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आरोग्य सेतु: इस ऐप के 'लंबे हाथ'

सरकार आरोग्य सेतु ऐप को कोरोना के संक्रमण की निगरानी के लिए उपयोगी बता रही है. लेकिन साइबर विशेषज्ञ सुरक्षा उपयोगकर्ताओं की गोपनियता को लेकर इस ऐप पर सवाल भी खड़े कर रहे हैं.

आरोग्य सेतु ऐप पर बहस (इलस्ट्रेशनः सिद्धांत जुमडे)
आरोग्य सेतु ऐप पर बहस (इलस्ट्रेशनः सिद्धांत जुमडे)
अपडेटेड 21 अप्रैल , 2020

अप्रैल की 14 तारीख को कोरोना वायरस लॉकडाउन को बढ़ाने का ऐलान करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारतीयों से महामारी का मुकाबला करने के लिए सात-स्तरीय रणनीति का पालन करने की अपील की. उनके सुझाए उपायों में से एक था, संपर्क पर नजर रखने वाला आरोग्य सेतु ऐप को डाउनलोड करना. नीति आयोग की ओर से परिकल्पित आरोग्य सेतु को मेकमाइट्रिपडॉटकॉम और वीएमजीडॉटकॉम जैसे ऐप के डेवलपर्स के सहयोग से राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र ने दो सप्ताह में विकसित किया है.

आरोग्य सेतु को इस आधार पर डिजाइन किया गया है कि अगर दो मोबाइल फोन एक-दूसरे के ब्लूटूथ रेंज में हैं, तो उनके उपयोगकर्ता एक-दूसरे तक नॉवेल कोरोना वायरस का संक्रमण पहुंचाने के लिए पर्याप्त निकट हैं. 11 भारतीय भाषाओं में उपलब्ध इस ऐप को 2 अप्रैल को लॉन्च किया गया और अब तक यह करीब 5 करोड़ डाउनलोड हुए हैं.

विश्व बैंक की 12 अप्रैल को जारी एक रिपोर्ट कहती है कि आरोग्य सेतु जैसे अभिनव समाधान संक्रामक रोगों को ट्रैक करने में मदद कर सकते हैं, वहीं ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय भी डिजिटल संपर्क-निगरानी को प्रभावी मानता है, बशर्ते कि इस तकनीक को व्यापक रूप से अपनाया गया हो.

लेकिन गोपनीयता के मुद्दों पर आरोग्य सेतु की आलोचना भी हो रही है क्योंकि यह उपयोगकर्ताओं के नाम, आयु, लिंग, पेशे और पिछले 30 दिनों में भ्रमण किए गए देशों से जुड़ी जानकारियों की मांग करता है. हर 15 मिनट में, यह उपयोगकर्ता के स्थान और उसके भ्रमण के स्थानों के बारे में डेटा एकत्र करता है. ऐप की सेवा की शर्तों के अनुसार, व्यक्तिगत जानकारी और लोकेशन के डेटा को मोबाइल डिवाइस पर सुरक्षित रूप से संग्रह किया जाता है.

जानकारी को सिर्फ तभी एक केंद्रीय सर्वर पर अपलोड किया जाता है जब जांच के बाद उपयोगकर्ता के कोविड-19 से संक्रमित होने की पुष्टि होती है या लक्षणों का आत्म-मूल्यांकन उसमें संक्रमण की संभावना जताता है.

सर्वर पर अपलोड करते वक्त, जानकारी को एक यूनीक और रैंडम तरीके से उत्पन्न डिवाइस आइडी नंबर (डीआइडी) के साथ अलग किया जाता है, जिसका इस्तेमाल उपयोगकर्ता के ऐप-संबंधी सभी बाद की गतिविधियों को पहचानने के लिए किया जाता है. इस ऐप को विकसित करने में केंद्र सरकार ने कई विशेषज्ञों से परामर्श भी लिया था, जिनमें साइबर डिफेंस एक्सपर्ट राहुल माथन भी शामिल हैं. माथन बताते हैं, ''डीआइडी को व्यक्तिगत जानकारी के साथ फिर से तभी जोड़ा जाता है, जब उपयोगकर्ता के संक्रमण का खतरा इतना अधिक हो कि सरकार को उस शख्स को जांच के लिए कहने की जरूरत महसूस होती है.''

जब दो पंजीकृत उपयोगकर्ता एक-दूसरे के ब्लूटूथ रेंज में आते हैं, तो उनके ऐप स्वचालित रूप से डीआइडी और सूचनाओं का आदान-प्रदान करते हैं कि दोनों के बीच संपर्क कहां और कितनी देर तक हुआ है. हर फोन अपने नजदीक आए हर दूसरे फोन का एक लॉग बनाता है, जिससे एक उपयोगकर्ता के संपर्क में आने वाले लोगों की एक सामाजिक श्रृंखला बन जाती है. अगर एक उपयोगकर्ता को कोविड-19 की जांच में संक्रमित पाया जाता है, तो सिस्टम उन सभी को अलर्ट करता है जो उस व्यक्ति के नजदीक संपर्क में आए थे. ऐसे उपयोगकर्ताओं को सलाह दी जाती है कि वे स्वयं को क्वारंटीन करें और अगर उनमें लक्षण विकसित हों तो वे जांच कराएं.

आरोग्य सेतु की उपयोगकर्ता दिल्ली की आरती सिंह (बदला हुआ नाम) को इसी तरह एक अलर्ट मिला कि जब वह किराने की दुकान पर गईं तो उनके निकट संपर्क में आए एक व्यक्ति के जांच के बाद कोरोना संक्रमित होने की पुष्टि हुई है. 42 वर्षीया आर्किटेक्ट आरती का कहना है, ''ऐप ने मुझे अलर्ट भेजा क्योंकि इसने मेरी लोकेशन रिकॉर्ड कर ली थी.'' उन्होंने जांच कराई और राहत कि आरटी-पीसीआर (रिवर्स ट्रांसक्रिप्शन पॉलीमरेज चेन रिएक्शन) परीक्षण में उनमें संक्रमण की पुष्टि नहीं हुई.

साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों का दावा है कि सिंगापुर और इज्राएल जैसे अन्य देशों के संपर्क-निगरानी ऐप में अनुचित रूप से इतने अधिक हस्तक्षेप की कोशिश नहीं हो रही. सिंगापुर का ट्रेसटुगेदर ऐप केवल उपयोगकर्ता का मोबाइल नंबर मांगता है. वहां कोविड संक्रमित व्यक्ति की सहमति लेने के बाद ही डेटा को एक केंद्रीय सर्वर में स्थानांतरित किया जाता है. ट्रेसटुगेदर ऐप लोकेशन डेटा भी एकत्र नहीं करता है.

कोविड-19 के लिए प्रौद्योगिकी के उपयोग से जुड़े दिशानिर्देशों में, यूरोपीय कमिशन ने स्थान या लोगों की व्यक्तिगत यात्राओं से जुड़ी सूचनाओं की प्रोसेसिंग के खिलाफ परामर्श दिया है. आरोग्य सेतु जीपीएस लोकेशन की सूचना भी लेता है, जबकि संपर्क ट्रेस करने में इसकी कोई भूमिका नहीं. नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत कहते हैं, ''लोकेशन डेटा का उपयोग निगरानी के लिए नहीं किया जाएगा. इसका उपयोग हॉटस्पॉट की पहचान के लिए होता है. कोविड-19 संक्रमित व्यक्ति की पहचान कभी किसी के समक्ष उजागर नहीं की जाएगी.''

ऐप की गोपनीयता नीति में कहा गया है कि जानकारी सिर्फ ''रिपोर्ट तैयार करने, हीट मैप्स और अन्य सांख्यिकीय गणना के उद्देश्य से'' ली जाती है और उसे अनाम और संकलित डेटासेट में क्लाउड सर्वर पर अपलोड किया जाता है. आलोचकों का तर्क है कि यह स्पष्ट नहीं है कि सरकार का 'अनाम' से क्या आशय है. संपर्क पर नजर रखने वाले ऐप पर एक विस्तृत रिपोर्ट में, नई दिल्ली स्थित एनजीओ इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन (आइएफएफ) ने डेटा संग्रह और भंडारण, उद्देश्य सीमा और पारदर्शिता के संदर्भ में ऐप की कमियों को चिन्हित किया है.

ऐप की गोपनीयता नीति में कहा गया है कि सूचनाओं को फोन से 30 दिनों और सर्वर से 45 दिनों के बाद हटा दिया जाएगा, उपयोगकर्ता को अगर उस अवधि में जांच में कोविड संक्रमित नहीं पाया जाता है. जिस उपयोगकर्ता में संक्रमण की पुष्टि हुई है उससे जुड़ी सूचनाओं को उसके स्वस्थ घोषित होने के 60 दिनों के बाद हटा दिया जाएगा. लेकिन ऐप के लिए रजिस्ट्रेशन करते समय एकत्र व्यक्तिगत डेटा को तब तक बनाए रखा जाएगा जब तक कि खाता मौजूद है और उसके बाद भी, जब तक कि किसी लागू कानून के तहत यह आवश्यक हो. इस नीति में कहीं भी, इसके लिए कानूनी आवश्यकता को परिभाषित नहीं किया गया है.

आइएफएफ के नीति और संसदीय परामर्शदाता सिद्धार्थ देब कहते हैं, ''उपयोगकर्ताओं के पास यह जांचने का कोई तरीका नहीं है कि सरकार ने उनका डेटा हटा दिया. उनके पास सरकार को जवाबदेह ठहराने का एक न्यायिक विकल्प होना चाहिए.'' आपत्ति का एक अन्य बिंदु जवाबदेही से जुड़ा प्रावधान है जो उपयोगकर्ता की सूचना के अनधिकृत उपयोग और संशोधन की स्थिति में सरकार को इस चूक के लिए उत्तरदायी ठहराए जाने से छूट देते हैं.

एकत्र व्यक्तिगत सूचना का खुलासा नहीं किया जा सकता है या किसी तीसरे पक्ष को हस्तांतरित नहीं किया जा सकता है, पर आलोचक ध्यान दिलाते हैं कि निजता नीति यह निर्दिष्ट नहीं करती कि डेटा का अधिकार किस विभाग के पास है.

यह केंद्र सरकार की संपत्ति है और पुलिस समेत सभी एजेंसियों के उपयोग के लिए रास्ता खुला है. दूसरी आशंका यह है कि सरकार मौजूदा सरकारी डेटाबेस के साथ ऐप के डेटा को जोड़कर अपनी निगरानी शक्तियों को बढ़ा सकती है, जिनमें से कई मोबाइल नंबरों पर आधारित हैं.

देब एक प्रावधान पर सवाल उठाते हैं जो सरकार को कोविड-19 से संबंधित ''चिकित्सा और प्रशासनिक हस्तक्षेप'' के लिए ''अन्य आवश्यक और प्रासंगिक व्यक्तियों'' के साथ व्यक्तिगत डेटा साझा करने की अनुमति देता है.

वे कहते हैं, ''प्रशासनिक कार्यों का मतलब यह भी हो सकता है कि लॉकडाउन और क्वारंटीन आदेशों को लागू करने के लिए भी ऐसी जानकारी का उपयोग किया जाए. यह वैश्विक बेस्ट प्रैक्टिसेज के खिलाफ है.

मिसाल के लिए, यूरोपीय संघ का कहना है कि ऐसे ऐप से एकत्र किए गए डेटा का उपयोग सिर्फ स्वास्थ्य संबंधी संकट से निपटने के लिए किया जाना चाहिए.''

माथन का तर्क है कि स्वास्थ्य मंत्रालय अकेले कोविड-19 से मुकाबला नहीं कर सकता और इस लड़ाई में विभिन्न विभागों का सहयोग और जानकारियां साझा करना जरूरी है.

भारत में अनुमानित 40 करोड़ या उसके अधिक स्मार्टफोन उपयोगकर्ता हैं. उनमें से 50 फीसद भी आरोग्य सेतु को डाउनलोड करते हैं, तो इससे 20 करोड़ लोगों के संपर्क-ट्रेसिंग का नक्शा तैयार हो सकता है जो देश की कुल आबादी का 15 फीसद है.

सेंटर फॉर इंटरनेट ऐंड सोसाइटी के कार्यकारी निदेशक अंबर सिन्हा कहते हैं, ''अभूतपूर्व संकट में, ऐप का उद्देश्य उचित हो सकता है, पर यह आनुपातिकता की कसौटी पर खरा नहीं उतरता है.

सिर्फ कोविड-19 संक्रमित उपयोगकर्ताओं का डेटा ही क्लाउड सर्वर पर लाया जाना चाहिए.'' देब जैसे विशेषज्ञों के अनुसार, ऐप के कोड का ओपन सोर्स नहीं होना, इसकी पारदर्शिता के साथ समझौता है. यह बैकएंड स्रोत की रिवर्स इंजीनियरिंग से उपयोगकर्ताओं को प्रतिबंधित करता है, इसलिए स्वतंत्र रिसर्चर इसकी जांच नहीं कर सकते.

विश्व बैंक की रिपोर्ट में कहा गया है, ''ट्रैकिंग सिस्टम पर उद्देश्य पूर्ति के बाद स्वत: निरस्त होने के कानूनी प्रावधान (सनसेट प्रॉविजन) को लागू करके गोपनीयता संबंधी चिंताओं से निपटा जा सकता है.''

अगला लक्ष्य, आइवीआर सपोर्ट के जरिए फीचर फोन के साथ एकीकृत करके आरोग्य सेतु को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक सक्रिय कराना है.

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