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महाराष्ट्रः पैसा कहां से आएगा?

किसानों की कर्जमाफी के लिए पैसा जुटाना मुख्यमंत्री के लिए आसान नहीं

मंदार देवधर
मंदार देवधर
अपडेटेड 21 जनवरी , 2020

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने पिछले साल 21 दिसंबर को जब 2 लाख रु. तक किसानों का कर्ज माफ करने की घोषणा की तो उन्हें अच्छी तरह पता था कि इससे राज्य के खजाने पर 30,000 करोड़ रु. का बोझ पड़ेगा. वे पहले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर जीएसटी के राजस्व में राज्य का 17,000 करोड़ रु. का हिस्सा दिए जाने का अनुरोध कर चुके हैं.

राज्यों को कर्जमाफी का बोझ ऐसे समय उठाना पड़ रहा है जब वह पहले ही 4.71 लाख करोड़ रु. के कर्ज में दबा हुआ है. यह रकम राज्य के सकल घरेलू उत्पाद (एसजीडीपी) का 17 फीसद है जो आरबीआइ की ओर से निर्धारित सीमा से महज छह फीसद बिंदु नीचे है. वित्त विभाग के दिसंबर 2019 के एक नोट में बताया गया है कि महाराष्ट्र अपनी आय का 59 फीसद हिस्सा वेतन, पेंशन और कर्ज का ब्याज देने में खर्च कर देता है.

राज्य सरकार के अनुमान के मुताबिक, इस कर्जमाफी से करीब 40 लाख किसानों को फायदा मिलेगा. कुछ अनुमानों के अनुसार, सरकार अगर कर्जमाफी लागू करती है तो उसे दूसरे विभागों के लिए बजट के आवंटन में कम से कम 20 फीसद तक की कटौती करनी पड़ सकती है.

वहीं, उद्धव ठाकरे कहते हैं, ''हम किसानों को कर्जमुक्त करने के लिए प्रतिबद्ध हैं.'' लेकिन एनसीपी के एक मंत्री का कहना है कि कर्जमाफी केवल सतही समाधान है. वे कहते हैं कि अगर फसल ऋण योजना सही तरीके से लागू की जाए तो किसानों को न्यूनतम कर्ज लेने की जरूरत पड़ेगी. वे कहते हैं, ''इससे बहुत बड़ा फर्क पड़ सकता है.'' राज्य सरकार ने इस साल फसल बीमा प्रीमियम पर 2,095 करोड़ रु. खर्च किए जो 2019-20 के लक्ष्य से 1,000 करोड़ रु. कम हैं.

राज्य सरकार कर्जमाफी कर पाती है या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि वह जीएसटी से कितना पैसा जुटा पाती है. इस साल, हालांकि जीएसटी के संग्रह में अच्छा इजाफा हुआ है, लेकिन वह दिसंबर के अंत तक अपना लक्ष्य पूरा नहीं कर पाई है. मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के लिए यह निश्चित रूप से चिंता का विषय है.

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