scorecardresearch
डार्क मोड

उत्तराखंडः यहां भी पलटा फैसला

आगामी विधानसभा चुनाव में संभावित नुक्सान को रोकने के लिए भाजपा सरकार ने देवस्थानम प्रबंधन अधिनियम को वापस लेने का ऐलान कर दिया

साधु-संतों के साथ उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी
साधु-संतों के साथ उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी
अपडेटेड 13 दिसंबर , 2021

उत्तराखंड की भाजपा सरकार साल 2019 में उत्तराखंड चारधाम देवस्थानम प्रबंधन अधिनियम लेकर आई थी, तो उसने इसे ऐतिहासिक फैसला बताया था. तब सरकार ने कहा कि इससे इन धामों में बढ़ती तीर्थयात्रियों की संख्या के लिए सुविधाएं जुटाई जाएंगी. इसके जरिए सरकार ने तमाम श्राइन बोर्ड का अध्ययन कराकर तीर्थ स्थलों के समन्वित विकास करने का दावा किया. चारों धाम और उनसे जुड़े सभी 51 मंदिरों को इस बोर्ड के नियंत्रण में लाया गया.जबकि इसका विरोध कर रहे तीर्थ पुरोहितों का कहना था कि इस सरकारीकरण से सदियों से चली आ रही परंपराएं नहीं बचेंगी. उनके अनुसार तीर्थ पुरोहित और हक हकूक धारियों के पूर्वजों ने जो विरासत छोड़ी थी बोर्ड बनाकर वह छीन ली गई.

अब राज्य में विधानसभा चुनाव आते-आते इस अधिनियम को सरकार ने वापस लेने का ऐलान कर दिया है. माना जा रहा है कि इस विधेयक को वापस लेकर भाजपा पहाड़ में खिसक रहे अपने जनाधार को वापस पाने की कवायद कर रही है.

पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत इन धामों से सदियों से जुड़े तीर्थ-पुरोहितों, हक हकूक धारियों और पंडों को विश्वास में लिए बिना यह अधिनियम ले आए थे. ऐसे में यह वर्ग भाजपा से बिदकने लगा था. पंडे और तीर्थ-पुरोहित तो इन धामों में भाजपा नेताओं के आने तक का विरोध करने पर उतारू थे. वे इस लड़ाई को सियासी लड़ाई में तब्दील करने की तैयारी में भी थे. हालत यहां तक बिगड़ गई थी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के केदारनाथ आगमन से पहले वहां पहुंचे त्रिवेंद्र सिंह रावत को तीर्थ-पुरोहितों ने मंदिर परिसर में घुसने तक नहीं दिया था. वे प्रधानमंत्री के दौरे के भी विरोध की चेतावनी दे रहे थे. इससे घबराए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी अपने दो वरिष्ठ मंत्रियों को साथ लेकर केदारनाथ गए. उन्होंने किसी तरह यह कहकर तीर्थ-पुरोहितों को मनाया कि 30 नवंबर तक इस मसले को सुलझा लिया जाएगा.

तीर्थ-पुरोहित उस वक्त तो मान गए लेकिन चारों धाम के बंद होने बाद उन्होंने देहरादून में उन मंत्रियों के सामने विरोध जताना शुरू कर दिया जो केदारनाथ में मुख्यमंत्री के साथ उन्हें मनाने आए थे. 27 नवंबर को उन्होंने आक्रोश दिवस मनाया. लगातार जोर पकड़ रहे आंदोलन के आसन्न चुनावों पर प्रभाव को देखते हुए मुख्यमंत्री धामी ने आखिरकार इस विधेयक को वापस लेने की घोषणा कर दी. जानकारों के अनुसार, उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग और चमोली जिले की आठ विधानसभा सीटों पर तीर्थ-पुरोहितों के आंदोलन का प्रभाव था. माना जा रहा है कि 4 दिसंबर को प्रधानमंत्री की चुनाव रैली में कोई बाधा खड़ी न हो, इसलिए भी उससे पहले अधिनियम को वापस लेने का ऐलान किया गया.

चारधाम तीर्थ पुरोहित महापंचायत ने इसे ऐतिहासिक और साहसिक कदम बताया है. चारों धाम के तीर्थ-पुरोहित पिछले 734 दिनों से लगातार धरना-प्रदर्शन और आंदोलन कर रहे थे. पंचायत का कहना है कि सरकार ने देर से ही सही, लेकिन तीर्थ-पुरोहितों की भावनाओं को समझा और अधिनियम वापस लिया.

वहीं, मुख्यमंत्री धामी ने कहा कि सरकार ने राज्य के व्यापक जनहित को ध्यान में रखकर अधिनियम को वापस लिया है. इससे पहले इस मसले को लेकर पूर्व सांसद मनोहर कांत ध्यानी की अध्यक्षता में उच्च स्तरीय समिति का गठन किया गया था. समिति से राज्य सरकार को जो संस्तुतियां मिलीं उनका मंत्रिमंडलीय उपसमिति से परीक्षण करवाया गया. मंत्रिमंडलीय उपसमिति की रिपोर्ट के आधार पर ही इस अधिनियम को वापस लेने की घोषणा की गई.

सियासी जानकार चारधाम देवस्थानम प्रबंधन बोर्ड को भंग करने के ऐलान को मुख्यमंत्री धामी का बड़ा दांव मान रहे हैं. यह मुद्दा राज्य की विपक्षी कांग्रेस और आम आदमी पार्टी को भी पहाड़ों में सियासी जमीन हासिल करने का मौका दे रहा था. उससे धर्म की सियासत करने वाली भाजपा की जमीन के बंजर होने का खतरा आन पड़ा था. अधिनियम वापसी के ऐलान से भाजपा को उसकी यह जमीन फिर से बचने की उम्मीद है.

हालांकि कांग्रेस नेता और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने कहा कि भाजपा सरकार ने हार के डर से इस अधिनियम को वापस लिया है. उन्होंने कहा कि भाजपा ने जिस तरह देवस्थानम बोर्ड के मसले पर यू-टर्न लिया है, उससे स्पष्ट है कि भाजपा जनता का विश्वास खो चुकी है. उन्होंने कहा कि इस फैसले का फायदा भाजपा को नहीं मिलेगा, बल्कि पूरे प्रदेश में कांग्रेस को ही इसका लाभ होगा.

त्रिवेंद्र सरकार का सिर्फ यही एक फैसला नहीं है जिसे धामी ने पलटा है. बॉन्ड भरकर 50 हजार रु. सालाना में होने वाली मेडिकल की पढ़ाई को महंगा करके बॉन्ड की व्यवस्था को खत्म करने के त्रिवेंद्र सरकार के फैसले को भी पलटते हुए फिर से मेडिकल पढ़ाई की फीस 50 हजार रु. सालाना कर दी गई है. इसके आलावा, गैरसैंण में कमिशनरी के फैसले को अभी ठंडे बस्ते में रखा गया है.

ADVERTISEMENT
Advertisement