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लालू ने दिया बेफिक्री का संदेश, अभी उम्मीद बाकी

अदालती फैसलों के कारण लालू प्रसाद यादव को झटके जरूर लगे पर वे उनसे डरने वाले नहीं.

सोमनाथ सेन
सोमनाथ सेन
अपडेटेड 7 फ़रवरी , 2018

रांची में 25 जनवरी को सीबीआइ कोर्ट की ओर से चारा घोटाले के एक दूसरे मामले—एक महीने में दूसरी बार और अब तक तीसरी बार—लालू प्रसाद यादव को दोषी करार दिए जाने के कुछ देर बाद वे अदालत के बाहर थोड़ी चहलकदमी करते हुए चाय की एक दुकान के पास रुके और चाय मांगी.

उनके आसपास वकीलों और समर्थकों के अलावा भारी संख्या में मीडियाकर्मी जमा थे. लालू ने निर्लिप्त भाव से पार्टी के नेताओं से बात की और समर्थकों की तरफ देखकर हाथ हिलाया. जो लोग लालू को करीब से जानते हैं, उनका मानना है कि लालू ने दोषी करार दिए जाने के बाद भी जिस तरीके से बेफिक्र होकर चाय पी, वह समर्थकों को सीधा संदेश था कि सब कुछ ठीक है.

कुछ ही मिनट पहले लालू के वकीलों ने सजा में नरमी बरतने के लिए उनकी सेहत से जुड़ी समस्याओं जैसे ब्लड प्रेशर, मधुमेह और हृदय में बदले गए वॉल्व का हवाला दिया था. 69 वर्षीय लालू की सेहत संबंधी समस्याएं किसी से छुपी नहीं हैं. लेकिन लालू ने ऐसा करके यह दिखाया कि भले ही अदालती फैसलों के कारण उन्हें झटके लगे हों, लेकिन वे इससे डरने वाले नहीं हैं.

यह भी सही है कि लालू को अदालत से जब भी झटका लगा और वे जितनी बार जेल गए, हर बार राजनैतिक रूप से मजबूत होकर निकले हैं. लेकिन राजद के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, ''लालू जी को एहसास है कि यह सहानुभूति ज्यादा समय तक नहीं टिकती.''

मौजूदा संकट पहले से कहीं ज्यादा बड़ा है. पिछले एक महीने में चारा घोटाले में दो बार दोषी करार दिए जाने के बाद और चारा घोटाले से ही जुड़े दो अन्य मामलों में फैसले आने की संभावना से राजद प्रमुख के सामने गंभीर संकट है. हालांकि उनके बेटे तेजस्वी को उत्तराधिकारी माना जा रहा है. लेकिन तीन केंद्रीय एजेंसियां—सीबीआइ, आयकर विभाग और प्रवर्तन निदेशालय—उनके इर्दगिर्द भी फंदा कस रही हैं.

लालू-नीतीश के गठजोड़ के कारण 2015 में अति पिछड़ी जाति (ईबीसी), ओबीसी, दलित और मुस्लिम वोट एकजुट हो गए थे. लालू के पास यादव जाति का समर्थन अकेला सबसे बड़ा जनाधार है. मुस्लिम-यादव वोटों को मिला लें तो यह 30 प्रतिशत का मजबूत जनाधार होता है.

अति पिछड़ी जातियों का वोट भी 30 प्रतिशत है जिस पर नीतीश के जद(यू) की पकड़ है. राजद के एक विधायक कहते हैं, ''हमारा मुस्लिम-यादव वोट बैंक बहुत मजबूत है लेकिन इतना ही पर्याप्त नहीं है.''

राजद की समस्या यह है कि नीतीश के पास मजबूत भाजपा है, जबकि लालू के साथ बिहार में पिछलग्गू कांग्रेस है. राजद के नेताओं को लग रहा है कि लोकसभा चुनावों के साथ विधानसभा चुनाव कराए जाने के भाजपा के विचार का नीतीश ने जिस तरह से 'सैद्धांतिक समर्थन' किया है, उससे बिहार में समय से पहले ही चुनाव कराए जा सकते हैं.

लालू भी जानते हैं कि उन्हें अपने साथ कुछ और जातियों को जोडऩा होगा. पटना में राजद के एक नेता का कहना था, ''लालू जानते हैं कि उन्हें सत्ता में आने के लिए मात्र पांच से छह प्रतिशत वोटों की जरूरत है.'' दोषी साबित होने से पहले उन्होंने एनडीए के घटक दलों के बीच असहज संबंधों का फायदा उठाने की कोशिश शुरू कर दी थी.

पिछले लोकसभा चुनावों में एलजेपी और आरएलएसपी ने भाजपा से हाथ मिला लिया था. फिर एनडीए ने पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी की एचएएमएस को भी मिला लिया. लेकिन जुलाई 2017 में नीतीश के दोबारा एनडीए में लौटने के बाद गणित गड़बड़ा गया.

राजद की कोशिशों का कुछ असर होता भी नजर आने लगा है. केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा राजद प्रमुख के परिवार के लिए कई बार 'सहानुभूति' जाहिर कर चुके हैं. एचएएमएस के वरिष्ठ नेता ब्रिशन पटेल को रांची में लालू से मुलाकात करते हुए देखा गया. बहरहाल, वक्त ही बताएगा कि लालू अपनी कोशिशों में कितना सफल हो पाते हैं.

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