जब बात परदेस में मुसीबत में फंसे भारतीय नागरिकों की हो, तो विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को शायद ही कभी आलोचना का शिकार होना पड़ता है. फंसे हुए भारतीय नागरिकों के लिए वीजा के इंतजाम से लेकर, संकटग्रस्त क्षेत्रों से नाविकों को सुरक्षित निकाल लाने जैसे कारनामे, सुषमा स्वराज बस एक ट्वीट के जरिए मिली सूचना पर भी सक्रिय हो जाती हैं. परेशानहाल लोगों के प्रति किसी भी प्रकार की सहानुभूति नहीं दिखाने के लिए कुख्यात रही नौकरशाही को वे भारतीयों की सहायता के लिए तत्काल काम पर लगा देती हैं.
लेकिन 20 मार्च को जब उन्होंने संसद को इराक में लापता 39 मजदूरों की आतंकी संगठन आइएसआइएस के हाथों नृशंस हत्या के बारे में सूचना दी, तब सरकार की बड़ी किरकिरी हुई. इस घोषणा के साथ ही 39 लापता लोगों के परिवारों की करीब चार साल से अपने स्वजनों की तलाश के लिए चल रही भागदौड़ पर एक विराम लग गया. इनमें से 22 लोग पंजाब के विभिन्न जिलों अमृतसर, गुरुदासपुर, होशियारपुर, कपूरथला और जालंधर के थे. शेष पश्चिम बंगाल, बिहार और हिमाचल प्रदेश के बाशिंदे थे.
पीड़ित परिवारों के सदस्यों को जब अपने परिजनों के मारे जाने की सूचना टेलीविजन के जरिए मिली तो वे स्तब्ध रह गए. इस घोषणा के तुरंत बाद प्रतिक्रिया देते हुए मारे गए मजदूरों में से एक मनजिंदर सिंह की बहन गुरुपिंदर कौर ने कहा, ''मैं तो इंतजार कर रही हूं कि कब उनसे (स्वराज) मुलाकात हो. मैं उनसे जरूर पूछूंगी कि हमें अपने परिजनों के बारे में पहले से कोई सूचना क्यों नहीं दी गई. हमें तो संसद में उनके बयान से पता चला.''
सशस्त्र बलों का इस बात पर जोर रहता है कि किसी भी घटना में हताहत व्यक्ति का नाम मीडिया में जाने से पहले उस व्यक्ति के निकटतम परिजनों को इस बारे में सूचित किया जाना चाहिए. सरकार ने मारे गए 39 लोगों के संदर्भ में ठोस साक्ष्य की प्रतीक्षा करते हुए स्वराज द्वारा घोषणा से एक दिन पहले पूरी प्रक्रिया का पालन किया. मारे गए लोगों के बारे में संसद को सूचित करने के लिए स्वराज को दोषी नहीं ठहराया जा सकता. चूंकि संसद का सत्र चल रहा है, ऐसे में यदि स्वराज ने ऐसी महत्वपूर्ण जानकारी प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए दी होती, तो इसे संसद की अवमानना समझा जाता. तो फिर सरकार से आखिर चूक कहां हुई?
वरिष्ठ नौकरशाहों का कहना है कि सरकार पीड़ित परिवारों के साथ पिछले चार सालों से लगातार संपर्क में थी फिर भी उन्हें व्यक्तिगत रूप से सूचित नहीं किया गया. नाम न छापने की शर्त पर एक पूर्व राजनयिक कहते हैं, ''विदेश मंत्री ने पहले यह सूचना संसद को देकर उचित प्रक्रिया का पालन किया है लेकिन जिस समय वह संसद को सूचित कर रही थीं, उसी दौरान अगर पीड़ित परिवारों को भी संपर्क साधकर सूचित किया गया होता, तो बेहतर रहता.''
गृह मंत्रालय और विदेश मंत्रालय के बीच एक सामान्य समन्वय बनाकर एक अधिकारी को विभिन्न राज्यों के उन पीड़ित परिवारों के घर भेजकर, सूचना दी जा सकती थी. स्वराज के मंत्रालय ने लापता लोगों को खोज निकालने की दिशा में चार साल तक जितनी मशक्कत की है, उसके सामने यह तो बहुत छोटा-सा काम था. ईमानदारी से कहा जाए तो स्वराज की अगुआई में विदेश मंत्रालय ने लापता भारतीय मजदूरों को ढूंढ निकालने के लिए काफी मेहनत की.
इस खूनी खेल की शुरुआत मोदी सरकार के गठन के तुरंत बाद जून, 2014 में हुई थी जब आइएसआइएस ने इराक के तीसरे सबसे बड़े शहर मोसुल को जीत लिया. सुषमा स्वराज के विदेश मंत्रालय की कुर्सी संभालने के बाद सामने आ खड़ी हुई यह पहली चुनौती थी. इस मुद्दे को प्रधानमंत्री ने विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाया था. खुद स्वराज ने भी इसके लिए काफी प्रयत्न किए और जब इराकी सेना ने मोसुल को आइएसआइएस के कब्जे से मुक्त करा लिया, तो उन मजदूरों का पता लगाने के लिए उन्होंने अपने कनिष्ठ मंत्री जनरल (रि.) वी.के. सिंह को मोसुल भी भेजा था.
सरकार ने आइएसआइएस के कब्जे से बचकर भाग निकले चालीसवें मजदूर हरजीत मसीह के उस दावे को मानने से इनकार कर दिया था कि उसके साथ काम करने वाले दूसरे सारे मजदूर मारे जा चुके हैं. हरजीत की बात पर विश्वास करने की बजाए विदेश मंत्रालय दो देशों के प्रमुखों द्वारा दिए गए आश्वासनों पर तब तक यकीन करता रहा जब तक जनरल वी.के. सिंह पिछले जुलाई में मोसुल के बाहर स्थित निनेवेह प्रांत के एक गांव बदूश नहीं पहुंचे थे. उनके शव एक बड़े कब्रिस्तान से खोदकर निकाले गए थे.
यह पता चला कि मजदूरों की हत्या इस प्रकार की गई थी जैसे उन्हें मृत्युदंड दिया जा रहा हो. जून, 2014 में अपहरण के तुरंत बाद सभी के सिर में एक-एक गोली दागकर उन्हें मौत के घाट उतार दिया गया था. उनके डीएनए के नमूनों का भारत में बसे उनके रिश्तेदारों के डीएनए के नमूनों के साथ मिलान बगदाद के एक सरकारी संस्थान मार्टर्स फाउंडेशन ने किया.
फाउंडेशन ने जब मजदूरों के मारे जाने की पुष्टि कर दी, तब स्वराज ने संसद में बयान दिया. मृतकों के अवशेषों को अगले कुछ दिनों में भारत वापस लाया जाएगा. गमज़दा परिवारों के लिए दर्दभरे इंतजार की घडिय़ां अभी खत्म नहीं हुई हैं.

