
देश का मिज़ाज । अर्थव्यवस्था
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का दूसरा कार्यकाल चुनौतियों से भरा रहा है. सबसे अव्वल चुनौती कोविड-19 महामारी रही, जिसने अर्थव्यवस्था को तहस-नहस कर दिया, वृद्धि दर को शून्य से नीचे रसातल में पहुंचा दिया और महंगाई तथा बेरोजगारी की आग में खूब घी झोंका. कोविड-19 की एक के बाद एक लहरें जिंदगियों और आजीविकाओं पर कहर बरपा रही थीं, तो हिंदुस्तानियों की रोजमर्रा की जिंदगी तकलीफों से भरी थी.
मगर इन तकलीफों के बावजूद प्रधानमंत्री ने अपना जनसमर्थन कायम रखा है, फिर चाहे वह महामारी से निबटना हो या आर्थिक इंतजामात. हालांकि अर्थव्यवस्था से उनके निबटने को लेकर आशावाद अगस्त में हुए देश का मिज़ाज सर्वेक्षण में खासा कम हो गया था, पर इस बार यह बढ़ा है. जो बात उनके हक में गई लगती है, वह यह कि कल्याणकारी योजनाओं और नीतिगत उपायों ने ज्यादातर क्षेत्रों की तकलीफों पर ध्यान दिया.
2021-22 की दूसरी तिमाही में अर्थव्यवस्था में फिर उछाल आया, जब कारोबारी गतिविधियां कोविड के पहले के स्तर पर लौट आईं. अलबत्ता तेजी से फैलने वाले ओमिक्रॉन वैरिएंट के आगमन से कारोबारी गतिविधियों पर एक बार फिर निराशा के बादल छा गए.

मौजूदा एमओटीएन सर्वे में आधे से ज्यादा उत्तरदाताओं ने केंद्र सरकार की तरफ से की गई अर्थव्यवस्था की साज-संभाल को 'असाधारण’ या 'अच्छा’ आंका है. हालांकि इसे फीका करने वाली बात यह है कि 26.4 फीसद लोगों ने इसे 'खराब’ या 'बहुत खराब’ आंका. यही नहीं, केवल 64 फीसद उत्तरदाताओं ने कहा कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद उनकी आर्थिक हालत सुधरी है या जस की तस है, जो अगस्त 2021 में यथास्थिति या आर्थिक सुधार बताने वाले करीब 76 फीसद लोगों से कम हैं.

यह सर्वे लगातार जारी कुछ आर्थिक परेशानियों की पृष्ठभूमि में किया गया. एक तो सीपीआइ (उपभोक्ता मूल्य सूचकांक) से नापी जाने वाली भारत की मानक मुद्रास्फीति दर दिसंबर 2021 में 5.59 फीसद पर पहुंच गई, जो पांच महीनों में इसका सबसे ऊंचा स्तर था. सीएमआइई (सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनोमी) के अनुसार, देश की बेरोजगारी दर दिसंबर में चार महीने के सबसे ऊंचे स्तर 7.91 फीसद पर पहुंच गई, जो नवंबर और अक्तूबर की क्रमश: 7 फीसद और 7.75 फीसद से ज्यादा थी.

शहरी बेरोजगारी दर दिसंबर में बढ़कर 9.3 पर पहुंच गई जबकि ग्रामीण बेरोजगारी 7.28 फीसद थी, जो नवंबर में इससे ज्यादा क्रमश: 8.21 और 6.44 फीसद थीं. महामारी से सेवा क्षेत्र को नुक्सान होना जारी है, जबकि भीड़ पर नियंत्रण की गरज से लगाई गई पाबंदियों ने रिटेल और हॉस्पिटैलिटी कंपनियों को चौपट कर दिया है.
भविष्य की उम्मीदों के लिहाज से 31 फीसद उत्तरदाताओं ने कहा कि वे अगले छह महीने में अर्थव्यवस्था में सुधार देखते हैं, जबकि 21.9 फीसद की राय थी कि यह जैसी है, वैसी ही रहेगी. 29.2 फीसद ने कहा कि यह और बदतर होगी, जबकि अगस्त 2021 में ऐसा कहने वाले इससे ज्यादा 32 फीसद थे.

जहां तक आमदनी की बात है, तो 30.1 फीसद जितनी खासी तादाद में लोगों ने कहा कि उन्हें अपनी आमदनी बढऩे की उम्मीद है, जबकि अगस्त में करीब 17 फीसद ने ऐसा कहा था. वहीं 27.3 फीसद मानते हैं कि उनकी आमदनी जस की तस रहेगी (अगस्त के 45 फीसद से कम), जबकि 28.9 फीसद उत्तरदाताओं को आशंका है कि उनकी आमदनी और कम होगी (34 प्रतिशत से कम).
इस आशावाद के बीच महंगाई के गंभीर परेशानी बनने के संकेत भी हैं. 67.3 फीसद जितनी बड़ी तादाद में उत्तरदाताओं ने कहा कि उनके लिए रोजमर्रा का खर्च चलाना पिछले साल के मुकाबले ज्यादा मुश्किल हो गया है जबकि 23.8 फीसद ने कहा कि वे अपने रोजमर्रा का खर्च (बढ़ने के बावजूद) चला पा रहे हैं.
महंगाई पूरे 2021 के दौरान भारत ही नहीं बल्कि दुनिया भर में चिंता का विषय बनी रही. कमोडिटी की कीमतों में बढ़ोतरी से कारोबारों की प्रतिस्पर्धा क्षमता को चोट पहुंची, फिर चाहे वे छोटे, मध्यम या बड़े कारोबार ही क्यों हों. थोक महंगाई 2021 के ज्यादातर वक्त दहाई के अंकों में बनी रही—दिसंबर में 13.56 फीसद, नवंबर में 14.23 फीसद और अक्तूबर में 13.83 फीसद.

केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के एक बयान के मुताबिक, दिसंबर 2021 में महंगाई की ऊंची दर त: खनिज तेलों, मूल धातुओं, कच्चे पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैसों, खाद्य उत्पादों तथा अन्य चीजों की कीमतों में बढ़ोतरी का नतीजा थी. कोविड की वजह से लगाई गई पाबंदियों में ढील के बाद 2021 के दूसरे आधे हिस्से में हालांकि ज्यादातर फर्म फिर काम करने लगीं, पर आर्थिक अनिश्चितता का काफी असर खासकर हॉस्पिटैलिटी और रिटेल सरीखे संपर्क-सघन क्षेत्रों में नौकरियों में भर्ती पर पड़ा.
सीएमआइई के अनुसार, नवंबर में कोई साठ लाख नौकरियां चली गईं. 45 फीसद जितने अधिक उत्तरदाताओं ने कहा कि देश में बेरोजगारी की स्थिति 'बहुत गंभीर’ है, हालांकि अगस्त में इनकी तादाद इससे ज्यादा 59 फीसद थी. अन्य 25.6 फीसद ने कहा कि स्थिति 'कुछ गंभीर’ है.
नवी मुंबई में गारमेंट कारोबार के मालिक 40 वर्षीय शंकर चौधरी कहते हैं कि बीते दो दशकों में, जब से वे कारोबार करते आ रहे हैं, पिछले दो साल सबसे मुश्किल रहे हैं. वे कहते हैं कि परेशानी केवल पाबंदियों की वजह से ही नहीं, बल्कि उन्हें मनमाने ढंग से थोपने के कारण भी हुई. वे कहते हैं, ''कुछ साफ ही नहीं है कि कब आप दुकान चला सकते हैं. नवंबर में त्योहारी सीजन के बाद कारोबार कतई अच्छा नहीं रहा.’’
कई एमएसएमई (बहुत छोटे, छोटे और मध्यम उद्यम) भी वही कहानी बयां करते हैं, जो खुदरा कारोबारी बताते हैं. अलबत्ता इतना तय है कि उनकी हालत उतनी खराब नहीं है जितनी महामारी की पहली लहर के दौरान थी, जब कई सप्ताहों तक लगातार पूरी तरह लॉकडाउन था, या दूसरी लहर के दौरान थी, जब डेल्टा वैरिएंट ने देश को तहस-नहस कर दिया था. मगर जब चीजें बेहतर होने लगीं, ठीक तभी ओमिक्रॉन की लहर ने कइयों के लिए फिर परेशानियां पैदा कर दीं.
आम जनता के बीच यह एहसास है कि आवाजाही और भीड़ इकट्ठा होने पर पाबंदियों की बदौलत वायरस को फैलने से रोकने में मदद मिली है. सर्वे में शामिल 52.8 फीसदी जितने ज्यादा लोगों ने कहा कि पाबंदियों से वायरस पर काबू पाने में मदद मिली, पर कारोबारी गतिविधियां भी प्रभावित हुईं. हालांकि सर्वे में शामिल 22.3 प्रतिशत उत्तरदाता ये नहीं मानते कि पाबंदियों से उनकी आजीविका पर विपरीत असर पड़ा.
असल में, कई कारोबार महामारी के दौरान अच्छे चले, मसलन ई-टेलर और फूड एग्रीगेटर सहित वे कारोबार जो ऑनलाइन थे. जोमैटो, नायका और पॉलिसीबाजार सरीखे यूनिकॉर्न स्टार्ट-अप के कामयाब आइपीओ (आरंभिक सार्वजनिक निर्गम) इस रुझान का सबूत हैं.
अलबत्ता भौतिक स्टोरों की कहानी बिल्कुल अलहदा है. रात और सप्ताहांत के कर्फ्यू ने रिटेल और हॉस्पिटैलिटी क्षेत्र को बड़ा नुक्सान पहुंचाया. ताजातरीन देश का मिज़ाज सर्वे हिंदुस्तानियों की आम दुर्दशा को सही नजरिए से पेश करता है—सर्वे में शामिल लोगों की 64.1 फीसद जितनी बड़ी तादाद ने कहा कि उनकी आमदनी घटी है जबकि महज 22.7 फीसद ने कहा कि उनकी आमदनी पर कोई फर्क नहीं पड़ा.
यह स्थिति पिछले तीन सर्वे के मुकाबले बेहतर है, जिनमें 85 फीसद या उससे ज्यादा ने कहा था कि उनकी आमदनी घटी हैं. मगर इससे बहुत तसल्ली नहीं मिलती, क्योंकि कोविड से जुड़ी अनिश्चितताएं अब भी कायम हैं.
दुश्वारियां चाहे जितनी रही हों, लेकिन एमटीओएन सर्वे से इस जनभावना का संकेत मिलता है कि सरकार ने कोविड-19 से पैदा बदतरीन आर्थिक नुक्सान का मुकाबला करने के लिए काफी कुछ किया है. खासकर गरीबों, किसानों और छोटे कारोबारियों को ध्यान में रखकर केंद्र और राज्य सरकारों ने जो कई कदम उठाए, उनसे बहुत राहत मिली.
हालांकि कहा जा सकता है कि भारत सरीखे देश में, जहां समस्याओं का पैमाना और पेचीदगी का विशाल आकार हमेशा चुनौती रहा है, कुछ भी बहुत अधिक नहीं है. जनवरी की शुरुआत में एसबीआइ रिसर्च की एक रिपोर्ट में कहा गया कि 2020 में सरकार ने महामारी से प्रभावित एमएसएमई को राहत देने के लिए जो आपातकालीन क्रेडिट लाइन गारंटी योजना (ईसीएलजीएस) लॉन्च की थी, उसने 13.5 लाख फर्मों को दिवालिया होने से बचाया और इस तरह 1.5 करोड़ नौकरियां बचाईं.
यह योजना मई 2020 में केंद्र की तरफ से घोषित 20 लाख करोड़ रुपए के आत्मनिर्भर भारत अभियान का सबसे बड़ा राजकोषीय हिस्सा थी. हालांकि समूचे भारत से अब भी आ रही एमएसएमई की कई मुंहजबानी कहानियां जबरदस्त संकट का पता देती हैं—फर्म कमजोर मांग, कोविड संक्रमण के कारण कामगारों की भारी अनुपस्थिति और कच्चे माल की बढ़ती कीमतों के चलते घटते मुनाफे से जूझ रही हैं.
मगर तकलीफ कितनी और किस हद तक है, पर्याप्त डेटा के बिना इसकी थाह पाना आसान नहीं है. केंद्र ने कहा है कि महामारी के नतीजतन कारोबार बंद करने को मजबूर एमएसएमई का डेटा उसके पास नहीं है. वहीं, पीएम किसान योजना सहित गरीबों को ध्यान में रखकर किए गए उपायों की बदौलत महामारी से सबसे ज्यादा प्रभावित लोगों की तकलीफें कम करने में मदद मिली.
सर्वे में शामिल 59.7 फीसद जितने अधिक लोग मानते हैं कि केंद्र ने रुपए-पैसे और दूसरे उपायों से महामारी की चपेट में आए लोगों को काफी राहत दी, जबकि 31.3 फीसद लोग ऐसा नहीं मानते. एमएसएमई को जरूर जद्दोजहद करनी पड़ी, पर कई बड़े कारोबार खासकर यात्रा और मेहनताने की लागतों में कटौती करके किसी तरह तैरते रहे. बड़े कारोबारों के लिए ऐसे उपायों और उनके साथ कम कॉर्पोरेट टैक्स का मतलब कोविड महामारी से जुड़े व्यवधानों के बावजूद बेहतर मुनाफा था.
असल में, नई परियोजनाओं की कुछ सबसे बड़ी घोषणाएं कुछेक बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियों ने कीं, जो जिंसों के चक्रीय उछाल पर भी सवार थीं. 47.7 फीसद जितनी बड़ी तादाद में उत्तरदाता कहते हैं कि एनडीए सरकार की आर्थिक नीतियों का सबसे ज्यादा फायदा बड़े कारोबार हुआ जबकि केवल 7.6 फीसद सोचते हैं कि सबसे ज्यादा फायदा छोटे कारोबारों को हुआ.
अहम बात यह कि सर्वे में शामिल केवल 11.6 फीसद लोग मानते हैं कि मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों का सबसे ज्यादा लाभ किसानों को हुआ. यह कृषि सुधारों के खिलाफ किसानों के उस कड़े विरोध की पृष्ठभूमि में आया जिसने केंद्र को उन्हें वापस लेने को मजबूर कर दिया. लगता है, महामारी का दंश झेलने वाले असंगठित क्षेत्र को सबसे कम फायदा हुआ, खासकर जब महज 7 फीसद ने कहा कि दिहाड़ी मजदूरों को सरकार की नीतियों का सबसे ज्यादा फायदा मिला है.
दूसरे कार्यकाल में मोदी सरकार ने जिन बड़े सुधारों पर जोर दिया, उनमें सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों से बाहर निकलना भी रहा है. हालांकि उसने विनिवेश के कई प्रस्तावों का ऐलान किया, जिनमें भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन, शिपिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया और दो पीएसयू बैंकों का विनिवेश शामिल था, पर इस वित्तीय साल तो वह ज्यादा आगे नहीं बढ़ा और सरकार 1.75 लाख करोड़ रुपए के अपने विनिवेश लक्ष्य को भारी अंतर से चूक जाएगी.
अकेली राहत अक्तूबर में टाटा ग्रुप को 18,000 करोड़ रुपए में एयर इंडिया की बिक्री थी, जिसमें टाटा केंद्र को 2,700 करोड़ रुपए का भुगतान करेंगे और बाकी रकम से एयरलाइन के 15,300 करोड़ रुपए का कर्ज अपने ऊपर लेंगे. मगर निजीकरण और विनिवेश सरीखे मुद्दे हमेशा पेचीदा रहे हैं. एयर इंडिया की बिक्री के फैसले ने लगता है जनमत को बिल्कुल बीच से बांट दिया है, जिसमें सर्वे में शामिल 43 फीसद लोगों ने कहा कि वे निजीकरण के कदम का समर्थन नहीं करते और 41.4 फीसद ने कहा कि वे समर्थन करते हैं.
अलबत्ता क्रिप्टोकरेंसी के क्षेत्र में ऐसे कड़े विचार सामने नहीं आए जिस पर प्रधानमंत्री ने ठोस वैश्विक नियामकीय प्रयास किए जाने की जरूरत बताई है. 38.1 फीसद उत्तरदाताओं ने केंद्र सरकार की तरफ से क्रिप्टोकरेंसी पर रोक लगाने की बात कही जबकि 34.3 उत्तरदाता इस मुद्दे के प्रति अनभिज्ञ थे या इस मसले पर उनकी कोई निश्चित राय नहीं थी. उम्मीद की जा रही है कि सरकार क्रिप्टोकरेंसी को नियमों के दायरे में लाने के लिए विधेयक लेकर आएगी और फिलहाल वह इस विषय में विभिन्न हितधारकों के साथ बातचीत कर रही है.
सरकार अब चुनावी मुद्रा में आ गई है और ऐसे में अच्छे अर्थशास्त्र पर राजनीति के हावी होने के आसार बन जाते हैं. क्षत-विक्षत होने के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था बहाली के रास्ते पर है. यद्यपि महंगाई जैसे मुद्दे हमेशा सुर्खियों में नहीं रहते लेकिन सरकारों का भविष्य जरूर तय करते हैं. महामारी के बादल छंटने का नाम नहीं ले रहे और ऐसे में कारोबारों, नीति निर्माताओं और आम जनता के सामने कयास लगाने के अलावा कोई चारा नहीं है. लिहाजा, अगर देश को कोविड-19 से हुए नुक्सान से उबरना है, तो वह अपनी सतर्कता और सावधानी में जरा भी ढील देना गवारा नहीं कर सकता. ठ्ठ
ओमिक्रॉन का भय : मुंबई के छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस पर 16 दिसंबर को जांच के लिए स्वास्थ्यकर्मी एक शख्स की लार का नमूना लेते हुए
45-54 साल आयुवर्ग के 67 % उत्तरदाताओं का कहना है कि सरकार ने कोविड के आर्थिक नुक्सान से निबटने के लिए पर्याप्त काम किया. लेकिन 25-34 साल आयुवर्ग के 54 % उत्तरदाता इस बात से सहमत हैं
77 %
उत्तरदाता जो पूर्व के हैं, कहते हैं कि बेरोजगारी एक गंभीर समस्या है और दक्षिण भारत के 56 % लोग ही इस राय से सहमति जताते हैं
सवाल: क्या आप मानते हैं कि मोदी सरकार ने कोविड के चलते अर्थव्यवस्था पर पड़े विपरीत असर से निबटने के लिए पर्याप्त धन दिया और अन्य कदम उठाए?

