राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा को मिली चुनावी हार ने उत्तराखंड में पार्टी कार्यकर्ताओं के पौने दो साल के इंतजार को आखिरकार एक मौके में बदल दिया. यह इंतजार था खाली पड़े विभिन्न निगमों, परिषदों और बोर्ड के पदाधिकारियों की नियुक्ति. इन तीनों राज्यों में भाजपा की हार के बाद मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत 2019 के लिए सचेत हुए. उन्हें कार्यकर्ताओं की नाराजगी को दूर करने का ख्याल सबसे पहले आया. विधानसभा चुनाव नतीजों के महज 11 दिन बाद यानी 22 दिसंबर को रावत ने 14 प्रमुख कार्यकर्ताओं को दायित्व बांट दिए.
मुख्यमंत्री यह मानकर चल रहे थे कि अपने इस कदम से वे यह संकेत देने में सफल होंगे कि वे कार्यकर्ताओं के हितों और अपेक्षाओं को लेकर गंभीर हैं, लेकिन यह दांव उन्हें उलटा पडऩे लगा. सूची जैसे ही बाहर आई, मुख्यमंत्री पर यह आरोप लगना शुरू हो गया कि उन्होंने सिर्फ अपने करीबियों को पद दिए हैं. बवाल इसलिए अधिक मचा क्योंकि इसमें किसी भी विधायक का नाम नहीं है.
अपने लिए कुर्सी का इंतजार कर रहे विधायकों को जब सूची में स्थान नहीं मिला तो उन्होंने इसके बाद के लिए दबाव बढ़ाना शुरू कर दिया कि राज्य सरकार में मंत्रियों के रिक्त दो पदों को तत्काल भरा जाए. मुख्यमंत्री के लिए इस पर फैसला करना आसान नहीं है. जानकार मानते हैं कि अगर मुख्यमंत्री अब एक-दो रिक्त पद भरेंगे तो जातिगत और क्षेत्रीय समीकरणों को साधना उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती बन सकती है.
दरअसल, अब तक सरकार में मुख्यमंत्री और विधानसभा अध्यक्ष के अलावा चार मंत्री गढ़वाल से हैं. कुमाऊं के हिस्से में सिर्फ चार मंत्री पद आए हैं. दोनों ही मंडलों में कई वरिष्ठ विधायक मंत्री की कतार में हैं, जिन्हें कद के मुताबिक तवज्जो नहीं मिली है. पांच बार के विधायक और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रहे बिशन सिंह चुफाल हों या आठवीं बार के विधायक हरवंश कपूर या फिर चार बार के विधायक मुन्ना सिंह चौहान, पूर्व कैबिनेट मंत्री बंशीधर भगत या पूर्व मंत्री बलवंत सिंह भौर्याल सभी मंत्री पद पाने की जोर-आजमाइश कर रहे हैं.
भाजपा के अंदरूनी सूत्र बताते हैं कि कुछ विधायकों को दायित्व देने पर विचार किया जा रहा है. सरकार ने जो दायित्व सूची फिलहाल निकाली है उसमें आंदोलनकारियों के सम्मान के लिए बनी आंदोलनकारी सम्मान परिषद के दायित्व शामिल न किए जाने से आंदोलनकारी इस सूची का विरोध करते नजर आ रहे हैं. मुख्यमंत्री बनने के बाद रावत ने अपने नजदीकी के.एस. पंवार को औद्योगिक सलाहकार और नवीन बलूनी को स्वास्थ्य सलाहकार बनाया जबकि दोनों भाजपा में अधिक सक्रिय नहीं माने जाते थे. इसके अलावा आइटी सलाहकार नरेंद्र सिंह भी मुख्यमंत्री ही की पसंद थे. मुख्यमंत्री ने पार्टी नेताओं के विरोध के बावजूद बाल संरक्षण आयोग के अध्यक्ष पद पर भी उषा नेगी को बैठा दिया था.
अब पहली खेप में जिन 14 लोगों को पद दिए गए हैं उनमें आंदोलनकारियों में से कोई नाम न होने से भी नाराजगी है. मनोनीत किए दायित्वधारियों में एक नाम मुस्लिम नेता शमीम आलम का है जबकि एक प्रवासी उत्तराखंडी दीप्ति रावत भी इस सूची में शामिल की गई हैं. दो पूर्व विधायकों का नाम इस सूची में शामिल है. इस सूची पर निगाह डालने से स्पष्ट है कि सरकार की कोशिश ऐसे कार्यकर्ताओं को तुष्ट करना है जिनको टिकट नहीं दिया जा सका और जिनका उपयोग आगामी लोकसभा चुनाव में किया जाना अहम है.
इस सूची में गढ़वाल और कुमाऊं मंडल विकास निगमों के अध्यक्षों की घोषणा भी विवाद का कारण बनी हुई है. एक तरफ सरकार दोनों निगमों के एकीकरण का ऐलान कर चुकी है तो दूसरी तरफ इनके अलग अलग अध्यक्ष बनाने से भी सवाल उठने लगे हैं. जातीय संतुलन के हिसाब से इस मनोनयन में ठाकुर समाज से पांच और ब्राह्मण समाज से तीन दायित्वधारी बने हैं. दो अल्पसंख्यक तो दो ही दलितों को कुर्सी दी गई है.
ठाकुरों में गजराज बिष्ट, ज्ञान सिंह नेगी, महावीर रंगड, दीप्ति रावत और शमशेर सिंह सत्याल शामिल हैं जबकि ब्राह्मणों में विजय बडथ्वाल, मोहन प्रसाद थपलियाल, और केदार जोशी शामिल हैं. केदार जोशी और दीप्ति रावत दोनों ही मुंबई और दिल्ली के प्रवासी उत्तराखंडी हैं. इस प्रकार प्रवासियों को भी प्रतिनिधित्व मिला है.
लेकिन मामले का पेच यह है कि पद और दायित्व देने की इस कला में शायद महारत दिखाने में रावत थोड़ा चूक गए हैं. इसी वजह से, पद हासिल करने में नाकाम रहे कार्यकर्ताओं में असंतोष बरकरार है. सत्ता के केक में जिन्हें हिस्सा मिला है, उनका तो ठीक है पर असंतुष्ट तबका भाजपा की लोकसभा की तैयारियों में पलीता लगा सकता है.
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