मध्य प्रदेश व्यावसायिक परीक्षा मंडल (एमपीपीईबी), जिसे व्यापम कहा जाता है, की ओर से आयोजित एक भर्ती परीक्षा के परिणामों में सिलसिलेवार संदेहास्पद 'संयोग' की खबर सामने आने के बाद इसकी जांच शुरू कर दी गई है.
दरअसल, 10 और 11 फरवरी को एमपीपीईबी ने 823 ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी और कृषि विकास अधिकारी के पदों के लिए लिखित परीक्षा आयोजित की थी. परीक्षा ऑनलाइन हुई थी और उम्मीदवारों को मौके पर ही उसके रिजल्ट मिल गए थे. वहीं एमपीपीईबी ने 17 फरवरी को अपनी वेबसाइट पर ऐन्सर शीट भी अपलोड कर दी, जिसे उम्मीदवार अपने रोल नंबर का उपयोग करके हासिल कर सकते थे.
इस परीक्षा में सम्मिलित कुछ उम्मीदवारों को परीक्षा केंद्र पर मौजूद एक कर्मचारी ने अपनी शेखी बघारते हुए बताया कि कुछ उम्मीदवारों के चयनित होने के संभावना सबसे ज्यादा है. तब उन उम्मीदवारों ने टॉपर्स की ऐन्सर शीट एक जैसी होने को आसानी से पकड़ लिया और फिर उन्होंने खुद से ही जांच करने का फैसला किया. इसके लिए उन्होंने शीर्ष 10 टॉपर्स के रोल नंबर और जन्म तिथि की मदद से उनकी ऐन्सर शीट को एक्सेस कर लिया. उन्होंने यह भी पाया कि एक को छोड़कर सभी टॉपर्स एक ही समुदाय के हैं और वे सभी भिंड या मुरैना से हैं.
राज्य में 2013 में इसी तरह का एक और घोटाला सामने आया था जिसकी अभी भी जांच चल रही है. तब इस बात का खुलासा हुआ था कि सरकारी नौकरियों और प्रोफेशनल कोर्सेज में भर्ती के लिए प्रवेश परीक्षा से छेड़छाड़ की जा रही थी. इस घटना को अब 'व्यापम घोटाला' के रूप में जाना जाता है. शुरुआत में तो राज्य की पुलिस इसकी जांच कर रही थी, लेकिन फिर इसे 2015 में सीबीआइ के सुपुर्द कर दिया गया, जिसने अब तक 3,000 से अधिक लोगों के खिलाफ चार्जशीट दायर की है और लगभग 150 मामलों में 100 दोषी पाए गए हैं.
विपक्षी दलों के बार-बार हल्ला मचाने और राज्यभर में छात्रों की विरोध रैली के बाद ही मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने ट्विटर पर ऐलान किया कि कथित अनियमितताओं की जांच कराने के आदेश दे दिए गए हैं.
इसी परीक्षा के उम्मीदवार और शिकायतकर्ताओं में से एक, रंजीत रघुनाथ ने बताया कि ऐसा पहली बार हुआ है जब एमपीपीईबी की किसी परीक्षा में इतने अधिक अंक दिए गए हों. उन्होंने कहा, ''टॉपर को 200 में से 194 अंक मिले हैं और बाकी लोगों के अंक 192 और 187 के बीच.'' रघुनाथ खंडवा के कृषि महाविद्यालय से ग्रेजुएट हैं और वे आरोप लगाते हैं कि टॉपर्स में से किसी का भी शैक्षणिक रिकॉर्ड बहुत अच्छा नहीं था. वे सवाल करते हैं, ''उन्होंने अपनी चार साल की स्नातक डिग्री पांच या उससे अधिक साल में पूरी की है. उनमें से एक को तो सात साल लग गए. अगर वे इतने ही मेधावी थे, तो स्नातक डिग्री को पास करने में उन्हें इतना समय क्यों लगा?'' रघुनाथ के मुताबिक, दिलचस्प यह है कि उन सभी टॉपर्स ने एक जैसी गलती की. वे कहते हैं, ''एमपीपीईबी की ऐन्सर शीट में तीन सवालों के जवाब गलत थे और टॉप स्कोरर परीक्षार्थियों ने भी उन्हीं तीन सवालों के गलत जवाब दिए हैं.''
अधिकारी चुप्पी साधे हुए हैं और संपर्क करने की कई कोशिशों के बावजूद एमपीपीईबी की निदेशक शनमुगा प्रिया मिश्रा और चेयरमैन के.के. सिंह से इंडिया टुडे को 11 मार्च तक प्रतिक्रिया नहीं मिली. सूत्रों का कहना है कि बोर्ड के मुताबिक, किसी गलत काम के लिए दोषी परीक्षा केंद्र होना चाहिए.
दूसरी ओर, इस परीक्षा को आयोजित करने वाली कंपनी एनएसईआइटी पर भी आरोप हैं. कृषि महाविद्यालय, टीकमगढ़ से स्नातक और इस परीक्षा को देने वाले बलराम परिहार कहते हैं, ''मुंबई स्थित एनएसईआइटी इससे पहले भी उत्तर प्रदेश में 2017 में, उप-निरीक्षकों की भर्ती से संबंधित विवाद में शामिल थी. इसके अलावा तमिलनाडु में शिक्षकों की भर्ती के मामले में भी इसके खिलाफ शिकायतें थीं.'' इस सवाल पर एनएसईआइटी के स्टाफ ने भी किसी प्रकार की टिप्पणी करने से इनकार कर दिया. एनएसईआइटी के भोपाल केंद्र के प्रभारी कृष्णम द्विवेदी ने कहा, ''इस समय इस पर कुछ भी कहना सही नहीं होगा.''

