्चस्व प्रदर्शन का किया. पार्टीजन की चौतरफा खामोशी के बीच उन्होंने कहा, ''कोई नेता आसमान से नहीं टपकता. वह अपने काम के जरिए से ही नेता बनता है.'' बहुतों का मानना है कि उनकी यह टिप्पणी बगल में बैठे पार्टी में दूसरे नंबर के नेता और भतीजे अभिषेक तथा सोशल मीडिया पर बढ़-चढ़ कर उनके 'नेतृत्व गुणों' का प्रचार कर रही युवा ब्रिगेड पर थी. सोशल मीडिया पर अभिषेक के निर्वाचन क्षेत्र डायमंड हार्बर में गंगासागर मेले के दौरान कोविड प्रोटोकॉल को लागू करने के तरीके की खास तौर पर चर्चा हो रही थी.

यह घटनाक्रम 8 जनवरी का है, जब अभिषेक ने खुल कर कोविड के दौर में मेला आयोजित करने के खिलाफ टिप्पणी की थी, जबकि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता राज्य में ओमिक्रॉन पीड़ितों की संख्या में वृद्धि के बावजूद इसे ''लोक उत्सव'' के रूप में प्रचारित कर रही थीं. अभिषेक ने एक सीधी टिप्पणी करते हुए कहा था कि कोविड के तेजी से फैलने के समय ''राज्य और समाज को बचाने'' के लिए धार्मिक त्योहारों का ऐसा सामूहिक आयोजन रोका जाना चाहिए. मानो अपनी बात को ठीक साबित करने के लिए ही उन्होंने अपने निर्वाचन क्षेत्र में बड़े पैमाने पर कोविड परीक्षण अभियान चलाया और मेलार्थियों के लिए प्रोटोकॉल का सख्ती से पालन कराना पक्का किया. लोकसभा में पार्टी के मुख्य सचेतक और वरिष्ठ नेता कल्याण बनर्जी ने उस समय अभिषेक के सार्वजनिक टिप्पणी करने की गुस्ताखी पर सवाल उठाया था और इसी से पार्टी के पुराने वफादारों और अभिषेक-समर्थकों के बीच कटाक्षों का दौर शुरू हुआ था.

दरअसल, पिछले कुछ समय से स्थितियां भीतर ही भीतर खदबदा रही थीं. एक मजाक चल रहा था कि आप तृणमूल कालीघाट हैं या तृणमूल कैमक स्ट्रीट? (इसका संदर्भ कालीघाट में ममता के घर और कैमक स्ट्रीट में अभिषेक के कार्यालय से है.)

पिछले साल विधानसभा चुनावों के दौरान उम्मीदवारों के चयन के मामलों में भी दोनों शायद ही कभी एकराय रहे हों. वही क्यों, हाल ही हुए कोलकाता नगर निगम (केएमसी) के चुनावों में भी ऐसा ही हाल था. ये मतभेद उस समय सार्वजनिक हुए जब ममता ने स्थानीय चुनावों के लिए अभिषेक और चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर (पीके) की बनाई उम्मीदवारों की सूची को खारिज कर दिया. पीके ने ही पिछले साल की विधानसभा चुनाव जीतने में उनकी मदद की थी और अब टीएमसी थिंक-टैंक का हिस्सा हैं. सूत्रों का कहना है कि तृणमूल के इतिहास में पहली बार ममता और उनके भतीजे के बीच उम्मीदवारों के चयन को लेकर तीखी बहस भी हुई थी. 

यही मुद्दे 4 फरवरी को भी उभरे जब पार्टी के आइटी सेल ने 108 नगरपालिकाओं के चुनाव के लिए उम्मीदवारों की सूची पार्टी की वेबसाइट पर अपलोड की. जल्द ही नेतृत्व को इसे नकली सूची के रूप में सार्वजनिक रूप से खारिज करने के लिए मजबूर होना पड़ा. पार्टी के एक विधायक ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि ''इस सूची पर वरिष्ठ नेताओं पार्थ चटर्जी और सुब्रत बख्शी के हस्ताक्षर नहीं थे जिन्हें दीदी ने यह काम सौंपा था. हमें संदेह है कि इसके पीछे पीके की टीम है जो पार्टी की आइटी सेल संभालती है. यह सूची पीके के इच्छानुसार बनी थी, जिसे नेतृत्व ने खारिज कर दिया.''

पीके और अभिषेक के बारे में कहा जाता है कि टीएमसी में सुधार के बारे में दोनों एकराय हैं, इसलिए कोई यह भी नहीं पूछ रहा है कि सूची तैयार करने में पीके की मदद किसने की. एक सूत्र का कहना था कि ''पीके की लगभग 30 फीसदी संस्तुतियों को खारिज कर दिया गया था, लेकिन नेतृत्व ने बाकी को अभिषेक की सिफारिशों के रूप में स्वीकार कर लिया था.'' इस सूत्र ने यह भी जोड़ा कि हो सकता है कि पीके पार्टी छोड़ दें.

प्रेसिडेंसी विश्वविद्यालय में एमेरिटस प्रोफेसर समाज विज्ञानी प्रशांत रे का कहना है कि ''शुरुआत में पार्टी में पुराने और युवा नेताओं के बीच सीधा विभाजन था. अब विभाजन उम्र और जनसांख्यिकी से आगे बढ़ कर दो शीर्ष नेताओं के बीच ताकत के खेल में बदल चुका है.'' बीती 8 फरवरी को तृणमूल कांग्रेस के महासचिव पार्थ चटर्जी ने अभिषेक पर कटाक्ष करते हुए कहा था कि ''ममता का कोई निजी परिवार नहीं है'' बल्कि राज्य के लोग ही उनका परिवार हैं.

हालांकि अभिषेक राज्य के प्रशासनिक मुख्यालय नबान्न से दूरी बनाए रखते हैं, लेकिन चर्चा यह भी है कि उनकी आंखें और कान वहां मौजूद हैं. कथित तौर पर कुछ कनिष्ठ नौकरशाह उनके करीबी हैं, लेकिन वरिष्ठ नौकरशाह दीदी के साथ हैं. सूत्रों का यह भी कहना है कि आइपीएस लॉबी उनके नियंत्रण में है और तबादलों और तैनाती में उनका प्रभाव काम करता है. हाल ही में, कोलकाता के पुलिस आयुक्त के चयन को लेकर भी दोनों शक्ति केंद्रों के बीच मतभेद सामने आए थे. ममता की पसंद विनीत गोयल थे जबकि अभिषेक ज्ञानवंत सिंह के पक्ष में थे. डायमंड हार्बर विवाद के बाद अब ममता कथित तौर पर आइपीएस अधिकारियों की तैनाती में फेरबदल करने जा रही हैं ताकि अपने भरोसे के लोगों को उचित स्थान दिया जा सके.

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