प्रभावशाली भाजपा नेता पंकजा मुंडे, जिनका पार्टी के वफादार वोट आधार अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) पर खासा प्रभाव है, ने महाराष्ट्र में अपने गृहनगर बीड में 12 दिसंबर को हजारों समर्थकों की एक रैली को संबोधित किया. उन्होंने कहा, ''भाजपा बहुजन की पार्टी रही है. इसे चंद लोगों के नियंत्रण में नहीं रहने दें.''
40 वर्षीया मुंडे ने किसी का नाम नहीं लिया, लेकिन लोगों को समझ आ रहा था कि उनके निशाने पर पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस थे, जिनके साथ उनके संबंध बहुत उतार-चढ़ाव वाले रहे हैं. कद्दावर ओबीसी नेता एकनाथ खडसे की तरह, मुंडे को भी लगता है कि 49 वर्षीय फड़णवीस, एक ब्राह्मण, को अक्तूबर के विधानसभा चुनावों में भाजपा की अपने दम पर बहुमत न हासिल करने की विफलता का दायित्व लेना चाहिए.
मुंडे ने परली विधानसभा सीट राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के प्रत्याशी और अपने चचेरे भाई धनंजय मुंडे के हाथों 32,000 वोटों से गंवा दी. इस हार को अधिक अपमानजनक समझा गया क्योंकि वही एकमात्र भाजपा उम्मीदवार थीं जिनके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह दोनों ने प्रचार किया था. खडसे की बेटी रोहिणी, जो उनकी जगह मुक्तिनगर सीट से लड़ी थीं, निर्दलीय उम्मीदवार चंद्रकांत पाटिल से करीब 5,000 वोटों से हार गईं. खडसे कहते हैं, ''हार के लिए शीर्ष पर मौजूद कोई व्यक्ति जिम्मेदार था. अगर मेरे, विनोद तावड़े और प्रकाश मेहता जैसे वरिष्ठ नेता चुनाव प्रचार में शामिल होते, तो हम पार्टी के लिए 25 और सीटें जीत सकते थे.'' 105 सीटों के साथ, भाजपा राज्य विधानसभा में साधारण बहुमत से 40 सीटें पीछे रह गई.
खडसे और मुंडे दोनों ही भाजपा की उस कोर कमेटी के सदस्य हैं, जिसे नीतिगत फैसले लेने का अधिकार है. उन्होंने पार्टी की हार के लिए जिम्मेदारी तय करने तक समिति की बैठकों का बहिष्कार करने की घोषणा की है. पंकजा मुंडे समर्थक कहते हैं, ''फड़णवीस ने धनंजय के सभी वित्तीय प्रस्तावों को मंजूरी दे दी थी. इससे लगता है कि पंकजा धनंजय के पक्ष में थे.''
मुंडे ने जनवरी से अन्य ओबीसी नेताओं के साथ राज्यव्यापी दौरे की घोषणा की है. वे कहती हैं, ''मैं पीछे नहीं हटने वाली. चाहे तो पार्टी मुझे बरखास्त कर दे.'' फिलहाल, मुंडे को दो विधायकों, मोनिका राजाले और माधुरी मिशल, खडसे, मेहता और भाजपा के पूर्व मंत्री बबनराव लोणीकर का समर्थन हासिल है. लेकिन भाजपा की असली चिंता सिर्फ यह नहीं है कि पंकजा के साथ अन्य पिछड़ा समुदाय के कितने विधायक या नेता हैं. चिंता इस बात को लेकर है कि अगर पार्टी पंकजा पर सख्त कार्रवाई करती है तो राज्य के ओबीसी वोटरों में भाजपा के खिलाफ नाराजगी पनपेगी.
भले ही पंकजा इस समुदाय की सर्वमान्य नेता न हों लेकिन वे राज्य के कद्दावर नेता रहे गोपीनाथ मुंडे की बेटी हैं. ओबीसी समुदाय में गोपीनाथ मुंडे की लोकप्रियता अभी तक है. अगर पंकजा पर कार्रवाई होती है और वे इसे गोपीनाथ मुंडे के अपमान से जोडऩे में सफल हो जाती हैं तो फिर भाजपा को बड़ा नुक्सान हो सकता है. भाजपा के लोग अनौपचारिक तौर पर मानते हैं कि भले ही भाजपा से अलग होकर पंकजा सफल नहीं हो पाएं लेकिन वे पार्टी को नुक्सान तो पहुंचा ही सकती हैं. राज्य में ओबीसी जनसंख्या लगभग पचास फीसद है जो पारंपरिक रूप से भाजपा के वोटर रहे हैं.
1980 के दशक में भाजपा के वसंतराव भागवत ने ओबीसी समुदाय की तीन प्रमुख जातियों—माली, धनगर, वंजारी को पार्टी के पाले में लाने में अहम भूमिका निभाई थी. हालांकि इस चुनाव में पार्टी के तीन प्रमुख ओबीसी नेताओं—योगेश टिलेरकर, राम शिंदे और मुंडे को पराजय का सामना करना पड़ा लेकिन पार्टी धीरे-धीरे इस समुदाय में पैठ बनाती गई और गोपीनाथ मुंडे ओबीसी नेता के रूप में महाराष्ट्र ही नहीं, देश भर में भाजपा की पहचान बन गए. शिवसेना के साथ जब भाजपा ने महाराष्ट्र में पहली सरकार बनाई तो गोपीनाथ मुंडे को उप-मुख्यमंत्री बनाया गया.
2014 में महाराष्ट्र में भाजपा के सत्ता में आने के तुरंत बाद फड़णवीस-पंकजा मुंडे की प्रतिद्वंद्विता खुलकर सामने आने लगी. पंकजा ने यह कहते हुए मुख्यमंत्री पद पर अपना दावा जताया कि वे राज्य की एकमात्र भाजपा नेता हैं जिनके पास बड़े पैमाने पर समर्थक वर्ग है. 2015 में, फड़णवीस ने उनसे जल संरक्षण मंत्रालय उस समय ले लिया था जब वे सिंगापुर में एक सम्मेलन में भाग ले रही थीं. हालांकि उसी वर्ष जब मुंडे पर कथित रूप से एक घोटाले में शामिल होने के आरोप लगे तो फड़णवीस उनके साथ खड़े रहे.
ओबीसी के दो प्रमुख नेताओं, गिरीश महाजन और चंद्रशेखर बावनकुले ने फड़णवीस के प्रति भरोसा जताया है और उन्हें एक दूरदर्शी नेता तथा उत्कृष्ट प्रशासक कहा है. बहरहाल, पूर्व मुख्यमंत्री और पंकजा के बीच मतभेदों को सुलझाया नहीं गया तो भाजपा के अंदर जल्द ही विद्रोह शुरू हो सकता है जिसका संकेत दिखने लगा है.

