
जनवरी के मध्य में उत्तरी गोवा के पुराने और भीतर की ओर बसे शहर सांखली में यह एक सुखद सुबह थी. दिन भर के चुनावी अभियान के लिए अपने घर से निकलने से पहले 49 वर्षीय आयुर्वेदिक डॉक्टर और मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत उस खूबसूरत लैंडस्केप में खोए हुए दिखते हैं.
इस इलाके में राजनेताओं के बदन पर भारतीय नेताओं का ट्रेडमार्क खादी का लिबास नहीं दिखता, बल्कि भारत के 'आम आदमी' का लुक ही इस गोवा प्रजाति की अलग पहचान होता है. सावंत भी कोई अपवाद नहीं हैं—जब वे नंगे पांव अपने पोर्च में आते हैं तो सफेद कमीज, धूसर पतलून और सफेद एन-95 मास्क के बीच उनकी कलाई पर बंधी काले डायल की राडो घड़ी उनके समृद्ध होने का एकमात्र संकेत देती है. कतार में खड़ी भीड़ से मुख्यमंत्री को अलग करने वाली एक ही चीज है, प्लास्टिक की एक कुर्सी. आखिरी लिखित आवेदन जमा होने के बाद ही सावंत अंदर जाते हैं और काले कट शूज पहनकर वापस आते हैं और अपनी सफेद इनोवा क्रिस्टा में ड्राइवर की बगल वाली सीट पर बैठकर प्रचार के लिए निकल जाते हैं.
भाजपा लगातार तीसरी बार सत्ता में आने के लिए सावंत से उम्मीद लगाए हुए है. इन्फ्रास्ट्रक्चर और सामाजिक कल्याण—उन्हें लगता है कि उन्होंने दोनों मोर्चों पर अच्छा प्रदर्शन किया है. उन्हें यकीन है कि 14 फरवरी को गोवा की कुल 40 सीटों के लिए होने वाले मतदान में भाजपा के 22 से अधिक सीटें जीतने पर इसका असर दिखेगा. सावंत इंडिया टुडे से कहते हैं, ''सड़कों और पुलों के व्यापक नेटवर्क, सेवाओं की ऑनलाइन उपलब्धता... गोवा में ऐसा कभी पहले नहीं हुआ था.''

उनकी आशावादिता के बावजूद शायद गोवा के विवादास्पद कैसिनो में दांव लगाने वाला सबसे महत्वाकांक्षी जुआरी भी राज्य के आधे निर्वाचन क्षेत्रों पर किसी एक पार्टी का कब्जा होने की बात पर भरोसे के साथ सट्टा नहीं लगाएगा. गोवा का राजनैतिक नक्शा असल में द्विध्रुवीय हुआ करता था—छोटे दल कांग्रेस या भाजपा के इर्दगिर्द जुड़ते थे. पर अब नहीं. आम आदमी पार्टी (आप) और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) जैसी पार्टियों के मैदान में होने के कारण इस बार मुकाबला अधिक विखंडित, जटिल और अनुमान लगाने के लिहाज से मुश्किल भी है.
यह छीना-झपटी वाली सियासत का एक रोमांचक खेल था जिससे येन-केन-प्रकारेण भाजपा 13 विधायकों से 27 के अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गई. सावंत ने पूर्ण बहुमत का अच्छा, उत्पादक ढंग के इस्तेमाल किया—कम से कम सियासी तौर पर. वे कहते हैं, ''हमने सभी जिला परिषद और नगर निगम के चुनाव भारी बहुमत से जीते क्योंकि लोगों ने हम पर भरोसा जताया.'' बहरहाल, इस बात से भी वे तीन ज्वलंत मुद्दों पर जनता के गुस्से से बच नहीं पा रहे—और तीनों ही पर्यावरण, रोजगार और मैक्रो-इकोनॉमिक्स के बीच उस कठिन संतुलन से जुड़े हैं.
एक, लौह अयस्क खनन, जो अभी भी सर्वोच्च न्यायालय की ओर से प्रभावी रूप से प्रतिबंधित है; दूसरा, गोवा की कोयला ढोने वाली सुविधाओं को दोगुना करने का प्रस्ताव, तट से घाटों तक प्राकृतिक संरचनाओं को बदलना; और तीसरा, मेलौली में प्रस्तावित आइआइटी परिसर को लेकर पर्यावरणीय चिंताएं. राज्य के बेताब पर्यावरणवादी लौह अयस्क पर स्थगन को बेशक राहत के रूप में देखते हैं, लेकिन इससे अर्थव्यवस्था पर असर पड़ना लाजिमी था—खनन गोवा का सबसे बड़ा उद्योग है. अनुमान है कि इस प्रतिबंध से 2018 के बाद से 6,000 करोड़ रुपए का सालाना आर्थिक नुक्सान हुआ है, जिससे प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से 2,50,000 लोगों की आजीविका प्रभावित हुई है. इसलिए सावंत कोयला-ढुलाई की परियोजना पर दृढ़ रुख अपनाए रहे, जबकि कैंपस के लोकेशन पर उन्होंने कदम पीछे कर लिए. आर्थिक तर्कों को आखिरकार, लोगों की परीक्षा पास करनी होती है. खासकर तब जब और भी नेता मौजूद हों जो ऐसे मुद्दों पर बखेड़ा खड़ा कर सकते हों.

ऐसे नेताओं में एक हैं फर्श से अर्श पर पहुंचने वाले माइकल लोबो. वे कलंगुट सीट के कंडोलिम में हाथ जोड़कर घर-घर दौरा कर रहे हैं. अपने किशोर जीवन में लोबो एक रेस्तरां में बरतन धोते थे लेकिन अब वे दो रिजॉर्ट, दो रेस्तरां और एक दर्जन बंगलों के मालिक हैं. अपनी सियासी पैंतरेबाजी के कौशल के लिए मशहूर लोबो, 17 साल भाजपा में बिताने के बाद कांग्रेस में लौट आए हैं और उन्होंने कांग्रेस में नई जान फूंक दी है. वे कांग्रेस के बारे में कहते हैं कि यह पार्टी ''लोगों में जाति और धर्म के आधार पर भेद नहीं करती.''
लोबो के आने से कांग्रेस में जान आ गई है. उन्होंने दल-बदलुओं पर सख्ती शुरू कर दी है. इस तरह को फैसले की तारीफ हो रही है. यही नहीं, राज्य में तेज सत्ताविरोधी रुझान के मद्देनजर कांग्रेस नए चेहरों को मैदान में उतार कर बड़ा दांव खेल रही है.
लेकिन पार्टी का आत्मविश्वास गठबंधन बनाने के मामले में बाधक है: उसने गोवा फॉरवर्ड पार्टी (जीएफपी) के प्रमुख विजय सरदेसाई को थामने की कोशिश की और उनकी 12 सीटों की मांग के जवाब में उन्हें महज तीन सीटों की पेशकश की. लेकिन इस बात की झलक सबसे ज्यादा उस ठसक में दिखी कि इसने भाजपा के खिलाफ महागठबंधन तैयार करने के टीएमसी के प्रस्ताव को खारिज कर दिया. कांग्रेस के चुनाव प्रभारी पी. चिदंबरम और उनके टीएमसी समकक्ष महुआ मोइत्रा के बीच वाक्-युद्ध से दोनों पार्टियों को जख्म लगे हैं.
इसकी शुरुआत टीएमसी ने की. कांग्रेस के तत्कालीन राज्य प्रमुख लुइजिन्हो फलेरियो को ही फांसा, उसके बाद कांग्रेस और अन्य जगहों से पूरी भीड़ उमड़ पड़ी. लेकिन उसके बाद टीएमसी की चमक फीकी पड़ गई. सबसे पहले, जीएफपी ने कांग्रेस के साथ मामूली सौदेबाजी को ही प्राथमिकता दी और टीएमसी के साथ विलय के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया. उधर, टीएमसी ने महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी (एमजीपी) के साथ गठजोड़ कर लिया, जिसका हिंदुत्व के प्रति झुकाव सर्वज्ञात है. (टीएमसी 26 सीटों पर चुनाव लड़ रही है और एमजीपी 13 पर, और यह गठबंधन एक सीट पणजी पर चुनाव नहीं लड़ रहा). टीएमसी मीडिया प्रमुख ओमप्रकाश मिश्र कहते हैं, ''आप इसे विभिन्न विचारधाराओं का गठजोड़ कह सकते हैं लेकिन इससे भाजपा की पराजय की जमीन तैयार होगी.'' टीएमसी के थिंक-टैंक को यकीन है कि धर्मनिरपेक्ष छवि के कारण वह कैथोलिक वोट बटोर लेगी, जबकि एमजीपी भाजपा के हिंदू वोटों पर चोट कर सकती है.
इस बीच, आप ने कुछ हलचल मचाने में कामयाबी हासिल की है. उसने सबसे पहले सीएम उम्मीदवार के नाम की घोषणा की. पार्टी की पसंद—लोकप्रिय अमित पालेकर—यहां की राजनीति के अभी तक परती रहे पहलू को छेड़ने वाले नेता हैं. आप प्रमुख अरविंद केजरीवाल ओबीसी भंडारी समुदाय को एकजुट करने की संभावनाएं तलाश रहे थे. वकील-आंदोलनकारी रहे पालेकर भंडारी चेहरा हैं जो आप के उस आख्यान में बिल्कुल फिट बैठते हैं कि पार्टी गोवा के सबसे बड़े समुदाय के लिए उचित मंच पर दावा कर रही है. यहां की सियासत में ब्राह्मण-मराठा-कैथोलिक का त्रिकोण अधिकतर समय तक हावी रहा है, ऐसे में भंडारी ज्यादातर नजरअंदाज किए जाते रहे. विडंबना है कि यह सुर केजरीवाल ने छेड़ा है जिनका वैचारिक जन्म आरक्षण विरोधी राजनीति के साथ हुआ था और वे अब गोवा का मंडलीकरण करने वाले हैं. भ्रष्ट नेताओं को दोष देते हुए पालेकर कहते हैं, ''हमारे प्रतिभावान युवा पलायन कर रहे हैं क्योंकि यहां उनके लिए कोई अवसर नहीं है. अगर हम सत्ता में आए, मैं 24 घंटों में व्यवस्था दुरुस्त कर दूंगा.''
जाति के मोर्चे पर पहला पासा टीएमसी ने फेंका था. आप के पालेकर वाले दांव से भी पहले, उसने एक प्रमुख भंडारी नेता और जीएफपी से पार्टी में आने वाले किरण कंडोलकर को अपना प्रदेश अध्यक्ष बनाया था. कंडोलकर एल्डोना से और उनकी पत्नी कविता थिविम से चुनाव मैदान में हैं.
गोवा के 11 लाख वोटरों में भंडारियों की आबादी करीब 30 फीसद है और वे कम से कम 17 सीटों पर स्विंग कर सकते हैं. इस समुदाय की 19 उप-जातियां हैं जो राज्य की ओबीसी आबादी का 63 फीसद हैं. 1961 में पुर्तगालियों के कब्जे से राज्य की स्वतंत्रता के बाद बने 13 मुख्यमंत्रियों में (कुल मिलाकर 24 बार) से अभी तक महज एक भंडारी रहे हैं: रवि नाइक, जो नब्बे के दशक की शुरुआत में दो बार कुछ समय के लिए कुर्सी पर बैठे थे. वह भी तब, जब गोवा में सत्ता बड़े पैमाने पर कृषक समुदायों के वोटिंग के मिज़ाज पर निर्भर करती है. उत्तरी गोवा में उनके वोट अक्सर नतीजों पर सीधा असर डाल सकते हैं. अन्यथा, कैथोलिक समर्थन वाला भंडारी उम्मीदवार हर हाल में विजेता होगा.
आप ने भंडारी-कैथोलिक गठजोड़ की अहमियत को समझ लिया है. केजरीवाल ने ऐलान किया कि अगर पार्टी सत्ता में आती है तो पार्टी किसी कैथोलिक को डिप्टी सीएम बनाएगी. आप ने इस बार अधिकतर हिंदू उम्मीदवार उतारे हैं, लेकिन इस बात का ख्याल रखा है कि उनमें से अधिकतर ओबीसी जातियों से हों.
लेकिन क्या इससे भंडारी आप की ओर बढ़ेंगे? राजनैतिक टिप्पणीकार राजेंद्र देसाई संशय जताते हुए कहते हैं कि गोवा उत्तर प्रदेश की तरह जाति के आधार पर वोट नहीं करता. वे कहते हैं, ''सभी दलों के पास भंडारी नेता हैं. गोवा में उम्मीदवार की साख उसकी जाति से अधिक मायने रखती है.'' लेकिन साथ में मानते हैं कि आप के दांव ने भंडारी समुदाय को उसकी अहमियत का एहसास कराया है.
लेकिन खेल में निष्ठाओं की भी भूमिका है. उनमें से एक पणजी के सेंट इनेज इलाके में भीड़भाड़ वाले मुस्लिमवाड़ा में शाम ढलते ही दिखाई देता है. अपने बाएं हाथ में पावर बैंक से जुड़ा मोबाइल फोन, दाहिनी ओर बंधे पवित्र धागे, बुजुर्गों के पैर छूकर और युवाओं से हाथ मिलाते हुए उत्पल पर्रीकर अतीत और भविष्य का मिश्रण मालूम होते हैं. एक घर में, एक बुजुर्गों महिला उन्हें पुकारकर बुलाती है—वह अभी बस उनके पैर छूकर आए ही हैं. वे कहती हैं, ''आपने बताया नहीं कि आप पर्रीकर हैं. हमारा वोट आपको ही मिलेगा.''
उत्पल को भरोसा है कि जो लोग उनके पिता मनोहर पर्रीकर को पसंद करते थे, वे उनके पीछे खड़े होंगे. पणजी वह सीट है जिसे उनके पिता ने 1994 से तैयार किया है लेकिन राजनैतिक रूप से अधिक तजुर्बेकार एंटोनियो 'बाबुश' मोंसेरात्ते, जिनकी वजह से उत्पल की उपेक्षा की गई, का उनकी सीमाओं में आने वाले सभी 24 कॉर्पोरेशन वार्ड पर गहरा नियंत्रण है. सामुदायिक अंकगणित उत्पल की निर्दलीय उम्मीदवारी के लिए मुफीद नहीं है. पणजी में 23 फीसद लोग कैथोलिक और 20 फीसद लोग सारस्वत हैं. बगैर पार्टी की मदद के सारस्वत उत्पल के लिए कैथोलिक और ओबीसी वोटरों को अपने पाले में करना टेढ़ी खीर होगा. खासतौर पर, जाति के मोर्चे पर ओबीसी समुदाय में मजबूत बेचैनी के मद्देनजर यह काम और भी कठिन लगता है. 'आनि एक बामन आमका नाका' (हम एक और ब्राह्मण नहीं चाहते) का नारा जोर पकड़ रहा है. धारा के नीचे होने वाले एक और सामाजिक बदलाव के संकेत दिख रहे हैं जिसने लंबे समय से जड़ रहे सियासी मैदान में हलचल पैदा कर दी है.

