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उत्तराखंडः देवता पर दावा!

मुख्यमंत्री धामी के आश्वासन के बाद तीर्थ पुरोहितों का गुस्सा फिलहाल शांत है. लेकिन अगर इस आश्वासन को शीघ्र पूरा नहीं किया गया तो उनकी नाराजगी आगामी चुनावों में भाजपा पर भारी पड़ सकती है

नाराजगी मुख्यमंत्री धामी के आश्वासन के बाद देवस्थानम बोर्ड के खिलाफ आंदोलनरत तीर्थ पुरोहितों का गुस्सा फिलहाल शांत हुआ
नाराजगी मुख्यमंत्री धामी के आश्वासन के बाद देवस्थानम बोर्ड के खिलाफ आंदोलनरत तीर्थ पुरोहितों का गुस्सा फिलहाल शांत हुआ
अपडेटेड 3 अगस्त , 2021

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने चार धाम देवस्थानम प्रबंधन बोर्ड में संशोधन के लिए उच्च अधिकार प्राप्त समिति गठित करने का आश्वासन दिया है. इसके बाद बोर्ड को लेकर मचा घमासान फिलहाल कुछ हद तक शांत हो गया है. लेकिन आंदोलन की चिंगारी अंदर-ही-अंदर सुलग रही है. चार धाम तीर्थ पुरोहित हक-हकूकधारी महापंचायत ने इस आश्वासन पर शीघ्र कदम उठाने की मांग की है. बोर्ड के खिलाफ आंदोलित पुरोहितों ने सत्तासीन भाजपा के नेताओं पर अपना गुस्सा जताना शुरू कर दिया था, जिससे सरकार थोड़ी झुकती दिखी.

दरअसल, 5 जून को राज्य के सचिव, संस्कृति एवं धर्मस्व, दिलीप जावलकर ने इस बोर्ड में कुछ सदस्यों को नामित करने की अधिसूचना जारी की, जिसने इस मामले में आग में घी डालने का काम कर दिया था. इस अधिसूचना से बोर्ड में आठ सदस्य नामित किए गए हैं. इनमें तीन उद्योगपति और पांच तीर्थ पुरोहितों और हक हकूक धारियों के वंशजों को शामिल किया गया है. इसमें हिंदू धार्मिक मामलों में विशेष रुचि रखने वाले भूत, वर्तमान और भविष्य के दानदाता की श्रेणी में उद्योगपति अनंत अंबानी की नियुक्ति की गई है.

इनके अलावा सज्जन जिंदल और महेंद्र शर्मा को भी बोर्ड में सदस्य बनाया गया है. बोर्ड में पुजारियों और हक हकूक धारियों को प्रतिनिधित्व देने के लिए जिन पांच तीर्थ पुरोहितों को बतौर सदस्य शामिल किया गया है, उनमें श्रीनिवास पोस्ती, जयप्रकाश उनियाल, कृपाराम सेमवाल, गोविंद सिंह पंवार और आशुतोष डिमरी शामिल हैं.

विवाद इस बिंदु को लेकर भी उठ खड़ा हुआ है कि क्या बोर्ड में सदस्य बनाने की शर्त हिंदू धार्मिक मामलो में विशेष रुचि रखने के साथ ही दानदाता होना भी है? इस पर सवाल उठाते हुए तीर्थ पुरोहित महापंचायत के प्रवक्ता डॉ. बृजेश सती कहते हैं, ''अगर दानदाताओं को नामित करना है तो चारधाम के लिए काली कमली वाले से बड़ा दानदाता कौन है? काली कमली ने तो तब यहां दान के लिए थैलियां खोल दी थीं जब चारधाम का दुनिया को पता ही नहीं था.'' भविष्य के दानदाता के रूप में बोर्ड का सदस्य नामित होना पंडा बिरादरी के बीच चर्चा और संदेह का कारण बना है.

बोर्ड में सर्वाधिक संख्या नौकरशाहों की रखी गई है. व्यवस्था है कि बोर्ड का मुख्य कार्यकारी अधिकारी अखिल भारतीय सेवा का उच्चतम वेतनमान के ग्रेड वेतन वाला अफसर ही होगा. मुख्य कार्यकारी अधिकारी बोर्ड के अंदर असीमित अधिकार प्राप्त पदाधिकारी होगा. बोर्ड में उच्च अधिकार प्राप्त समिति अलग से होगी जो कि ऐक्ट की धारा 11(2) के अनुसार समय-समय पर बोर्ड की ओर से प्रत्यायोजित सभी शक्तियों का प्रयोग करेगी.

तीर्थ पुरोहितों का गुस्सा इस कारण और भड़क गया था कि जिस बोर्ड के खिलाफ लड़ाई सुप्रीम कोर्ट से लेकर चारों धामों में भी लड़ी जा रही है, उसमें सदस्य नामित करने की हड़बड़ी सरकार क्यों दिखा रही है. वह भी तब जबकि तत्कालीन मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत पुरोहितों को इस बोर्ड के गठन को लेकर पुनर्विचार करने का भी आश्वासन दे चुके थे. तीर्थ पुरोहितों इसलिए भी भड़क गए हैं कि राज्य के पर्यटन तीर्थाटन संस्कृति एवं धर्मस्व मंत्री सतपाल महाराज ने बोर्ड पर किसी तरह के पुनर्विचार को खारिज कर दिया. नाराज पुरोहितों ने उनका पुतला जलाकर मंत्रिमंडल से उनकी बर्खास्तगी तक की मांग कर डाली. फिर मंत्री ने यह कहकर इस विवाद से अपना पल्ला झाडऩे की कोशिश की कि उनके बयान को मीडिया ने तोड़-मरोड़ कर पेश किया.

तीर्थ पुरोहितों का कहना है कि बोर्ड का मकसद सीधे तौर पर मंदिर की पारंपरिक और आर्थिक गतिविधियों में सरकारी हस्तक्षेप करना है. इस बोर्ड के जरिए सरकार चार धाम समेत बाकी के मंदिरों में अपने चहेते लोगों का हस्तक्षेप बढ़ाने की फिराक में है, ताकि पुरानी व्यवस्थाएं ध्वस्त हो जाएं. तीर्थ पुरोहित सरकार की उस मंशा पर भी सवाल उठाते हैं, जिसमें यह कहा जा रहा है कि बोर्ड का गठन प्रदेश के चारों प्रसिद्ध धामों को सुनियोजित विकास और देश-दुनिया से आने वाले श्रद्धालुओं को बेहतर सुविधा तथा सुरक्षा मुहैया करवाने के मकसद से हुआ है.

पंच पंडा सिमिति, रुद्रपुर के अध्यक्ष अनित शुक्ल कहते हैं कि अगर सरकार का वास्तव में मकसद धामों में बेहतर सुविधाएं और सुरक्षा को लेकर है, तब उन्हें यह काम हरिद्वार की मंशा देवी और अन्य बड़े मंदिरों से करना चाहिए, जहां यात्रा साल भर चलती रहती है. उन्होंने कहा कि असल में सरकार ने उन्हीं मंदिरों को बोर्ड के अधीन शामिल किया है, जिनमें पारंपरिक तौर पर हक-हकूकधारी सदियों से जुड़े हुए हैं. तीर्थ पुरोहित राज्य के अन्य बड़े मंदिरों जैसे कोटद्वार का सिद्धबली मंदिर, सुरकंडा देवी और नीलकंठ महादेव आदि को इस बोर्ड से अलग रखे जाने पर भी सवाल उठाते हैं. उनका कहना है कि सरकार मंदिरों के प्रबंधन में अफसरशाही को हावी बनाकर अपने चहेते लोगों को बोर्ड में शामिल कर हक-हकूकधारियों के अधिकार छीनने का खेल शुरू कर रही है. इस खेल से मंदिरों की संपत्ति के भी खतरे में आने की आशंकाएं बढ़ गई हैं. बद्री-केदार मंदिरों की संपत्तियां-धर्मशालाएं देश के विभिन्न स्थानों पर हैं.

दिसंबर 2019 में देवस्थानम बोर्ड अधिनियम विधानसभा में पारित किया था और जनवरी 2020 में इसके जरिए देवस्थानम बोर्ड का गठन कर दिया. बोर्ड का गठन होने से पहले ही इसे लेकर तीर्थ पुरोहितों ने इसका विरोध शुरू कर दिया था.

डॉ. बृजेश सती के अनुसार, देवस्थानम अधिनियम के एक क्लॉज में यह व्यवस्था दी गई है कि चार धाम की संपत्ति का विनिमय, विक्रय, गिरवी रखने या पट्टे पर देने की कार्यवाही अब बिना बोर्ड की अनुमति के नहीं होगी. राज्य में विपक्षी पार्टियां जिनमें वामपंथी संगठन शामिल हैं, इस अधिनियम के खिलाफ अधिक मुखर हैं. उनके अनुसार, असल में ऐसी व्यवस्था इसलिए की गई है कि इन संपत्तियों को बोर्ड जिसे चाहे उसे दे देगा, और यह अब कानूनी तरीके से किया जाएगा.

बोर्ड के खिलाफ आंदोलन से जुड़े गद्दी पुरोहित पंकज शुक्ल कहते हैं कि सरकार कहती रही कि पुरोहितों और हक-हकूकधारियों के हित प्रभावित नहीं होंगे, पर बोर्ड ने विभिन्न पूजा के बाकायदा रेट तय कर उसे वेबसाइट पर डालकर इसे कमर्शियल बना डाला है तो पुरोहितों के हक अब बचे कहां.

गंगोत्री मंदिर के रावल शिवप्रकाश महाराज का कहना है कि बोर्ड गठन के पीछे सरकार की मंशा सीधे उन लोगों के हाथ में मंदिरों का नियत्रंण दे देना है, जो इस मुल्क में पहले ही संपत्ति के एक बड़े हिस्से को कब्जा कर चुके हैं. वहीं, राज्य में भाकपा माले के नेता इंद्रेश मैखुरी इस बोर्ड के गठन को ही असंवैधानिक करार दे रहे हैं. उनके अनुसार, संविधान में यह उल्लेखित है कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है. यहां नागरिकों का तो धर्म है, अनुच्छेद 25 में नागरिकों को पूजा का अधिकार भी दिया गया है, पर राज्य धर्मनिरपेक्ष है.

लेकिन जो बोर्ड विधेयक सरकार ने पारित किया, उसमें श्राइन बोर्ड का अध्यक्ष मुख्यमंत्री तो होगा लेकिन शर्त यह है कि तभी होगा जब वह हिंदू हो. अगर वह हिंदू नहीं होगा तो वह हिंदू धर्म को मानने वाले वरिष्ठ मंत्री को बोर्ड का अध्यक्ष नामित करने को बाध्य होगा. बोर्ड में नामित होने वाले तीन सांसदों और छह विधायकों के लिए भी हिंदू धर्म का अनुसरण अनिवार्य शर्त रखी गयी है. मैखुरी कहते हैं कि संविधान का अनुच्छेद 15 तो कहता है कि किसी नागरिक के साथ धर्म, नस्ल, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता. लेकिन उत्तराखंड की भाजपा सरकार ने जो कानून पास किया, उसमें मुख्यमंत्री, सांसद, विधायकों के साथ ही धार्मिक आधार पर भेदभाव की व्यवस्था कर दी गई है.

मुख्यमंत्री के अलावा बोर्ड में धर्म-संस्कृति के मंत्री होंगे, मुख्य सचिव, पर्यटन सचिव, धर्म, संस्कृति के सचिव, वित्त सचिव के अलावा भारत सरकार के पर्यटन एवं संस्कृति मंत्रालय के संयुक्ति सचिव या उससे उच्च पद के व्यक्ति, विशेष आमंत्रित सदस्य होंगे. ये शासकीय सदस्यों की श्रेणी में हैं. वहीं, नामांकित सदस्यों में सबसे पहले टिहरी रियासत के राजपरिवार के सदस्य रखे गए हैं.

जाहिर है, धामी के आश्वासन के बाद तीर्थ पुरोहितों का गुस्सा फिलहाल शांत है. लेकिन अगर इस आश्वासन को शीघ्र पूरा नहीं किया गया तो उनकी नाराजगी आगामी चुनावों में भाजपा पर भारी पड़ सकती है.

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