अमिताभ श्रीवास्तव
करीब दो साल पहले बिहार के सामाजिक विभाग के प्रमुख राज कुमार ने पहली बार एक 10 वर्षीय बच्चे प्रकाश (बदला हुआ नाम) के बारे में सुना था. वह केवल बांग्ला बोलता था. उसे मिर्गी आती थी और उसको 2015 में मुजफ्फरपुर रेलवे स्टेशन पर भटकता पाया गया था. वह अकेले ही पश्चिम बंगाल के पूर्वी बर्धमान स्थित अपने घर से मालदा में रहने वाले अपने दादा-दादी के पास जाने के लिए ट्रेन पकड़ने चला था पर खो गया. समाज कल्याण अधिकारियों ने उसे सहरसा के सरकारी बाल गृह में भेज दिया. वहां उसकी जरूरतों का तो ध्यान रखा जाता था पर उसका भविष्य अब भी अनिश्चित था.
बच्चे की हालत देख कुमार ने कुछ करने की ठानी. उसका इलाज उनकी पहली प्राथमिकता थी. मुजफ्फरपुर और पटना के सरकारी और निजी अस्पतालों में उन्होंने उसका इलाज कराया. साल भर में मिर्गी के दौरे नियंत्रण में आ गए. पर 2010 बैच के आइएएस अधिकारी कुमार का लक्ष्य बड़ा था. वे प्रकाश को उसके परिवार के साथ देखना चाहते थे. उनकी टीम पता लगाने में जुटी कि आखिर उसने ट्रेन कहां से ली होगी. वे पश्चिम बंगाल के कई कस्बों-शहरों में गए और बंगाल और झारखंड में अधिकारियों की मदद मांगी पर कोई सुराग न मिला.
कुमार को ख्याल आया कि क्यों न यूआइडीएआइ (भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण) से संपर्क किया जाए, शायद वहां मौजूद किसी बायोमेट्रिक विवरण से प्रकाश के बारे में कोई जानकारी मिल जाए. कुमार बताते हैं, ''खोजने पर हमें पश्चिम बंगाल के पूर्वी बर्धमान जिले में एक डेटा ऐसा मिला जो प्रकाश के बायोमेट्रिक से मैच खाता था.
टीम भेजी गई और उसे कामयाबी मिली. जो लड़का पांच साल से लापता था, अंतत: इस साल फरवरी में परिवार से मिल पाया.'' उन्हें ऐसी कई सफलताएं मिली हैं. 15 सितंबर को कुमार की टीम ने अररिया जिले में एक 14 वर्षीया मूक-बधिर बच्ची को उसके परिवार से मिलाया. लड़की 3 मार्च को अररिया बस स्टैंड पर खो गई थी. समाज कल्याण अधिकारियों ने उसे किशनगंज के आश्रय गृह में भेजा और अधिकारियों ने महीनों की मशक्कत के बाद उसके माता-पिता को खोज निकाला.
समाज कल्याण विभाग बायोमेट्रिक पद्धति का उपयोग कर इस वर्ष 70 लापता बच्चों को उनके घर वापस भेजने में सफल रहा है. उनमें से 17 लड़कियां थीं. उन 17 में से बंगाल और झारखंड की चार लड़कियों को विशेष देखभाल की जरूरत थी. कुमार मुस्कराते हुए कहते हैं, ''बच्चों को माता-पिता से मिलाकर बेहद सुकून मिलता है''.
कुमार की पहल सिर्फ गुम हुए बच्चों को उनके माता-पिता से मिलाने तक सीमित नहीं है. उन्होंने 2018 में कुख्यात मुजफ्फरपुर आश्रय गृह से छुड़ाई गई 14 लड़कियों के लिए बेंगलूरू में पेशेवर प्रशिक्षण की व्यवस्था की है. उन्होंने बिहार सरकार को बाल आश्रयों में खाद्य आपूर्ति और अधिक धन आवंटित करने के लिए राजी किया और दंपतियों को लापरवाही से अपने बच्चों को कूड़ेदान में या ट्रेन की पटरियों पर छोड़कर जाने से रोकने के लिए सरकारी अस्पतालों में पालने लगवाए हैं.
बतौर एक नौकरशाह कुमार के पास उपलब्धियों के रूप में दिखाने को बेशक सड़कें, भवन और बड़ी परियोजनाएं तो नहीं हैं पर वे वंचित बच्चों को जीवन में दूसरा मौका देने की कोशिश में योगदान देकर बेहद संतुष्ट महसूस करते हैं. वे कहते हैं, ''मैं खुद को धन्य महसूस करता हूं क्योंकि मेरी नौकरी ने वहां बदलाव लाने का मौका दिया है जहां यह सबसे ज्यादा मायने रखता है.''

