अरुण पुरी
अप्रैल में मैंने भविष्यवाणी की थी कि अगर भाजपा पश्चिम बंगाल का चुनाव हार जाती है तो क्या करेगी—चुनावों के अगले दौर के लिए अपनी रणनीति नए सिरे से ढालकर नए दम-खम के साथ लौटेगी. अगले दो महीनों में पांच राज्यों उत्तर प्रदेश, गोवा, मणिपुर, उत्तराखंड और पंजाब में चुनाव होने हैं. उसके बाद उसी साल हिमाचल प्रदेश और गुजरात की बारी होगी. भाजपा हरेक राज्य की जरूरत के हिसाब से तैयार रणनीतियां लेकर चुनाव के रंग-ढंग में आ गई है.
मेरी भविष्यवाणी के पीछे ऐसा कोई भविष्य का ज्ञान नहीं था. पिछले साढ़े सात सालों के दौरान इस नए मिजाज वाली भाजपा की यही फितरत रही है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पूर्व पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने जिस पार्टी का पुनर्निर्माण किया है, वह वक्त-जरूरत के अनुरूप अपने को ढाल लेने वाली, लचीली और अथक चुनावी मशीन है. यह कभी आराम नहीं करती और मुश्किलों में घुटने नहीं टेकती. हरेक हार से सीखती है और अखाड़े में फिर लौट आती है. यह हमेशा प्रचार और अभियान की रंगत में ढली रहती है.
इस साल 30 नवंबर को प्रधानमंत्री मोदी की सरकार अपने दूसरे कार्यकाल के मध्य-बिंदु पर पहुंच गई. अब से बस 27 महीने बाद उनकी सरकार 2024 के लोकसभा चुनाव की गहमागहमी में होगी. अब से तब के बीच चुनावी राजमार्ग पर दो मील के पत्थर आएंगे—2022 और फिर 2023—जब राजस्थान, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और छत्तीसगढ़ चुनाव से दोचार होंगे.
मगर पहले 2022 के बेहद अहम चुनाव हैं. महामारी की दूसरी लहर ने उस वक्त धावा बोला जब पश्चिम बंगाल के चुनाव चल रहे थे. उत्तर प्रदेश में संक्रमण और मौतों में तेज उछाल आया. पंजाब में मृत्यु दर सबसे ज्यादा थी, जबकि गोवा और उत्तराखंड की पर्यटन पर निर्भर अर्थव्यवस्थाएं ध्वस्त हो गईं. महामारी ने केंद्र और राज्य सरकारों की कमजोरियों को उजागर कर दिया. लिहाजा, अगले साल की शुरुआत में होने वाले चुनाव दूसरी लहर से निबटने के सरकार के तौर-तरीकों पर पहला चुनावी जनमत संग्रह होंगे.
चुनाव में उतरने जा रहे सात में से छह राज्यों में भाजपा सत्ता में है, इसलिए यह इस पार्टी पर जनादेश होगा. सबसे बड़ा राज्य उत्तर प्रदेश चुनावी दृष्टि से भारत का सबसे अहम राज्य है. भाजपा ने यहां पिछला चुनाव भारी बहुमत से जीता था. अगर वह अपना प्रदर्शन दोहरा नहीं पाती, तो इसका असर जुलाई 2022 में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव पर पड़ सकता है.
राष्ट्रपति को चुनने वाले निर्वाचक मंडल का 10 फीसद हिस्सा इन्हीं पांच राज्यों से आता है. अगर इन तमाम विधानसभाओं में भाजपा की सीटें काफी कम हो जाती हैं, तो यह उसके लिए परेशानी का सबब हो सकता है. राज्यसभा में एनडीए की बहुमत की तलाश भी इन्हीं चुनावों पर निर्भर है. अगले साल की शुरुआत में उच्च सदन की जिन 74 सीटों के चुनाव होंगे, उनमें से 16 इन्हीं में से तीन राज्यों से हैं.
भाजपा बेपरवाह या मुगालते में नहीं है. बीते कुछ महीनों में पार्टी ने कुछ मुश्किल फैसले लिए हैं, सारे ही आने वाले चुनावों को ध्यान में रखकर. सितंबर में उसने गुजरात में भूपेंद्र पटेल को नया मुख्यमंत्री बनाया, उससे पहले जुलाई में केंद्रीय मंत्रिमंडल को नए चेहरों से भर दिया. नवंबर में सरकार ने डीजल-पेट्रोल पर उत्पाद शुल्क घटाया. प्रधानमंत्री ने तीन विवादित केंद्रीय कृषि कानूनों को रद्द करने का ऐलान भी कर दिया.
पार्टी के पास आने वाले चुनावों के लिए विस्तृत रणनीति है. यह बड़े और छोटे दोनों स्तरों पर सभी चीजें ठीक करने की रणनीति होगी. बड़े स्तर पर उसने मंत्रिमंडलों में फेरबदल करके और प्रतिनिधित्व देकर जातिगत समीकरण दुरुस्त किए हैं. उसने राज्यों में पार्टी पदाधिकारियों की नियुक्ति की और वह खासकर महिलाओं, ओबीसी, दलितों और आदिवासियों के बीच युवा तथा शिक्षित नेतृत्व की तलाश में है. अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण और काशी के पुनर्विकास को सामने रखकर वह अपना पसंदीदा हिंदू कार्ड खेल रही है.
उत्तर प्रदेश, जहां वह विकास का नारा उछाल रही है, को उसने छह हिस्सों में बांटा है और हरेक हिस्से को अलग राज्य मानकर रणनीति बनाई है. पंजाब में उसने अपने सबसे पुराने सहयोगी दलों में से एक अकाली दल से पल्ला झाड़ लिया है और पूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह की नई गठित पार्टी के साथ मिलकर काम कर रही है. उत्तराखंड, जहां उसे मौजूदा कार्यकाल में तीन मुख्यमंत्री बदलने पड़े, में उसे उम्मीद है कि तीसरे मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी अच्छा असर पैदा कर सकेंगे.
भाजपा ने आक्रामक ढंग से जमीनी स्तर पर जोर देना शुरू कर दिया है, जिसमें व्हाट्सऐप ग्रुप से लेकर सधे स्वर वाले संदेशों तक का प्रयोग किया जा रहा है. भाजपा अध्यक्ष के नाते अमित शाह ने पार्टी कार्यकर्ताओं को बूथों के इंतजाम और मतदाताओं को रिझाने के लिए लामबंद किया था.
मौजूदा अध्यक्ष जे.पी. नड्डा इसे बढ़ाकर और भी छोटी उपइकाई पन्ना प्रमुख या पन्ना समिति तक ले आए हैं, जिसे मतदाता सूची के पन्ने पर दर्ज वोटरों को संभालने का काम सौंपा गया है. इस साल मई में जब स्वास्थ्यकर्मियों की कमी पेश आई, तो भाजपा ने 'सेवा ही संगठन’ अभियान के लिए अपने कार्यकर्ताओं को मैदान में उतारा था.
पार्टी चुनाव अभियान के शुभंकर के रूप में ब्रांड मोदी पर अपनी अत्यधिक निर्भरता से अभी उबर नहीं पाई है. लोकसभा चुनाव में तो यह कारगर रहता आया है, पर राज्यों के चुनावों में उतना नहीं, क्योंकि मतदाता राज्यों और केंद्र के लिए अलग-अलग ढंग से वोट देते हैं. पश्चिम बंगाल के चुनाव में ममता बनर्जी दिखा ही चुकी हैं कि दृढ़निश्चयी और अडिग क्षेत्रीय दावेदार भाजपा के ताकतवर चुनावी रथ की लगाम थाम सकता है.
हमारी आवरण कथा ‘चुनौती 2022’ सीनियर एडिटर अनिलेश एस. महाजन ने लिखी है. यह भाजपा की नई चुनावी मशीनरी के नट-बोल्ट के साथ 2022 की उसकी बदली हुई नई रणनीति के ब्लूप्रिं ट की पड़ताल करती है. भाजपा किसी भी चुनाव में बढ़त के साथ उतरती है, क्योंकि उसके पास चुनावी कामयाबी के चार जरूरी मसाले हैं—
धनबल, संगठन क्षमता, दोटूक विचारधारा और शुभंकर के रूप में लोकप्रिय राष्ट्रीय नेता. विपक्षी दल इनमें से ज्यादातर मामलों में पीछे हैं. फिर भी चुनावों का कुल जमा खेल पसंद और विकल्प का है. यहां तक कि सबसे ताकतवर नेताओं और राजनैतिक दलों को भी शीश झुकाकर लोकप्रिय जनादेश के लिए मतदाताओं के बीच जाना होता है. यही हमारे लोकतंत्र की खूबसूरती है.
(अरुण पुरी)

