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दिल्लीः राजधानी पर कब्जा

केंद्र की ओर से लाया गया नया जीएनसीटीडी कानून दिल्ली सरकार के अधिकारों और सुप्रीम कोर्ट के 2018 के फैसले को कथित तौर पर दरकिनार करते हुए उपराज्यपाल को सौंपता है दिल्ली की वास्तविक कमान

गोपाल अग्रवाल, राष्ट्रीय प्रवक्ता, भाजपा
गोपाल अग्रवाल, राष्ट्रीय प्रवक्ता, भाजपा
अपडेटेड 9 अप्रैल , 2021

केंद्र और दिल्ली सरकार के बीच कार्यकारी शक्तियों की साझेदारी कलह भरा मसला रहा है. दिल्ली पूर्ण राज्य नहीं है, लेकिन यह राष्ट्रीय राजधानी अपने विधायक चुनती है और इसकी अपनी स्वतंत्र सरकार है. हालांकि भूमि, कानून-व्यवस्था और पुलिस पर दिल्ली सरकार का कोई अख्तियार नहीं है और इनके बारे में फैसले दिल्ली के उपराज्यपाल के मार्फत केंद्र लेता है.

दिल्ली की आप (आम आदमी पार्टी) सरकार और केंद्र में काबिज भाजपा (भारतीय जनता पार्टी) के बीच रिश्ते खास तौर पर तल्ख होने की वजह से हाल के वक्तों में यह समस्या और बदतर हुई है. आप ने अदालतों का दरवाजा भी खटखटाया और आरोप लगाया कि उपराज्यपाल दिल्ली सरकार के फैसलों पर अमल में देरी कर रहे हैं. जुलाई 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने आप के पक्ष में फैसला सुनाया और कहा कि उपराज्यपाल के दफ्तर को स्वतंत्र निर्णय लेने का अधिकार नहीं है और वह चुनी हुई सरकार की सलाह से बंधा है. उस फैसले ने उपराज्यपाल के कामकाज के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश तय किए थे.

लेकिन मार्च के आखिरी दिनों में संसद के दोनों सदनों ने जीएनसीटीडी (संशोधन) विधेयक 2021 पारित किया और इसे राष्ट्रपति की भी मंजूरी मिल गई. यह कानून उस फैसले और चुनी हुई दिल्ली सरकार के आज्ञापत्र को दरकिनार करता है तथा राज्य सरकार के सभी कार्यकारी फैसलों के लिए उपराज्यपाल की मंजूरी को अनिवार्य बनाता है. जानी-मानी वकली इंदिरा जयसिंह ने कहा कि यह नया कानून सुप्रीम कोर्ट के 2018 के फैसले और संविधान के कुछ प्रावधानों, खासकर अनुच्छेद 239 एए को दरकिनार करता है.

इंडिया टुडे की डिप्टी एडिटर श्वेता पुंज ने भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता गोपाल कृष्ण अग्रवाल और आप के राजनैतिक मामलों की समिति की सदस्य आतिशी मार्लेना से बात करके जानने की कोशिश की कि दिल्ली की सरकार के लिए इसके नतीजे क्या होंगे और आने वाले दिनों में क्या होगा. मुख्य अंश:

गोपाल अग्रवाल, राष्ट्रीय प्रवक्ता, भाजपा

इस कानून का क्या औचित्य था?

दिल्ली सरकार (अपनी शक्ति संविधान के) अनुच्छेद 239 से (प्राप्त करती) है. कुछ अस्पष्टताएं थीं (उपराज्यपाल और दिल्ली सरकार के अधिकारों को लेकर) जो राजकाज में मुश्किलें पैदा कर रही थीं. दिल्ली की हुकूमत चलाने वाली दो सत्ताएं होने के कारण और आप की कामकाज की शैली के कारण, ये दोनों लगातार झगड़ती रहती थीं. (यह कानून) दिल्ली सरकार को दी गई शक्तियां साफ-साफ तय करता है. कई मुद्दों, जैसे प्रशासनिक अफसरों और अफसरशाहों की नियुक्ति, में यह (दोहरी व्यवस्था) समस्याएं उत्पन्न कर रही थी.

इस कानून के नतीजे क्या होंगे?

दिल्ली सरकार का कामकाज तालमेल के साथ और सुचारू ढंग से चलना चाहिए, जो नहीं चल रहा था. दिल्ली का केंद्र सरकार के साथ विशेष दर्जा है—ऐसे विषय हैं जिनमें केंद्र को ज्यादा (अधिकार) की जरूरत है. अगर स्पष्टता (अधिकारों को लेकर) नहीं है, तो इससे कुछ निश्चित स्थितियां जटिल हो सकती हैं. मसलन, 26 जनवरी को अरविंद केजरीवाल ने कहा कि वे धरने पर बैठेंगे. चुनी हुई सरकार को संविधान के दायरे में काम करना होता है—वह लोकतंत्र में सर्वोच्च सत्ता नहीं है. हमारा संघीय ढांचा है जिसमें अधिकार बंटे हुए हैं और ये अधिकार स्पष्ट रूप से परिभाषित और बंटे हुए होने चाहिए. (यहां तक कि) उपराज्यपाल की शक्ति भी सुप्रीम नहीं है—उन्हें राष्ट्रपति की सम्मति लेने की जरूरत है. यह कानून अनुच्छेद 239 में 66 संशोधन को स्पष्ट करता है, जो स्पष्टता लाते हैं.

आम आदमी पार्टी का कहना है कि भाजपा राजधानी में चुनाव नहीं जीत सकी इसलिए दूसरे तरीकों से यहां की कमान अपने हाथों में लेने की कोशिश कर रही है.

यह राजनैतिक लफ्फाजी है. यह तर्क कि एक पार्टी दूसरी से ज्यादा प्रो-गर्वनेंस है, कहीं ठहरता नहीं है. दिल्ली के मुख्यमंत्री ने 26 जनवरी को धरने पर बैठने की धमकी दी—आप उपराज्यपाल के घर पर धरने पर बैठ गई. उनका काम करने का एक निश्चित तरीका है, जो मुख्यमंत्री के लिए (शोभा नहीं देता). संसद सर्वोपरि है. किसी को भी सुप्रीम कोर्ट में जाने का हक है. लेकिन एक बार जब कानून बन गया, तो यह देश का कानून बन जाता है और इसे चुनौती देना आसान नहीं होता.

आतिशी मार्लेना, सदस्य, राजनैतिक मामलों की समिति, आप

आप इस कानून के औचित्य को कैसे देखती हैं?

दिल्ली (चुनाव) में भाजपा इकाई अंक से आगे नहीं बढ़ सकी. यहां एक बेहद लोकप्रिय सरकार सत्ता में है. भाजपा आप को चुनावी लड़ाई में पछाड़ नहीं पाई, (तो) सत्ता लेने के लिए (उन्होंने यह कानून पास किया है).

इस कानून के नतीजे क्या हैं?

तथ्य यह है कि विधेयक असंवैधानिक है. यह तथ्य कि दिल्ली सरकार अपनी शक्ति संविधान के अनुच्छेद 239 से हासिल करती है, बहुत विवाद का विषय रहा है. मामला पांच सदस्यीय संविधान पीठ को (सौंपा) गया (जिसने) फैसला दिया कि जमीन, कानून-व्यवस्था और पुलिस के अलावा सभी दूसरे विषय दिल्ली की चुनी हुई सरकार के अधीन हैं. सुप्रीम कोर्ट इन मामलों को स्पष्ट कर चुका है. केवल तीन रिजर्व विषय हैं—भूमि, कानून-व्यवस्था और पुलिस. (गैर-रिजर्व विषयों पर) उपराज्यपाल (एलजी) को बस इतना अधिकार है कि वे फैसलों को राष्ट्रपति के पास भेज दें. यही सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने कहा है. सरकार का विधेयक संविधान पीठ के फैसले के खिलाफ जाता है और कहता है कि दिल्ली की सरकार के हरेक कार्यकारी फैसले का अनुमोदन एलजी से करवाना होगा. दिल्ली की चुनी हुई सरकार को दिए गए संवैधानिक आदेश को बदलने का अधिकार संसद को नहीं है.

अब दिल्ली की सरकार को किसी भी चीज पर कोई अधिकार नहीं होगा—एलजी सब कुछ ठप कर सकते हैं. (इस समस्या की वजह से) राजकाज दो या तीन साल ठप रहा था. सीसीटीवी कैमरे (का विषय ही लीजिए). तीन साल पहले हमारे 20 विधायक एलजी के दफ्तर में जाकर धरने पर बैठ गए थे, क्योंकि (दिल्ली में सीसीटीवी कैमरे लगाने का) फैसला महीनों से एलजी के यहां लटका हुआ था. सेवाओं की घर-घर डिलिवरी के मामले में हमने (इस पर अमल का) फैसला किया और एलजी ने यह कहकर वापस कर दिया कि मैं नहीं समझता यह अच्छा विचार है, इससे यातायात और प्रदूषण बढ़ेगा. दिल्ली सरकार अपने अधिकारों से हाथ धो बैठी.

अब क्या?

अब हम यह मुद्दा दिल्ली की सड़कों पर, कानून की अदालत में और हर संभव मंच पर ले जाएंगे. यह देश के लोकतांत्रिक और संघीय स्वरूप पर हमला है.

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