अगर चीन के बेल्ट ऐंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआइ) के आलोचक—जिनमें भारत भी शामिल है और जो इससे जुड़े कई मसलों पर उंगली उठाता रहा है—उम्मीद कर रहे थे कि इस महत्वाकांक्षी योजना की बढ़ती चुनौतियों को देखकर चीन इस बारे में दोबारा सोचेगा, तो उन्हें निराशा हाथ लगेगी. 27 अप्रैल को बीजिंग में 37 विदेशी नेताओं की मौजूदगी में आयोजित दूसरी बेल्ट ऐंड रोड फोरम का मुख्य संदेश यही है कि चीन अपनी इस वैश्विक पहल से पीछे नहीं हटने वाला.
दुनिया भर में बीजिंग की बढ़ती मौजूदगी से चौकन्ने भारत और जापान से लेकर अमेरिका जैसे देशों के लिए अब चुनौती इसका कोई भरोसेमंद विकल्प खोजने की है. यह और भी जाहिर हो गया जब बीआरआइ को नई सज-धज के साथ पेश किया गया.
2017 में हुई पहली फोरम के उलट चीन ने नए सिरे से बटुआ खोलने का कोई वादा नहीं किया, हालांकि 64 अरब डॉलर के दोतरफा सौदों का ऐलान जरूर हुआ. जोर बीआरआइ को सलाह-मशविरे से आगे बढ़ाने पर था, जिसमें संख्या से ज्यादा अच्छी परियोजनाओं की अहमियत होगी, जो वित्तीय और पर्यावरण दोनों के लिहाज से टिकाऊ हों. हाल ही के चेकबुक लहराने वाले चीनी अंदाज से यह अलग था.
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग फोरम में बोले, ''धाराएं एक साथ आती हैं तो नदी बनती है.'' उन्होंने हरित और स्वच्छ परियोजनाओं पर जोर दिया, जिसमें 'भ्रष्टाचार मुक्त', ज्यादा पारदर्शिता और टिकाऊ वित्त व्यवस्था भी शामिल है. इसे हासिल करने के लिए फोरम ने नए सिरे से 'बेल्ट ऐंड रोड के विकास को पैसा जुटाने के लिए मार्गदर्शक सिद्धांतों' के साथ-साथ 'उधारी से निबटने के ढांचे' का ऐलान किया. साझा बयान में हाइ-टेक परियोजनाओं पर जोर भी गौरतलब था, जिसमें फाइबर ऑप्टिक हाइवे, ई-कॉमर्स और स्मार्ट सिटीज को बढ़ावा और 'एक डिजिटल रेशम मार्ग' का निर्माण शामिल है.
इस कायापलट का मकसद उन आलोचकों को खामोश करना भी है जिन्होंने अभी तक बीआरआइ के मिले-जुले किस्म के नतीजों पर उंगली उठाई है. मलेशिया से लेकर श्रीलंका और म्यांमार तक भ्रष्टाचार और लूट-खसोट जैसी शर्तों के आरोपों से घिरकर परियोजनाओं को रोकना या दोबारा मोलभाव करना पड़ा है. तो क्या यह कायापलट कारगर होगा?
आखिरकार बीआरआइ के पीछे एक वजह चीनी उद्योगों के लिए नए अवसरों की तलाश भी थी जो या तो बंद होने की तरफ बढ़ रहे थे या घरेलू मांग से ज्यादा उत्पादन कर रहे थे. इसी तरह बीआरआइ की वित्तीय शर्तों आदि का मकसद कभी आर्थिक मदद बांटना नहीं था. यह एक वाणिज्यिक उद्यम है जो चीनी वित्तीय संस्थाओं को अपना पैसा रखने के लिए नए ठिकाने तलाशने में मदद की गरज से लाया गया था. कर्जों के दम पर बुनियादी ढांचे का निर्माण बीआरआइ के डीएनए में है, जो कर्ज से संचालित वृद्धि के अपने ही मॉडल की नकल का नतीजा है, न कि उस लंबे-चौड़े 'कर्ज के जाल' का.
अहम 35 बीआरआइ गलियारों की पूरी फेहरिस्त का पैमाना, विस्तार और महत्वाकांक्षा वाकई असरदार है. ये गलियारे यूरोप, अफ्रीका, यूरेशिया, दक्षिण एशिया और दक्षिणपूर्व एशिया तक फैले हैं. अलबत्ता बांग्लादेश-चीन-भारत-म्यांमार (बीसीआइएम) गलियारा इस फेहरिस्त से गायब है, जो पहले बीआरआइ में शामिल था, मगर अब उसकी जगह लगता है दक्षिण एशिया के तीन गलियारों में से एक चीन-म्यांमार आर्थिक गलियारे ने ले ली है. दूसरे दो हैं—चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा, जो पीओके से गुजरता है और बीआरआइ पर भारत के विरोध की मुख्य वजह है, और नेपाल-चीन गलियारा, जिसमें सीमा-पार रेललाइन शामिल है. लब्बोलुबाब यह कि बेल्ट ऐंड रोड बाकायदे कायम है और रहेगी.
***

