अगर डेटा नए दौर का तेल है तो हाल के दिनों में भारत में इस तेल का उपयोग पेट्रोल बम की तरह हुआ है. लोकप्रिय मैसेजिंग ऐप्लिकेशन व्हॉट्सऐप पर बच्चा-चुराने वालों को लेकर फैली अफवाहों पर यकीन करते हुए भीड़ लाठी-डंडों, ईंट-पत्थरों, सरिया से लैस होकर टूट पड़ी और देशभर में 30 से ज्यादा लोगों की जान ले ली.
मारे गए लोगों में समाज के हाशिए पर खड़े लोग, समाज का सबसे कमजोर तबका, प्रवासी मजदूर और भिखारी थे तो कुछ आम राहगीर भी जो रास्ता पूछने को रुके थे. दो घटनाओं के बीच आपको हजारों किलोमीटर का फासला देखने को मिल जाएगा, मगर भीड़ की प्रवृत्ति एक जैसी दिखेगी.
हर घटना में बाहरी लोगों पर शक किया गया और हमले हुए जिसमें कई लोगों की जान चली गई और कई दर्जन लोग तो मौत से बाल-बाल बचे. मध्ययुगीन दौर के आतताइयों जैसी बर्बरता दिखाने वाले लोग इस युग की आधुनिक तकनीक स्मार्टफोन से लैस हैं. इससे ज्यादा विरोधाभास और क्या हो सकता है.
व्हाट्सऐप का एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन संचार की गोपनीयता सुनिश्चित करने का शक्तिशाली उपकरण है. प्लेटफॉर्म का दावा है कि यह मैसेज को अपने पास सुरक्षित करके नहीं रखता. इसका सीधा मतलब है कि यहां व्हॉट्सऐप के उपयोगकर्ताओं के लिए वैसे प्रोफाइल की समस्या नहीं आ खड़ी होगी जैसा इसकी मूल कंपनी फेसबुक के साथ इस साल की शुरुआत में हुआ.
दुर्भाग्यवश इस प्लेटफॉर्म में मौजूद वीडियो के आसानी से शेयर करने की सुविधा, आपत्तिजनक सामग्री बनाने या शेयर करने वाले व्यक्ति की गोपनीयता जैसे फीचर उपद्रवियों के लिए वरदान साबित हो रहे हैं और वे सांप्रदायिक नफरत फैलाने के लिए इसका इस्तेमाल कर रहे हैं.
मंदसौर में बलात्कार की शिकार बच्ची के आरोपियों को रिहा करने की मांग करती पोस्ट में 'मुसलमानों' की विकृत तस्वीरें या फिर उत्तर प्रदेश में कैराना की नव-निर्वाचित सांसद के बयान के नाम से मनगढ़ंत बातों का प्रचार, ये सब इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं.
गुमनामी के इस गुण ने व्हॉट्सऐप को एक खतरनाक हथियार में बदल दिया है. एक ऐसा हथियार जिसे सेना की भाषा में सूचना युद्ध का हथियार कहा जा सकता है. जाहिर है इसका इस्तेमाल समाज में अराजकता फैलाने के लिए होगा. एग्जक्यूटिव एडिटर संदीप उन्नीथन ने ब्यूरो के इनपुट के साथ जो कवर स्टोरी तैयार की है, उसमें इन जटिल मुद्दों को रेखांकित किया गया है.
व्हॉट्सऐप इतनी आसानी से अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला नहीं झाड़ सकता. 20 करोड़ से ज्यादा भारतीय इसका इस्तेमाल कर रहे हैं और यह इसका सबसे बड़ा उपभोक्ता वर्ग है लेकिन अचंभे की बात है कि भारत में कंपनी का एक प्रतिनिधि तक नहीं है.
हिंसा की घटना को करीब एक महीना होने को है पर अफवाहों को रोकने से जुड़े उन सुरक्षा फीचरों की अभी प्रतीक्षा ही है जिसके बारे में व्हॉट्सऐप ने खुद कहा था कि वे लेकर आ रहे हैं.
हाल ही में लिस्बन में हुए ग्लोबल एडिटर्स नेटवर्क समिट में अफवाहों से मुकाबले के विषय पर बोलते हुए मैंने जो कहा था उसे ही दोहराना चाहूंगा कि फेसबुक और गूगल सरीखे टेक्नोलॉजी के क्षेत्र के बड़े खिलाड़ियों को भी गलत सूचनाओं को प्रसारित होने से रोकने के लिए बड़ी जिम्मेदारियां लेनी होंगी.
वे खुद को महज एक प्लेटफॉर्म मानते हैं. वे एक प्लेटफॉर्म मात्र नही हैं, वे प्रकाशक हैं. अगर मैं किसी अपमानजनक सामग्री को दोहराता हूं, तो मैं भी उतना ही जवाबदेह हूं जितना उस सामग्री को तैयार करने वाला व्यक्ति.
सरकार ने भी हाल में व्हॉट्सऐप को कड़ी फटकार लगाई है लेकिन क्या कोई राज्य कानून-व्यवस्था बनाए रखने के अपने दायित्व से छिटक सकता है जो कि कानून द्वारा स्थापित उनकी जिम्मेदारी है?
हिंसा की इन घटनाओं ने हमारी पुलिस व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी है, खासतौर से अर्धशहरी इलाकों में जहां भीड़ द्वारा हिंसा की सबसे ज्यादा घटनाएं हुई हैं. भारत दुनिया के उन देशों में है जहां जनसंख्या के अनुपात में सबसे कम पुलिसबल मौजूद है.
संयुक्त राष्ट्र कहता है कि एक लाख की आबादी पर पुलिस के कम से कम 220 जवान उपलब्ध होने चाहिए जबकि भारत में प्रति एक लाख आबादी पर मात्र 137 पुलिसकर्मी हैं. पाशविक प्रवृत्ति वाले लोग पुलिस की इसी कमी और भीड़ की आड़ में भारत में हत्याएं कर रहे हैं और कानून अब तक इस भीड़तंत्र की क्रूरता को एक अलग अपराध के रूप में देखने को राजी नहीं है.
एक साल पहले अपनी कवर स्टोरी में भी हमने इन मुद्दों को उठाया था (खून-खराबे का उन्मादी तांडव, 26 जुलाई 2017) जब तीन साल के भीतर भीड़ द्वारा हिंसा के कम से कम 50 मामले प्रकाश में आए थे, उनमें से ज्यादातर गोमांस और पशुओं के व्यापारियों के खिलाफ स्वयंभू पहरुओं ने अंजाम दिए थे.
यह कितनी निराशाजनक बात है कि एक साल बाद भी उस मुद्दे की पड़ताल की जरूरत जस की तस है.
हम, स्मार्टफोन के उपयोगकर्ता, भी इस परेशानी के हिस्से हैं. हमने कितनी बार किसी अपमानजनक सामग्री को बिना उसकी विश्वसनीयता की जांच-परख किए आगे भेज दिया होगा. हमने सोचा कि हमारी इस हरकत का क्या असर हो सकता है?
लोगों को खबरों के लिए भरोसेमंद ब्रांडों पर विश्वास करना शुरू होगा, उनके स्मार्टफोन में आ टपकने वाली किसी अप्रमाणित सूचना पर नहीं. याद रखें हर संदेश जो आपको मिलता है वह समाचार नहीं है और अगली बार कोई ऐसी जानकारी मिले जिस पर सहज विश्वास न होता है तो समझिए कि आपकी आशंका ठीक है. आइए, हम एक सुविधा को हथियार बनने से रोकें.
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