
गहरे अपमान से उपजे गुस्से से एक शख्स ने पंजाब के सियासी नक्शे से एक पार्टी का सफाया करने का पक्का इरादा कर लिया है. पार्टी है कांग्रेस और शख्स ऐसे नेता हैं जिनकी सियासी जिंदगी के 27 साल कांग्रेसी के रूप में गुजरे. यह देश की सबसे पुरानी पार्टी की स्थितियों पर टिप्पणी जैसा है तो आखिरी दौर की जंग लड़ रहे कैप्टन अमरिंदर सिंह पर भी उसी तरह लागू होता है. भले ही वे शायद इसे कुछ अलग तरह से देखना पसंद करें. दो बार मुख्यमंत्री रह चुके अमरिंदर अब बेहद छोटे दायरे में दांव लगा रहे हैं—बशर्ते उनके आहत अभिमान को कोई चुनावी मकसद माने. अमरिंदर की नई पार्टी पंजाब लोक कांग्रेस (पीएलसी) का सिंबल हॉकी स्टिक और गेंद है और वे चुनावी मैदान में जूनियर पार्टनर के रूप में उतरे हैं. भाजपा की 65 सीटों के मुकाबले वे 37 सीटों पर लड़ रहे हैं क्योंकि यह उनके अस्तित्व का सवाल है. उनके कई वफादार भगवा पार्टी का दामन थाम चुके हैं. इससे वे बाएं बाजू से खासकर एक राष्ट्रीय पार्टी के लिए भी प्लेमेकर की भूमिका में हैं.
यह खेल आसान नहीं होगा. एक अजीब तथ्य तो यह है कि अमरिंदर को एक ऐसे विपक्षी नेता के रूप में लड़ना पड़ रहा है जिन पर खुद सत्ता-विरोधी रुझान का बोझ है. उन्हें हाल ही में सितंबर के मध्य में नाटकीय घटनाक्रम में मुख्यमंत्री के पद से हटा दिया गया था. उनकी छवि लोगों से मिलना-जुलना पसंद न करने वाले ऐसे प्रशासक की रही है, जो अधिकतर अपनी मंडली के जरिये चंडीगढ़ के बाहरी इलाके में स्थित अपने फार्महाउस से अपनी सरकार चलाता था. लेकिन वे और भाजपा, दोनों—और 17 सीटों पर लड़ रही उनकी तीसरी सहयोगी सुखदेव ढींढसा का शिरोमणि अकाली दल (संयुक्त)—प्रतीकों से जमीनी तोड़ने के भरोसे हैं. हमेशा दो-तरफा रहने वाली पंजाब की चुनावी जंग इस बार असामान्य रूप से भीड़भाड़ वाली हो गई है और वे इसका फायदा उठाने की उम्मीद कर रहे हैं.

पीएलसी की कुल 37 विधानसभा सीटों में से 26 मालवा क्षेत्र में हैं और पटियाला जागीर के गृहक्षेत्र के फुलकियान रियासत के आसपास केंद्रित है. अमरिंदर को इस रियासत के महाराजा की उपाधि हासिल है. मालवा इलाके में 69 सीटें हैं और अधिकतर पर बहुकोणीय मुकाबला देखने को मिलेगा. इसे अकाली दल का गढ़ माना जाता है, लेकिन 2014 के बाद आम आदमी पार्टी ने यहां उल्लेखनीय बढ़त हासिल की है. किसान आंदोलन इस इलाके में काफी उग्र था और इस बार किसान संगठन गंभीर चुनौती पेश कर रहे हैं. ऐसी बाधाओं के बीच जीत हासिल करना जितना किस्मत के भरोसे है, उतना ही मतदान के दिन अपने पक्ष में किसी तरह के रुझान के निकल पड़ने के भरोसे.
चुनावी बढ़त से ज्यादा, भाजपा को उम्मीद है कि इस 80 वर्षीय पूर्व मुख्यमंत्री के साथ गठबंधन से उसके लिए नए क्षेत्रों के दरवाजे खुल सकते हैं. इसमें सिख राजनीति के अशांत समुंदर में हाथ आजमाना शामिल है. यहां अमरिंदर शायद सूत्रधार के रूप में अलहदा ढंग से मौजूद हैं. पूर्व कांग्रेसी के अलावा वे पूर्व अकाली भी हैं और उनकी सियासी यात्रा उदार और विविधतापूर्ण रही है. पीएलसी अमरिंदर की चौथी पार्टी है. दून स्कूल के उनके साथी राजीव गांधी उन्हें राजनीति में ले आए और उन्होंने 1980 के आसपास कांग्रेस के साथ शुरुआत की.
ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी और वे अकाली दल में चले गए थे. अपने अगले 14 साल उन्होंने उसी पक्ष में बिताए—थोड़े वक्त के लिए अपना खुद का सिख संगठन अकाली दल (पंथक) भी बनाया. हालांकि 1998 में वे फिर से कांग्रेस में शामिल हो गए और दो दशक तक पार्टी की राज्य इकाई के सबसे अहम शख्स बने रहे. वे सिख राजनीति की शब्दावली के मायनों से अच्छी तरह वाकिफ हैं. इसलिए भाजपा के एक नेता कहते हैं, ''उन बारीकियों को समझने में भाजपा की मदद करने वाले लोगों में अमरिंदर भी शामिल हैं.''
अमरिंदर राष्ट्रवादी मोर्चे के कुछ प्रतीकों—राष्ट्रीय सुरक्षा, उग्रवाद के खतरे और ड्रग की तस्करी-पर बोलकर संतुलन साधना चहते हैं. शायद यह ऐसे नेता के लिए विडंबना है, जिनकी कनाडा की डिक्सी के एक गुरुद्वारे में ली गई एक पुरानी तस्वीर की पृष्ठभूमि में पीतल के अक्षरों में 'खालिस्तान जिंदाबाद' लिखा नजर आया था. फिर भी, भारतीय सेना की सिख रेजिमेंट में अपने तीन साल के काम पर वे अमूमन गर्व जताते रहते हैं और राष्ट्रवादी ताने-बाने में हमेशा सहज रहते हैं. वे राज्य कांग्रेस के प्रमुख नवजोत सिद्धू पर लगातार हमला कर रहे हैं और उन्होंने दावा किया है कि 2019 में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने उनके मंत्रिमंडल में सिद्धू को फिर से शामिल करने के लिए एक आम सूत्र के जरिये उनसे संपर्क साधा था.
पंजाब के इन मतदाताओं की मौजूदगी को अमूमन कम आंका गया है—राज्य की आबादी का 38.5 फीसद हिंदू हैं और वे 45 सीटों पर या तो बहुसंख्या में हैं या नतीजों को प्रभावित करते हैं. भाजपा उनमें से 30 सीटों पर लड़ रही है तो पीएलसी के खाते में 10 सीटें हैं. फिर, कांग्रेसी मुख्यमंत्री के रूप में अपने लंबे अरसे के दौरान अमरिंदर ने नरमपंथी सिखों में अपना खुद का आधार भी बनाया है जो वोटों को लुभाने में गठबंधन के लिए अहम हो सकता है. पंजाब को 'मुश्किल से हासिल शांति' की बात करके अमरिंदर इसी मोर्चे पर खेल रहे हैं और कह रहे हैं कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गठबंधन बनाया हैं. यह देखना बाकी है कि क्या पटियाला के काली मंदिर में बेअदबी जैसी घटनाएं उस परिदृश्य को उभार देंगी और इस गठबंधन के कमजोर कॉडर आधार को पाटने में मदद करेंगी.

