शैल देसाई
इस माह रूस के उलान-उदे में महिला विश्व बॉक्सिंग चैपियनशिप के लाइट फ्लाइवेट (48 किग्रा) भारवर्ग में मिले रजत पदक से मंजू रानी सुर्खियों में हैं. इससे पहले केवल एम.सी. मैरी कॉम ही अकेली महिला बॉक्सर थीं जो पहली ही विश्व चैंपियनशिप में फाइनल तक पहुंच गई थीं. उन्होने 2001 में रजत जीता था. लेकिन, मंजू रानी इस रजत पदक को अधिक तवज्जो नहीं देतीं हैं.
सीनियर महिला राष्ट्रीय चैंपियनशिप में हरियाणा का प्रतिनिधित्व करने का मौका पाने के लिए मंजू रानी कुछ साल से इंतजार कर रही थीं. जब उनकी कोशिशें सफल नहीं हुईं तो 20 साल की इस खिलाड़ी ने इसी साल राज्य बदल कर पंजाब जाने का फैसला किया. प्रतियोगिता समाप्त हुई तो उनके हाथ में न केवल स्वर्णपदक था बल्कि उन्हें नेशनल कैंप में भी जगह मिल गई. रानी कहती हैं, ''वह मेडल मेरे लिए अब तक सबसे अहम है. उसके बगैर न मैं नेशनल कैंप में पहुंचती, न ट्रायल्स में हिस्सा ले पाती.'' उसने आगे जोड़ा, ''मैंने कई साल तक बिना किसी पुरस्कार के अपने खेल पर मेहनत की है. एक बार तो 2017 में मैंने इसे छोडऩे की बात सोची थी, लेकिन मेरे कोच साहेब सिंह नरवाल ने मेरा हौसला बढ़ाया और खुद पर भरोसा रखकर खेल में बने रहने को कहा.''
2010 में पिता भीम सेन की मृत्यु के बाद से कोच नरवाल ही मंजू के संरक्षक हैं. नरवाल के अपने बच्चे भी बॉक्सिंग में थे, सो उन्होंने रानी को भी उन्हीं के साथ प्रशिक्षण दिया. रानी कहती हैं, उन्होंने कभी मुझे पिता की कमी नहीं खलने दी.''
मंजू रानी का दूसरा बड़ा सहारा थीं हरियाणा स्थित उनके अपने गांव रिठाल में रह रही मां ईशवती देवी. पति की मृत्यु के बाद मिल रही 9,000 रु. की मामूली पेंशन के सहारे अपने पांच बच्चों का जीवन आगे बढ़ा रही मां ने 2012 में रानी से कहा कि वह बॉक्सिंग पर ध्यान दे. रानी बताती हैं, ''वे मुश्किल भरे दिन थे, फिर भी, मां ने मुझे कोई कमी नहीं महसूस होने दी.''
रानी ने खुद पर मां के भरोसे की भरपाई कर दी है. उन्होंने एक राष्ट्रीय प्रतियोगिता के दौरान मुख्य अतिथि के रूप में पहुंचीं अपनी आदर्श मैरी कॉम की गतिविधियों को ध्यान से देखना और समझना शुरू किया. चरणबद्ध प्रशिक्षण, नियोजित खानपान और जुझारू जोड़ीदार मुक्केबाजों के चलते रानी ने स्ट्रांजा मेमोरियल में रजत और उसके बाद इंडिया ओपन और थाईलैंड ओपन में कांस्य पदक हासिल किया.
रूस में रानी ने क्वार्टरफाइनल में सर्वोच्च वरीयता प्राप्त उत्तर कोरिया की किम ह्यांग-मि को हराया. रानी कहती हैं, ''उसे हरा कर मुझमें गजब का आत्मविश्वास आ गया. सेमी-फाइनल में मैं जानती थी कि मैं चूठामत रक्सत को हरा दूंगी जिससे मैं थाईलैंड ओपन में हार चुकी थी.''
फाइनल में वे रूसी खिलाड़ी एकातरीना पल्टसेवा से पिछड़ गईं लेकिन उन्होंने वह हासिल कर लिया है कि इस हफ्ते अपने जन्मदिन और दीवाली में मां के हाथ के आलू-परांठे खाने को मिल जाएं.
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