किसान 26 जनवरी को शक्ति प्रदर्शन करने के लिए राजधानी की सड़कों पर उतरे थे. उस दौरान जमकर हिंसा हुई और कुछ देर के लिए तो किसानों ने लाल किले पर कब्जा कर लिया था. इन घटनाओं के कारण प्रदर्शनकारी किसान अब बैकफुट पर हैं. किसान नेताओं के बीच फूट भी पड़ी है. कई किसान नेता जिन्होंने सरकार को भरोसा दिलाया था कि गणतंत्र दिवस पर होने वाली ट्रैक्टर रैली शांतिपूर्ण रहेगी, वे अब वादाखिलाफी करने वाले किसान नेताओं से दूरी बनाते दिख रहे हैं.
उन्होंने जोर देकर कहा है कि सरकार की ओर से विवादास्पद कृषि कानूनों की वापसी तक अपना शांतिपूर्ण प्रतिरोध जारी रखने की किसानों की योजना को एक गुट ने हाइजैक कर लिया. इस डर से कि हिंसक घटनाओं के कारण उनके प्रति जनता की सहानुभूति खत्म हो सकती है और पुलिस तथा सरकार भी कार्रवाई करेगी, इन विरोध प्रदर्शनों में शामिल 40-किसान संगठनों के एक समूह संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) ने बयान जारी करके कहा है कि वह बजट दिवस (1 फरवरी) को संसद की ओर कूच करने की योजना से पीछे हट रहा है. इसके बजाए, इसके नेताओं ने 30 जनवरी को महात्मा गांधी की पुण्यतिथि पर एक दिन का उपवास रखने का फैसला लिया है.
संगठनों का यह भी कहना है कि उन्होंने किसान मजदूर संघर्ष समिति के किसान नेताओं सतनाम सिंह पन्नू और स्वर्ण सिंह पंधेर जो पंजाब के माझा क्षेत्र के किसानों का प्रतिनिधित्व करते हैं, और अभिनेता से एक्टिविस्ट बने दीप सिद्धू से अपना नाता तोड़ लिया है. हालांकि उन्होंने कुछ अन्य नेताओं मसलन भारतीय किसान यूनियन (टिकैत) के राकेश टिकैत, गुरनाम सिंह चढूनी और दर्शन पाल ग्रेवाल पर चुप्पी साध ली है. दिल्ली पुलिस का मानना है कि इन किसान नेताओं ने भड़काऊ भाषण दिए और ट्रैक्टर रैली की आड़ में किसानों को उपद्रव के लिए उकसाया.
दिल्ली पुलिस ने लाल किले की हिंसा और घेराबंदी के संबंध में स्वराज इंडिया के नेता योगेंद्र यादव और पर्यावरण एक्टिविस्ट मेधा पाटकर के अलावा, एसकेएम के छह प्रवक्ताओं सहित 35 से अधिक नेताओं के खिलाफ 25 एफआइआर दर्ज की हैं और 200 से अधिक संदिग्धों को हिरासत में लिया है. 28 जनवरी को इस खबर के लिखे जाने तक और अधिक गिरफ्तारियों की उम्मीद थी. एफआइआर में दंगे भड़काने, आपराधिक साजिश, हत्या की कोशिश, सार्वजनिक संपत्ति को नुक्सान, अवैध हथियार रखने और डकैती के आरोपों के लिए आइपीसी की धाराएं लगाई गई हैं. पुलिस अधिकारियों का कहना है कि जानबूझकर चरमपंथी तत्वों को रैली की कमान लेने की अनुमति दी गई थी, जिसकी शुरुआत रैली शुरू होने के लिए दिए गए दोपहर के समय से कई घंटे पहले सिंघु और टिकरी के विरोध स्थलों पर पुलिस बैरिकेड्स को तोड़ने के साथ हुई थी.
सख्ती की उम्मीद
भरोसेमंद सूत्रों के मुताबिक, केंद्र सरकार अब इस किसान आंदोलन पर अपना रुख सख्त करेगी, जिसमें नवंबर के आखिर से ही पंजाब, हरियाणा और अन्य राज्यों के हजारों लोगों को दिल्ली की सीमाओं पर डटे देखा गया है. किसानों की केंद्र सरकार के साथ 10 दौर की वार्ता भी हो चुकी है जो बेनतीजा रही. भाजपा के मीडिया सेल के प्रमुख अनिल बलूनी ने कहा, ''गणतंत्र दिवस रैली के लिए अनुमति मांगते समय किसान नेताओं ने जो वादे किए थे, उनका सम्मान करने की बजाए उन्होंने कमान उपद्रवियों को सौंप दी. पुलिस अब इन उत्पातियों से निपटेगी.''
कृषि कानूनों के खिलाफ याचिका पर सुनवाई कर रही मुख्य न्यायाधीश एस.ए. बोबडे और जस्टिस ए.एस. बोपन्ना और वी. रामसुब्रह्मण्यम की सुप्रीम कोर्ट की बेंच के समक्ष भी विभिन्न किसान संगठनों को जवाब देना होगा.
सरकार के बीच एक दृष्टिकोण यह भी उभरा है कि किसानों का आंदोलन अब गति खो देगा, हालांकि 29 जनवरी से शुरू होने वाले संसद के बजट सत्र में हंगामे की पूरी उम्मीद की जा रही है. संसदीय सूत्रों के अनुसार, सरकार दिल्ली में हुई हिंसा पर एक निंदा प्रस्ताव लाने की योजना भी बना रही है. उसका मानना है कि इस कदम से किसानों को समर्थन कर रहे विपक्षी दल अपना समर्थन खींचने को विवश होंगे. दूसरी ओर विपक्षी सांसद, विशेष रूप से कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, वामपंथी दल और आम आदमी पार्टी, कृषि कानूनों को लेकर जल्दबाजी दिखाने और 10 दौर की वार्ता के विफल रहने के मुद्दे पर मोदी सरकार को घेरने की कोशिश करेंगे.
फिलहाल, किसान संगठन अपने विरोध को तब तक जारी रखने के लिए कृतसंकल्प हैं जब तक कि कृषि कानूनों को रद्द करने की उनकी मांग पूरी नहीं हो जाती. 22 जनवरी को हुई पिछली वार्ता में, केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने अगले 18 महीनों के लिए कानूनों को निलंबित करने और एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) को कानूनी दर्जा प्रदान करने के लिए एक समिति गठित करने की पेशकश की थी.
खालिस्तान की छाया
पंजाब में केंद्रीय और राज्य सुरक्षा एजेंसियों दोनों को डर है कि चरमपंथी तत्व किसानों के विरोध प्रदर्शन का इस्तेमाल, पंजाब के कम से कम 12 जिलों में लोगों को कट्टरपंथी बनाने के लिए कर रहे हैं. सीमावर्ती राज्य होने के नाते, एजेंसियों को डर है कि किसी भी रोष, विशेष रूप से युवाओं में, का इस्तेमाल पाकिस्तान की ओर से खालिस्तानी भावना को भड़काने के लिए किया जा सकता है. भारतीय खुफिया एजेंसियों ने प्रदर्शनकारी किसानों को उकसाने के लिए बने 308 संदिग्ध ट्विटर अकाउंट की पहचान की है, जिन्हें कथित तौर पर सीमा पार से चलाया जा रहा है.
किसान नेताओं का दावा है कि उनका काडर पूरी तरह से उनके नियंत्रण में है, लेकिन दिल्ली में हिंसा की आशंका को भांपने और उसे रोक पाने में उनकी अक्षमता कई तरह के सवाल खड़े करती है. रैली से एक रात पहले, पंजाब के कुछ युवा किसानों ने सिंघु बॉर्डर के विरोध स्थल पर बने मंच पर कथित रूप से कब्जा कर लिया था और भड़काऊ भाषण दिया था.
हालांकि, केंद्र सरकार अभी भी किसानों को जबरन हटाने के पक्ष में नहीं है. उसका मानना है कि प्रदर्शनकारी किसान आखिरकार थक जाएंगे और विरोध-स्थलों को छोड़कर अपने घर वापस चले जाएंगे. केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावडेकर ने कहा, ''गणतंत्र दिवस पर इतना उपद्रव करने के बाद भी, सरकार किसान संगठनों के साथ बातचीत के लिए तैयार है.'' लेकिन सरकार ने यह भी साफ कर दिया है कि वह इन कृषि कानूनों को निरस्त नहीं करेगी.
सूत्रों का कहना है कि अगले दौर की बातचीत में, सरकार कृषि कानूनों पर दो साल की मोहलत का प्रस्ताव दे सकती है और किसानों के संगठनों के पास और सौदेबाजी के लिए अब ज्यादा गुंजाइश नहीं बची है. नाम न छापने की शर्त पर एक केंद्रीय मंत्री, कहते हैं, ''हिंसा के बाद आंदोलन ने अपनी विश्वसनीयता खो दी है. जल्द ही एक समझौते पर पहुंचना, किसानों के लिए एक बेहतर विकल्प होगा.''

