राजौरी सेक्टर की भिंबर गली में 4 फरवरी को हुई पाकिस्तानी गोलाबारी में भारतीय सेना के एक कैप्टन और तीन जवानों की शहादत ने एक बार फिर नियंत्रण रेखा पर बिगड़ती स्थिति की तरफ ध्यान केंद्रित किया है. संघर्ष विराम उल्लंघन पिछले कुछ वर्षों में तेजी बढ़ा है खासकर 2017 के बाद से.
तथ्य खुद ही कहानी बयान करते हैं. 2003 में संघर्ष विराम लागू होने के समय से लेकर 2007 तक नियंत्रण रेखा पर उल्लंघन की 21 (सभी 2007 में) और अंतरराष्ट्रीय सीमा (आइबी) पर तीन घटनाएं हो चुकी थीं. उनमें सेना के तीन लोग मारे गए थे.
अगले पांच वर्षों में यानी 2008 से 2012 के बीच संघर्ष विराम उल्लंघन की घटनाओं में तेजी से वृद्धि हुई और उनकी संख्या 367 (एलओसी पर 293 और आइबी पर 74) तक पहुंच गई. इन वारदातों में चार नागरिकों (सभी 2012 में) की मौत हुई और सुरक्षा बलों (सेना और बीएसएफ) के 20 अफसर और जवान शहीद हुए.
उसके बाद के पांच वर्षों यानी 2013 से 2017 के बीच इन घटनाओं में बढ़ोतरी हुई और संख्या 2,764 (1,592 एलओसी, 1,172 आइबी) तक पहुंच गई. इनमें से 980 घटनाएं (एलओसी 860, आइबी 120) सिर्फ 2017 में हुईं. इन घटनाओं में 55 नागरिक और 61 सुरक्षाकर्मी (सेना और बीएसएफ) मारे गए. 2018 के मात्र 36 दिनों में एलओसी पर ऐसी 241 घटनाएं हो चुकी हैं जिनमें भारतीय सुरक्षा बलों के नौ जवानों को शहादत देनी पड़ी है.
2017 के बाद और अब 2018 में जारी संघर्ष विराम उल्लंघनों की घटनाओं में बढ़ोतरी के क्या मायने हैं. सितंबर, 2016 में सर्जिकल स्ट्राइक के बाद से पाकिस्तान ने इस तरह की हरकतों को बढ़ा दिया है. भारत ने सोचा था कि ऐसा करने से पाकिस्तान को सबक मिलेगा और वह सीमा-पार उल्लंघनों से बाज आएगा.
अपनी तरफ से कड़ा संदेश देने के बाद लगता है, भारत ने संयम बरतना शुरू कर दिया था, इस उम्मीद में कि पाकिस्तान के रवैए में भी बदलाव आएगा. लेकिन पाकिस्तान ने इस संयम को एक मौका समझते हुए उसका फायदा उठा लिया है. सर्जिकल स्ट्राइक से मिले घावों को सहलाने के बाद उसने फिर से अपनी हरकतें शुरू कर दीं, चाहे वह सीमा-पार घुसपैठ का मामला हो या संघर्ष विराम उल्लंघन का. 4 फरवरी को हुई उल्लंघन की घटना में पाकिस्तान का एक घरेलू कारक भी था.
यह घटना कश्मीर सॉलिडेरिटी डे के समय हुई थी. पाकिस्तान पिछले 28 वर्षों से 5 फरवरी को कश्मीर सॉलिडेरिटी डे मनाता आ रहा है. उस दिन पाकिस्तान में राष्ट्रीय अवकाश होता है, जिसका मकसद यह संदेश देना है कि पाकिस्तान कश्मीरियों को ‘‘नैतिक, राजनैतिक और कूटनीतिक’’ समर्थन देता रहेगा.
इस दिन भाषण दिए जाते हैं, जुलूस निकाले जाते हैं, मानव श्रृंखलाएं बनाई जाती हैं, नमाज पढ़ी जाती है, वगैरह-वगैरह. इसके अलावा इस दिन भारत को जमकर कोसा जाता है और तरह-तरह के उत्तेजक नारे लगाए जाते हैं जैसे ‘कश्मीर बनेगा पाकिस्तान’ ‘कश्मीर पाकिस्तान के गले की नस है, ‘‘कश्मीर-पाकिस्तान दो दिल लेकिन एक जान हैं.’’
बहरहाल पिछले एक दशक में जो बात ध्यान देने वाली है वह यह है कि यह दिन उतना उग्र और जोशीला नहीं दिखाई देता है जैसा वह 1990 के दशक में दिखाई देता था. पाकिस्तानी मीडिया में उद्धृत गैलप के जनमत सर्वेक्षण के मुताबिक, 1990 के बाद से ऐसे लोगों की संख्या में 19 प्रतिशत का इजाफा हुआ है जो मानते हैं कि कश्मीर कभी आजाद नहीं हो पाएगा, और ऐसे लोगों की संख्या में 14 प्रतिशत की गिरावट आई है जो मानते हैं कि कश्मीर एक या दो वर्षों में आजादी हासिल कर लेगा. इसकी वजह शायद लंबे समय से चली आ रही लड़ाई से होने वाली थकान या यह एहसास है कि यह असंभव काम है.
इस थकान का एक सबूत कश्मीर सॉलिडेरिटी डे पर पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा का वह बयान है, जिसमें उन्होंने कहा कि कश्मीर के लोग संयुक्त राष्ट्र के जनमत संग्रह के प्रस्तावों के प्रति अंतरराष्ट्रीय समुदाय की जागरूकता का इंतजार कर रहे हैं.
नवाज शरीफ ने इस अवसर का इस्तेमाल सुप्रीम कोर्ट की ओर से उन्हें बरखास्त किए जाने के फैसले पर अपनी नाराजगी जाहिर करने के लिए किया.
एक तरफ उत्साह में कमी और कश्मीर में भारतीय सेना की ओर से आतंकियों का लगातार सफाया होने से पाकिस्तानी सेना कश्मीर मुद्दे को जिंदा रखने के लिए दूसरे तरीके अपना रही है. पाकिस्तान एलओसी पर तनाव बढ़ा रहा है. एलओसी पर स्थिति बहुत खराब हो चुकी है और हिंसा व जवाबी हिंसा में इजाफा होता जा रहा है. अब यह देखना है कि क्या यह सिर्फ उल्लंघनों तक ही सीमित रहेगा या यह आगे विस्फोटक स्थिति भी पैदा कर सकता है.
तिलक देवाशर पाकिस्तान: कोर्टिंपग्स द एबिस के लेखक हैं और भारत सरकार के पूर्व विशेष सचिव रहे है
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