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इंडिया टुडे कॉन्क्लेव ईस्ट 2019- पूरब की बात

इंडिया टुडे कॉन्क्लेव ईस्ट 2019 में विमर्श तो हर महत्वपूर्ण विषय पर हुआ, लेकिन नागरिकता विधेयक इस विमर्श में छाया रहा

सौरभ गांगुली, पूर्व क्रिकेटर और बीसीसीआइ अध्यक्ष
सौरभ गांगुली, पूर्व क्रिकेटर और बीसीसीआइ अध्यक्ष
अपडेटेड 18 दिसंबर , 2019

राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) और नागरिकता संशोधन विधेयक (सीएबी) जैसे दो बड़े मुद्दों को लेकर घिरते भ्रम और अनिश्चितताओं के बादल के बीच आयोजित इंडिया टुडे कॉन्क्लेव ईस्ट ने अपने तीसरे संस्करण में बहस का एक नया मुद्दा दिया—क्या नया राम मंदिर मुद्दा केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी के लिए पांच साल बाद होने वाले चुनाव में सफलता सुनिश्चित करने का साधन बनेगा? इंडिया टुडे ग्रुप के प्रधान संपादक अरुण पुरी ने अपने भाषण में सवाल उठाया, ''क्या 2024 में नागरिकता का मुद्दा वैसा ही होगा, जैसा 1990 के दशक में राम मंदिर मुद्दा हुआ करता था?''

इस सवाल ने 6 और 7 दिसंबर को पश्चिम बंगाल के कोलकाता में आयोजित दो दिवसीय सम्मेलन में चर्चा की दिशा तय कर दी.

कानून निर्माता, अधिकारी, न्यायपालिका विशेषज्ञ, खेल, सिनेमा और थिएटर की दुनिया की नामचीन हस्तियां, इन महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा-बहस के लिए जुटीं जो देश और विशेष रूप से पूर्वोत्तर राज्यों के लिए अहम हैं, जैसे पहचान, धर्म और बहिष्कार की राजनीति, आर्थिक मंदी, सुरक्षा और भारतीय महिलाओं की सुरक्षा, क्षेत्रीय सिनेमा और बॉलीवुड, और मल्टीप्लेक्स संस्कृति के युग में क्षेत्रीय सिनेमा के अस्तित्व पर मंडराता संकट.

पश्चिम बंगाल के राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने राज्य में लोकतंत्र पर कुठाराघात की बात कही और खुद को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के मंत्रियों का पीडि़त बताते हुए उनके द्वारा लगातार अपमानित किए जाने की बात भी कही. हालांकि उन मंत्रियों को वह खुद भी 'सनकी' बताते हैं. इस वर्ष की शुरुआत में पदभार संभालने के बाद से, धनखड़ और तृणमूल सरकार की कई मुद्दों पर भिड़ंत हुई है. हालांकि, जब उनसे पूछा गया कि स्थितियां ऐसी हैं कि राष्ट्रपति शासन लगा देना ही उचित होगा तो उन्होंने चुप्पी साध ली.

सीएबी, जो पड़ोसी मुस्लिम देशों के अल्पसंख्यक शरणार्थियों को नागरिकता के साथ-साथ संवैधानिक अधिकार देने का भी प्रस्ताव करता है, के मसले पर कॉन्क्लेव के 'नागरिक कौन?' और 'गैरकानूनी अस्तित्व की पीड़ा' जैसे सत्रों में वैसे ही गंभीर बहस हुई जैसी संसद में होनी संभावित थी. यहां तक कि जिनका इस मुद्दे से सरोकार नहीं है, उन बातों का जिक्र भी छिड़ा, मसलन अगर नागरिकता विधेयक पास हो जाता है, तो देश एक बार फिर से 130 करोड़ लोगों के बीच धार्मिक आधार पर विभाजन का साक्षी बनेगा.

जहां असम के वित्त मंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने स्पष्ट रूप से कहा कि सीएबी से बांग्लादेशी, अफगानी और पाकिस्तानी मुसलमानों को ''जो कि आर्थिक घुसपैठियों के रूप में यहां आए थे'' मुश्किलें होने वाली हैं, तो भाजपा नेता और कट्टरपंथी कैलाश विजयवर्गीय ने कहा कि पड़ोसी मुस्लिम देशों से गैरकानूनी रूप से भारत में घुस आए लोग ही आतंकवाद और नकली नोट के धंधे और अवैध रूप से अफीम की खेती जैसी गैर-कानूनी गतिविधियों के लिए जिम्मेदार हैं.

तीन मुस्लिम देशों में धार्मिक उत्पीडऩ के शिकार के रूप में केवल हिंदू शरणार्थियों को शरण देने की यह योजना क्या वोट बैंक की राजनीति नहीं है, ऐसी आवाजों को विजयवर्गीय ने अपने आक्रोश भरे तर्क से खामोश करने की कोशिश की. विजयवर्गीय ने कहा, ''अगर कोई हिंदू अपने देश में नहीं तो कहां जाएगा? दुनिया में कोई हिंदू देश नहीं है और इसीलिए हम हिंदुओं का स्वागत कर रहे हैं.'' सरमा के मुताबिक एनआरसी और सीएबी के दूरगामी लाभ होंगे. उन्होंने कहा, ''यदि आप अपनी भावी पीढ़ी के लिए एक सुरक्षित भारत देखना चाहते हैं, तो आपको इसकी एक कीमत चुकानी होगी.''

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता उपमन्यु हजारिका ने सीएबी के पीछे की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा कि इसे आनन-फानन में इसलिए लागू किया जा रहा है क्योंकि असम में बने नागरिकता रजिस्टर से 12 लाख हिंदू बंगालियों के नाम बाहर हो गए हैं और इस असंतुलन को ठीक करने करने के लिए यह सारी कवायद की जा रही है. पतंजलि आयुर्वेद के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक आचार्य बालकृष्ण ने भी महसूस किया कि एनआरसी को धर्म पर आधारित नहीं होना चाहिए और इसमें ''जान-बूझकर किसी का बचाव या किसी को लक्ष्य नहीं किया जाना चाहिए.''

सेना की ओर से एक और अधिक तार्किक बात आई—यह सुनिश्चित करने के लिए व्यापक जोखिम प्रबंधन की आवश्यकता है कि सीएबी राष्ट्र के धर्मनिरपेक्ष मूल पर थोपें नहीं. पूर्व सेना प्रमुख बिक्रम सिंह ने कहा, ''हम बांग्लादेश जैसे पड़ोसियों का विरोध नहीं कर सकते, जो कई प्रमुख विद्रोहियों को सौंपने में सक्रिय रहे हैं.''

राज्य में विधानसभा चुनाव में बस अभी डेढ़ साल बाकी हैं लेकिन वन, पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन राज्यमंत्री बाबुल सुप्रियो ने चुनावी माहौल की गर्मी बनाए रखी. कॉन्क्लेव में सुप्रियो ने कहा कि पार्टी ''ममता की एनआरसी के झूठ और सीएबी की सच्चाई को सामने लाने और उसका मुकाबला करने को तैयार है'' क्योंकि बंगाल में लोग, जिन्होंने वाम शासन के परिर्वतन का रास्ता तैयार किया, अब वे परिवर्तन का स्वाद चख चुके हैं और अब परित्राण (राहत और बचाव) चाहते हैं. लेकिन जब तक भाजपा बंगाल में एक मजबूत नेता और एक स्वीकार्य चेहरा और ''ममता बनाम कौन?'' का उत्तर नहीं देती है तब तक विकल्प बन जाना कैसे संभव होगा?

इसके जवाब में सुप्रियो कहते हैं, ''ममता बनाम विकास क्योंकि वह विकास की राह में बड़ी बाधा और स्पीड-ब्रेकर हैं.'' गायक से राजनीतिक बने सुप्रियो ने हालांकि ठहाकों के बीच इशारा दे दिया कि बीसीसीआइ के अध्यक्ष और पश्चिम बंगाल के सभी के लिए 'दादा' पूर्व क्रिकेटर सौरव गांगुली, संभवत: राज्य में ममता के सामने पार्टी का चेहरा हो सकते हैं. हालांकि सम्मेलन के एक वक्ता दादा का इसके बारे में केवल यही कहना था, ''क्रिकेट के लिए दौडऩा और चुनाव के लिए खड़ा होना आसान नहीं है. दोनों के लिए एक मजबूत व्यक्तित्व बहुत जरूरी है.'' खेल चाहे राजनीति का हो या कोई दूसरा, खिलाडिय़ों को प्रदर्शन करने के लिए सही माहौल और स्वतंत्रता की आवश्यकता होती है क्योंकि ''केवल तभी जीतना संभव होता है.''

कॉन्क्लेव में बहस का एक अन्य विषय था, सत्ताधारी दल द्वारा शक्तियों का दुरुपयोग करते हुए आलोचकों के खिलाफ देशद्रोह के आरोप लगाने की बढ़ती प्रवृत्ति. मानसिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता रत्नाबोली रे, जो प्रधानमंत्री को बुद्धिजीवियों द्वारा गोरक्षा की गुंडागर्दी, जय श्री राम के नारे के बेजा इस्तेमाल और मॉब लिचिंग के विरोध में लिखे गए खुले पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले 46 लोगों में से एक हैं, ने कहा कि उन्हें यह बात विचलित करती है कि भारत जैसे एक परिपक्व लोकतंत्र में इस तरह के पत्र को राजद्रोह माना जा सकता है और कानून की अदालत में इसे स्वीकार किया जा सकता है. रे ने कहा, ''यह खालिस तौर पर एक धमकी थी और इसके बाद लिखा गया जवाबी पत्र भी उससे कम नहीं था.''

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश अशोक गांगुली का मत था कि ब्रिटिश भारत में भी राजद्रोह एक संज्ञेय अपराध नहीं था और पिछले कुछ वर्षों में यूके और अमेरिका जैसे विकसित देशों से इसे हटा दिया गया है, लेकिन भारत सरकार इसका इस्तेमाल आलोचकों के स्वर दबाने के लिए कर रही है. उन्होंने कहा, ''यहां तक कि अंग्रेजों की आलोचना करने के लिए बाल गंगाधर तिलक को भी गिरफ्तार नहीं किया जा सकता था, जबकि इस नियम के अनुसार कन्हैया कुमार को गिरफ्तार किया जा सकता है.''

भाजपा के वक्ताओं, फैशन डिजाइनर अग्निमित्र पॉल और पार्टी के महासचिव सायंतन बसु ने बुद्धिजीवियों की नाराजगी पर सवाल उठाते हुए कहा कि आवाज उठाने के प्रश्न पर वे बहुत चयनात्मक हो जाते हैं और जब कभी भी हिंदुओं के साथ भीड़ द्वारा हिंसा होती है या उनको बेवजह गिरफ्तार किया जाता है तो वे चुप्पी साध लेते हैं.

उन्होंने पलटवार के तौर पर बंगाल में दमन की कहानियां साझा कीं और उस युवा भाजपा कार्यकर्ता की पीड़ा की याद दिलाई जिसे ममता बनर्जी की मीम पोस्ट करने की वजह से 10 दिनों तक जेल में रखा गया था.

महिलाओं के खिलाफ अपराधों पर बात करते हुए थिएटर अभिनेत्री उषा गांगुली ने हालिया हैदराबाद बलात्कार मामले के बारे में बात की. उन्होंने कहा, ''जब मैंने सुना कि हैदराबाद बलात्कार के आरोपियों को गोली लगी है, तो मुझे विश्वास नहीं हुआ. ईमानदारी से कहूं तो एक महिला के रूप में मैं खुश हूं, लेकिन एक नागरिक के रूप में मैं दुखी हूं.'' उषा ने अपने नाटक हम मुख्तारा के एक हिस्से का अभिनय भी किया, जो पाकिस्तान में बलात्कार की शिकार मुख्तारन माई की कहानी से प्रेरित है.

''बेटियों के लिए भारत असुरक्षित क्यों है'' शीर्षक वाले सत्र के लिए मंच पर मौजूद महिलाओं ने न्याय देने में न्यायिक प्रणाली की विफलता पर चर्चा की. मिस यूनिवर्स इंडिया 2010, उशोषी सेनगुप्ता, जो खुद छेड़छाड़ की शिकार रही हैं, ने कहा कि ''गोली मारने के लिए पुलिस की वाहवाही हो रही है, लेकिन यह वही पुलिस है जो सुरक्षा देने में विफल रही है.''

राजनैतिक सत्रों के बीच में कुछ सांस्कृतिक सत्र भी हुए जैसे ''आइ एम दास'', जहां पैनलिस्ट—खिलाड़ी हिमा दास, फिल्म निर्माता रीमा दास और अभिनेता लीमा दास—ने कामयाबी के सफर पर बात की. 20 वर्षीय स्वर्ण पदक विजेता स्प्रिंटर हिमा ने खेल में भारत का नाम रोशन किया है, जबकि रीमा की फिल्म विलेज रॉकस्टार 2018 में ऑस्कर में भारत की आधिकारिक प्रविष्टि थी. फिल्म आमिस में लीमा के काम की खूब सराहना हुई है.

आर्थिक मंदी चर्चा का एक और विषय था और अर्थशास्त्रियों और व्यापारियों के पैनलिस्टों ने तर्क दिया कि ''बड़ी मंदी'' का समाधान केवल तभी हो सकता है यदि यह स्वीकार किया जाए कि मंदी है. अर्थशास्त्री पी. एन. विजय ने कहा, ''हर कोई जानता है कि अर्थव्यवस्था में इस समय मांग की कमी है. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की नींद बहुत देर से खुली है.''

आरपी-संजीव गोयनका समूह के अध्यक्ष संजीव गोयनका ने सुझाव दिया कि कंपनियां मंदी से निपटने के बजाए अनुसंधान और नवाचारों में निवेश करें और वृहद स्तर पर बदलाव लाने का प्रयास करें. गोयनका ने मोदी सरकार के बारे में भी बात करते हुए कहा कि वह एनडीए सरकार में जितनी इच्छाशक्ति और दृढ़ संकल्प देखते हैं वैसा पहले की सरकारों में नहीं दिखा था. उन्होंने कहा, ''यह सरकार आम आदमी के प्रति जिस तरह की प्रतिक्रिया दे रही है वैसा अब तक किसी ने नहीं किया है. यह व्यापक सामाजिक और कॉर्पोरेट संरचनात्मक परिवर्तन की कोशिश कर रही है.''

अभिनेत्री यामी गौतम, तापसी पन्नू और राजकुमार राव ने बॉलीवुड का प्रतिनिधित्व किया और फिल्म उद्योग में अपनी सफलता की कहानियां लिखने के दौरान के संघर्ष और धैर्य की अपनी व्यक्तिगत कहानियां साझा कीं. विक्की डोनर, काबिल और बाला जैसी सफल फिल्मों में काम कर चुकी गौतम ने स्वीकार किया कि उन्हें बॉलीवुड में अपनी जगह तलाशने में कई साल लग गए, जबकि राव ने बताया कि कैसे उन्हें यह लगने लगा था केवल मसल्स और एब्स ही उन्हें फिल्मों में भूमिकाएं दिला सकते हैं. राव ने लगातार साबित किया है कि प्रतिभा की सभी कद्र करते हैं.

इन सबके बीच, पतंजलि आयुर्वेद के सह-संस्थापक आचार्य बालकृष्ण और फिटनेस-गुरु सह लेखिका डियानी पांडे इस कॉन्क्लेव को सौम्यता और ठहराव की ओर लेकर आए.

बालकृष्ण ने योग और ध्यान के लाभों पर बात की. जबकि पांडे ने उलटे-सीधे आहारों की जगह ''विटामिन एल (लव)'' के साथ घर में पकाए गए भोजन के लाभों के बारे में बात की. पांडे ने असहमति और असहिष्णुता के इस दौर में जीवन का अपना मंत्र भी साझा किया, ''अंदर से खुश रहो.'' कुल मिलाकर देश के पूर्वी हिस्से में आयोजित कॉन्क्लेव ताजातरीन मसलों पर चर्चा का गवाह बना.

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