दक्षिण अफ्रीका ने 24 नवंबर को कोविड-19 के नए चिंताजनक रूप—जिसे ओमिक्रॉन नाम दिया गया है—की पहली सूचना डब्ल्यूएचओ को दी. अभी एक पखवाड़ा भी नहीं बीता है लेकिन देश में इसके संक्रमण के मामले सामने आने लगे हैं. इसे कोरोना का सबसे संक्रामक रूप बताया जा रहा है और देश इस पर काबू पाने के उपायों की जद्दोजहद में जुट गया है. राष्ट्रीय स्तर पर इन उपायों में ट्रैवल एडवाइजरी, यात्रियों की जांच और क्वारंटीन के सख्त दिशानिर्देश शामिल हैं. कई राज्यों ने अतिरिक्त पाबंदियां भी लगा दी हैं.
यह लिखते समय ओमिक्रॉन के बारे में कम ही बातें पक्के तौर पर कही जा सकती हैं. वायरस विज्ञानियों का कहना है कि मध्य-दिसंबर तक उन्हें इस स्ट्रेन से पैदा खतरे की बेहतर समझ हासिल होने की उम्मीद है और तभी पता चल पाएगा कि यह कितनी तेजी से फैलता है, इसके लक्षण कितने गंभीर हो सकते हैं और उपलब्ध वैक्सीन इसके खिलाफ कितने असरदार हैं. अलबत्ता इस रूप के उभरने से पहले दी गई वे चेतावनियां सच होती नजर आती हैं. उनमें कहा गया था कि कोविड-19 स्वाइन फ्लू की तरह स्थानिक बीमारी बन सकता है, जिसमें असुरक्षित इलाकों में वायरस नियमित अंतराल से रूप बदले और मामलों की संख्या में बढ़ोतरी के नए दौर आएं.
ओमिक्रॉन के उभार ने भारत में कोविड-19 वैक्सीन की तीसरी खुराक देने या न देने को लेकर बहस छेड़ दी है. हालांकि आधी पात्र आबादी को अभी दूसरी खुराक भी नहीं लगी है और इससे देश में टीके लगाने की धीमी रफ्तार का खुलासा होता है. अमेरिका और ब्रिटेन ने सभी वयस्कों के लिए बूस्टर डोज की मंजूरी दे दी, जो दूसरी खुराक के छह महीने बाद दिया जाना है. (हालांकि, ब्रिटेन में इसे 40 साल की उम्र से ऊपर या प्राकृतिक इम्युनिटी को नुक्सान पहुंचाने वाली बीमारियों से ग्रस्त लोगों को देने तक सीमित रखा गया है.) राष्ट्रीय कोविड-19 टास्क फोर्स के चेयरमैन डॉ. एन.के. अरोड़ा कहते हैं, ''टीकाकरण पर राष्ट्रीय तकनीकी सलाहकार समूह अगले दो हफ्ते में बूस्टर डोज के बारे में व्यापक नीति (जारी करेगा). इसमें बताया जाएगा कि किन्हें, कब और कैसे, वैक्सीन (की बूस्टर खुराक) की जरूरत है.'' अगर ओमिक्रॉन वैरिएंट फिलहाल मौजूद और इस्तेमाल वैक्सीन से हासिल सुरक्षा को चकमा देने की क्षमता साबित करता है, तो इतना ही जरूरी नई वैक्सीन विकसित भी करना होगा.
डब्ल्यूएचओ ने चेतावनियां जारी की हैं कि ओमिक्रॉन के दुनिया भर में फैलने की संभावना है और इसने मामलों में उछाल आने का भारी खतरा पैदा कर दिया है, जिसके असुरक्षित इलाकों में 'गंभीर नतीजे' हो सकते हैं. ये मामले चाहे गंभीर हों या न हों, मामलों में अचानक उछाल से स्वास्थ्य सेवाओं पर भारी बोझ तो आ ही सकता है, जिससे मृत्य दर भी बढ़ सकती है. अभी तक ओमिक्रॉन से जुड़ी मौत की कोई सूचना नहीं है, पर चिकित्सा समुदाय इससे संभावित नुक्सान और लोगों को लग चुकी वैक्सीन की रक्षात्मक क्षमता के बारे में पक्की जानकारी पाने में जुटा है. मामलों में उछाल की उम्मीद को देखते हुए डब्ल्यूएचओ का कहना है कि सर्वाधिक प्राथमिकता वाले समूहों को तेजी से टीके लगाने और असुरक्षित इलाकों में स्वास्थ्य सेवा को मजबूत करने की योजना बनाना जरूरी है. इसे फैलने से रोकने के लिए उसने निगरानी बढ़ाने का भी सुझाव दिया है.
दुनिया भर में इसके आर्थिक असर का आकलन करना अभी जल्दबाजी होगी, पर कई देशों ने अंतरराष्ट्रीय यात्राओं पर नई पाबंदियां लगा दी हैं. यह चिंताजनक खबर है, खासकर जब दो साल से भी कम वक्त में कोविड की दो बड़ी लहरों के विनाशकारी नतीजों से दुनिया अभी उबर ही रही है. अगर खतरे की धारणा जोर पकड़ती है और इसकी वजह से नए व्यापार प्रतिबंध लगाए जाते हैं, तो इसका समानांतर प्रभाव आर्थिक बहाली पर पड़ेगा. आपस में जुड़ी और अंतरनिर्भर वैश्विक अर्थव्यवस्था में अबाध आपूर्ति शृंखलाएं आखिरकार बेहद अहम हैं.
भारतीय शेयर बाजारों में हलचल मच ही गई है. चिंताग्रस्त निवेशक धड़ाधड़ बिकवाली कर रहे हैं. बीएसई (बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज) का सेंसेक्स 26 नवंबर को 1,688 अंकों से ज्यादा गिरकर 57,107 पर बंद हुआ. उसी दिन एनएसई (नेशनल स्टॉक एक्सचेंज) का निफ्टी 50 अंक गिरकर 509.8 पर बंद हुआ. क्रिसिल के चीफ इकोनॉमिस्ट डी.के. जोशी कहते हैं, ''हर किसी ने सोचा कि खतरा महामारी से हटकर महंगाई जैसे मुद्दों पर आ गया है. पर हालिया घटनाएं इशारा करती हैं कि वायरस अभी गया नहीं है और अपनी मौजूदगी जता रहा है.''
अच्छी बात यह कि कोविड-19 की पहली और दूसरी लहरों से सबक सीखकर सरकारें और कारोबार इससे निपटने के लिए बेहतर तैयार हैं. मसलन, पहली लहर के दौरान राष्ट्रीय लॉकडाउन के विनाशकारी अनुभव के बाद इस साल दूसरी लहर के दौरान केंद्र ने स्थानीय लॉकडाउन का फैसला राज्यों पर छोड़ दिया. यही वजह थी कि कोविड के कम असर वाले क्षेत्रों में कारोबार और फैक्ट्रियां ढीले प्रतिबंधों के तहत काम कर पाईं, जिससे अर्थव्यवस्था को तेजी से उबरने में मदद मिली.
अर्थशास्त्रियों को उम्मीद है कि ओमिक्रॉन आर्थिक बहाली को ठप नहीं करेगा. आर्थिक गतिविधियां जारी रखने के लिए भारत के टीकाकरण अभियान (देश की करीब 40 फीसद आबादी को पूर्ण टीके लग चुके हैं) को तेज गति देना जरूरी है. हमने जितने भी उद्योगपतियों से बात की, तकरीबन हरेक ने टीके लगाने की रफ्तार फिर तेज करने की जरूरत बताई. फोर्ब्स मार्शल के को-चेयरमैन नौशाद फोर्ब्स कहते हैं, ''यह बहुत बुरा है कि अगस्त और सितंबर में टीके लगाने की इतनी अच्छी रक्रतार मिलने के बाद अक्तूबर और नवंबर में हमने इतनी भारी गिरावट देखी—कुछ इस तरह मानो हमने जीत का ऐलान कर दिया हो. टीके लगाने की गति में सुधार हमारी प्राथमिकता और फोकस होना चाहिए.''
रेटिंग एजेंसी एसऐंडपी ग्लोबल ने एक रिपोर्ट में कहा कि दुनिया के बाकी हिस्सों के मुकाबले एशिया-प्रशांत क्षेत्र के देशों में बहाली की राह कहीं ज्यादा कमजोर है और इसकी मुख्य वजह यह है कि भारत सहित इन अर्थव्यवस्थाओं में टीके लगाने की रफ्तार सुस्त रही है. मॉर्गन स्टेनली ने भी कहा कि भारत को फिर लॉकडाउन लगाने पर विचार करना पड़ सकता है, जो नए वैरिएंट के फैलाव पर निर्भर करेगा और इसका आर्थिक वृद्धि पर गंभीर असर पड़ सकता है. रिपोर्ट में वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं के बाधित होने को लेकर आगाह किया गया. यह कहती है, ''मसलन, डेल्टा लहर के दौरान भारत और आसियान समूह के देशों की उत्पादन गतिविधियों पर उत्तर एशिया से कहीं ज्यादा असर पड़ा. हम यही दोबारा होते देख सकते हैं.''
फिलहाल तो किसी भी स्वास्थ्य मानदंड से कहीं ज्यादा ये यात्रा प्रतिबंध ही हैं जो चिंता बढ़ा रहे हैं. मसलन, भारत 15 दिसंबर से अंतरराष्ट्रीय उड़ानें फिर नियमित करने की योजनाओं की समीक्षा कर रहा है. ऑस्ट्रेलिया ने अंतरराष्ट्रीय कामगारों और छात्रों के लिए अपनी सीमाएं फिर खोलने की योजना 29 नवंबर को एकाएक रोक दी. जापान, सिंगापुर और इज्राएल सहित कई देशों ने विदेशियों के प्रवेश पर रोक लगा दी या ओमिक्रॉन से प्रभावित देशों से आने वाले यात्रियों पर पाबंदियां लगा दीं. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, नया वैरिएंट अब तक कम से कम 20 देशों में मिला है. इनमें ब्रिटेन, जर्मनी, नीदरलैंड, डेनमार्क, इटली और ऑस्ट्रेलिया भी हैं. ज्यों-ज्यों ज्यादा देश इसकी जद में आते जाएंगे, वैश्विक अर्थव्यवस्था और खासकर यात्रा क्षेत्र पर ओमिक्रॉन का प्रभाव बढ़ता जाएगा.

