आमतौर पर स्थानीय निकायों के चुनाव शहरी मतदाताओं के बीच सरकार की लोकप्रियता का संकेत माने जाते हैं. राजस्थान में पिछले 15 महीनों के दौरान हुए स्थानीय निकायों के चुनावों में भाजपा के प्रदर्शन पर कांग्रेस को मामूली बढ़त मिली है. फिर भी मुख्यमंत्री अशोक गहलोत गद्गद हैं, उन्होंने इन नतीजों को शहरी लोगों के बीच उनके शासन के प्रति एक स्पष्ट विश्वास करार दिया है. लेकिन भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनिया का दावा है कि राजस्थान में निकाय चुनावों में राजस्थान की जनता ने कांग्रेस को खारिज कर दिया है. उनकी मानें तो कांग्रेस ने सत्ता में रहते हुए आम तौर पर हाल के वर्षों में स्थानीय निकायों के चुनावों में इससे खराब प्रदर्शन कभी नहीं किया.
इन नतीजों में भाजपा के 2,673 वार्डों के मुकाबले कांग्रेस ने 3,036 वार्ड जीते हैं. तटस्थता से देखें तो प्रदेश की सत्ता पर काबिज कांग्रेस का प्रदर्शन इस चुनाव में भाजपा से बेहतर रहा है, लेकिन ये नतीजे उसे भविष्य में कड़े मुकाबले के लिए तैयार रहने की ओर भी इशारा करते हैं. ऐसे चुनाव का विश्लेषण करना उतना आसान नहीं है जिसको लेकर करीब 15 महीने से असमंजस की स्थिति बनी रही हो, क्योंकि कुल 195 निकायों में 54 नए निकाय जोड़े गए हैं. इसके अलावा, इस परिसीमन के पीछे गहलोत की रणनीति यह भी रही है कि कांग्रेस से छिटकते मतदाताओं जैसे कि अल्पसंख्यकों का एक पूरा वार्ड बनाया जाए. साथ ही छह प्रमुख नगर निगमों में प्रत्यक्ष चुनाव करवाने के फैसले ने भी उनके पार्टी के उम्मीदवारों को जीत दिलाई.
कांग्रेस ने अपनी ताकत का इस्तेमाल उन सभी निकायों में किया, जहां निर्दलीय उम्मीदवारों को जीतने के लिए स्पष्ट बहुमत मिला था. जैसे कि 20 जिलों के 90 निकाय चुनावों के आखिरी चरण में कांग्रेस को भाजपा से कम यानी 24 की तुलना में 19 पर स्पष्ट बहुमत मिला था, लेकिन आखिरी परिणाम में कांग्रेस 48 निकायों में बोर्ड बनाने में सफल रही. कांग्रेस ने इसे अपनी बहुत बड़ी जीत माना क्योंकि 2015 में जब राज्य सरकार के रूप में भाजपा ने इन 90 निकायों में से 60 पर जीत हासिल की थी. इस बार राजसमंद, चूरू और बूंदी में भाजपा को बड़ा नुकसान हुआ है.
कुल मिलाकर, सभी 195 स्थानीय निकायों के चुनावों में 1.5 करोड़ मतदाताओं ने वोट डाले, जिनमें से कांग्रेस ने 123 निकायों पर कब्जा कर लिया जबकि भाजपा को सिर्फ 64 पर संतोष करना पड़ा. कोविड से पहले नवंबर 2019 में हुए चुनावों में कांग्रेस ने 36 निकायों में और भाजपा ने 12 में बोर्ड बनाए थे. तब भी भाजपा केवल दो प्रमुख निगमों में अपने बोर्ड बना सकी जबकि कांग्रेस चार में. दिसंबर 2020 में कांग्रेस ने 50 में से 36 में बोर्ड बनाए. लेकिन कांग्रेस अपने चुनाव चिन्ह पर सभी वार्डों में जीत के साथ-साथ मतदान प्रतिशत में भाजपा से केवल थोड़ा ही आगे रही है. गौर करने वाली बात यह है कि कांग्रेस को पूरे राजस्थान में भाजपा से करीब एक प्रतिशत अधिक वोट मिला. इतने ही वोटों ने दिसंबर 2018 में हुए विधानसभा चुनावों में 27 सीटें इधर से उधर कर दी थीं.
इस तरह विपक्ष में रहते हुए भी भाजपा ने 2019-2021 के चुनावों में 32 प्रतिशत शहरी निकायों में बोर्ड बनाए हैं, जबकि 2000 में 138 बोर्डों में से 52 पर जीत हासिल कर 37 प्रतिशत बोर्ड जीत सकी और 2010 में 44 प्रतिशत बोर्ड जीती जबकि उसने 138 वार्डों में से 62 में जीत हासिल की थी. इस लिहाज से समय रहते भाजपा को अपने खिसकते आधार की चिंता करनी चाहिए क्योंकि विपक्ष में रहते हुए बोर्ड बनाने में यह उसका अब तक सबसे खराब प्रदर्शन है. भाजपा जब सत्ता में थी तो उसने 1995 में 55 प्रतिशत, 2005 में 64 प्रतिशत और 2015 में 66 प्रतिशत बोर्ड बनाए थे. दूसरी ओर, कांग्रेस जब सत्ता में थी तो उसने 2000 में 47 प्रतिशत, 2010 में सिर्फ 37 प्रतिशत और अब 2019-21 में 63 प्रतिशत तक पहुंच गया, जो उसका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है लेकिन 2015 में भाजपा का प्रदर्शन कांग्रेस से अधिक 66 प्रतिशत रहा था.
हालांकि राजस्थान के प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा का कहना है कि पार्टी ने जानबूझकर कई वार्डों में अपने सिंबल पर चुनाव नहीं लड़ा, वहां निर्दलीय उम्मीदवारों का समर्थन किया, कांग्रेस को निश्चित रूप से अपने सिंबल पर बेहतर प्रदर्शन करना चाहिए था.
कुछ भी सही, इन नतीजों के राजनीतिक निहितार्थ तो हैं ही. पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के समर्थकों ने इन नतीजों के माध्यम से अपने मन की बात सामने रख दी है कि पार्टी अच्छा प्रदर्शन नहीं कर रही है और इसके अलावा पार्टी कोविड के दौरान आम लोगों की कठिनाइयों के बावजूद मतदाताओं को बूथों तक पहुंचाने में विफल रही है. वहीं कांग्रेस के लिए भी राह उतनी आसान नहीं रही. कोविड के अलावा पूर्व प्रदेश पार्टी प्रमुख सचिन पायलट के भारी विद्रोह का भी उसे सामना करना पड़ा, जिसके तहत सभी मंत्रियों और विधायकों को एक महीने से अधिक समय तक होटल और रिसॉर्ट में बंद रहना पड़ा. वैसे भी शहरी चुनावों में पायलट को कुछ हासिल होने वाला नहीं था, हालांकि उन्होंने 21 जिलों में हुए पंचायती राज चुनावों में कांग्रेस के खराब प्रदर्शन का हवाला दिया था, जहां भाजपा के 13 की अपेक्षा कांग्रेस 5 जिलों में ही बोर्ड बना सकी थी, जिसमें दो निर्दलीय भी जीते थे फिर भी हाइकमान ने उन्हें अधिक महत्व देने का फैसला किया.
फिलहाल राजस्थान में भाजपा और कांग्रेस आमने-सामने हैं और उनके नेताओं के बीच तगड़ा मुकाबला आगामी चार विधानसभा उपचुनावों में होगा जो अगले एक या दो महीने में होने वाले हैं. इनमें से तीन सीटें कांग्रेस के पास थीं. गहलोत और पायलट दोनों ही अपने वफादारों को उम्मीदवारी दिलवाने के लिए जी-जान लगा देंगे. पूनिया और राजे को भी कमोवेश ऐसे ही हालात से दो-चार होना पड़ेगा. ये सभी चुनाव के नतीजों को प्रभावित करने वाले कारक होंगे. गहलोत और पूनिया की प्रतिष्ठा सबसे ज्यादा दांव पर लगी है. आने वाले समय में राजस्थान में राजनीतिक उठापटक देखने को मिल सकती है.

