गिरिराज सिंह को जिताइएगा न? पक्का न? हाथ उठा के बताइए. तो माला पहना दें उनको?'' चुनावी सभा को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बेगूसराय लोकसभा सीट से भाजपा के उम्मीदवार की तरफ मुड़े और गेंदे की माला पहनाकर उनका स्वागत किया. यह नीतीश की मुहर का संकेत था जो गिरिराज के लिए बहुत जरूरी है. वे यहां राष्ट्रीय जनता दल के तनवीर हसन और भाकपा के कन्हैया कुमार के साथ त्रिकोणीय मुकाबले में फंसे हैं.
भाजपा को उम्मीद है कि नीतीश का प्रचार अभियान केंद्रीय सूक्ष्म, लघु व मझोले उपक्रम राज्यमंत्री को अत्यंत पिछड़े वर्गों (ईबीसी) और दलितों के वोट हासिल करने में मदद करेगा. जद (यू) सूत्रों का कहना है कि 30 फीसदी ईबीसी और 15 फीसदी महादलित पार्टी का मूल वोट बैंक हैं. इन दोनों तबकों में मिलाकर 150 से ज्यादा जातियां हैं जो बिहार के कुल मतदाताओं का 45 फीसदी हिस्सा हैं. कहा जाता है कि भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने नीतीश से गिरिराज के लिए प्रचार करने का अनुरोध किया था. इसीलिए मुख्यमंत्री 22 अप्रैल और फिर 27 अप्रैल को उनके प्रचार के लिए बेगूसराय पहुंचे थे.
गिरिराज के लिए प्रचार करने को नीतीश के लिए राजनैतिक मजबूरी के रूप में देखा जाता है जिसके लिए वे अपने बुनियादी मूल्यों से समझौता करते हैं. अपनी विचारधारा और तौर-तरीकों, दोनों में ही नीतीश व गिरिराज दो अलग-अलग ध्रुव हैं. नीतीश सामाजिक सदभाव और धर्मनिरपेक्षता की वकालत करते रहे हैं, वहीं गिरिराज अपने कट्टर हिंदुत्ववादी विचारों के लिए जाने जाते रहे हैं. दरअसल, उनके प्रचार में नीतीश के जाने के एक दिन बाद 23 अप्रैल को गिरिराज ने यह कहकर फिर से विवाद खड़ा कर दिया कि चुनाव आयोग को मुसलमान संगठनों के हरे झंडे के इस्तेमाल पर पाबंदी लगा देनी चाहिए.
जद (यू) के एक वरिष्ठ नेता का कहना था, ''मुख्यमंत्री ने अपनी तरफ से अतिरिक्त कदम बढ़ाए हैं. उन्होंने एनडीए की सौ से ज्यादा चुनावी सभाओं को संबोधित किया है, प्रधानमंत्री की सभी पांच रैलियों में शिरकत की है और नरेंद्र मोदी के नामांकन भरने के दौरान नीतीश वाराणसी में मौजूद रहे. भाजपा ने 17 लोकसभा सीटें उस पार्टी को दी हैं जिसके पास केवल दो सांसद थे. भाजपा ने नीतीश की इच्छा को जगह देने के लिए अपने पांच मौजूदा सांसदों के टिकट काट दिए और भागलपुर की पारंपरिक सीट भी छोड़ दी. जाहिर है कि मुख्यमंत्री को भी इस एहसान का बदला चुकाना ही था.''
हालांकि जद (यू) नेताओं के एक वर्ग को यह आशंका है कि यह पार्टी की धर्मनिरेपक्ष छवि के खिलाफ जा सकता है. भाजपा के साथ गठबंधन की एक त्रासदी यह रही है कि मतदान के चार चरण पूरे हो जाने के बाद भी जद (यू) का चुनावी घोषणापत्र अभी तक जारी नहीं हो पाया है. दरअसल, घोषणापत्र के मसौदे में समान आचार संहिता लागू करने और अनुच्छेद 370 को हटाए जाने के खिलाफ पार्टी का स्पष्ट रुख भी शामिल था, जो भाजपा के इन मुद्दों पर विचारों के उलट है. जद (यू) के एक नेता का कहना है, ''वोट हासिल करना धर्मनिरपेक्षता से ज्यादा जरूरी है.''
एनडीए के हिस्से के तौर पर बिहार में जद (यू) और भाजपा 17-17 सीटों पर चुनाव लड़ रही हैं जबकि राम विलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी छह सीटों पर चुनाव लड़ रही है. एक दशक के बाद जद (यू) भाजपा के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ रहा है. नीतीश कुमार के जुलाई 2017 में फिर से एनडीए में शामिल हो जाने के बाद इस गठबंधन की यह पहली चुनावी परीक्षा भी है.
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