महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई के सरदार पटेल स्पोर्टस कॉम्पलेक्स के बाहर 23 जनवरी को खुशी का माहौल था, क्योंकि शिवसेना की राष्ट्रीय कार्यकारिणी ने ऐलान किया कि 2019 के लोकसभा और विधानसभा चुनाव वह अकेले लड़ेगी. हालांकि यह पार्टी सुप्रीमो उद्धव ठाकरे की नवंबर 2016 की घोषणा की पुनरावृत्ति है. पार्टी ने शिव सेना संस्थापक बाल ठाकरे की 90वीं वर्षगांठ पर भाजपा की धमकी के खेल को और बर्दाश्त न करने की बात कही थी.
विश्लेषकों का कहना है कि शिवसेना का संकल्प कृषि ऋण छूट के मुद्दे से ठीक से नहीं निबटने और हाल ही में पूरे महाराष्ट्र में दलितों के विरोध प्रदर्शन के मुद्दे पर देवेंद्र फडऩवीस सरकार के साथ बढ़ते मोहभंग का नतीजा है. जैसा कि शिवसेना के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, ''उद्धव अब फडऩवीस सरकार की विफलता को अपने कंधे पर ढोने के लिए तैयार नहीं.''
भाजपा के रुख को लेकर शिवसेना के ज्यादातर वरिष्ठ नेताओं का उद्धव पर दबाव बढ़ता जा रहा था. भाजपा के साथ चुनावी गठबंधन तोडऩे से संबंधित प्रस्ताव पेश करने वाले राज्यसभा सांसद संजय राउत कहते हैं, ''शिवसेना ने भाजपा के साथ हिंदुत्व के नाम पर गठजोड़ किया था और हमने बहुत धैर्य रखा. लेकिन पिछले तीन वर्षों में भाजपा ने हमें अपमानित करने के लिए सक्रिय रूप से अपनी शक्ति का इस्तेमाल किया.''
उद्धव ने शिवसेना की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में नए चेहरों को शामिल करने को भी मंजूरी दी. इसमें एकनाथ शिंदे और चंद्रकांत खैरे जैसे कुछ गैर-मुंबईकर भी शामिल हैं. साथ ही उद्धव के पुत्र आदित्य ठाकरे को भी राष्ट्रीय कार्यकारिणी में जगह दी गई है.
विश्लेषकों का कहना है कि सेना के फैसले से फडऩवीस सरकार के लिए तत्काल कोई खतरा नहीं है. फडऩवीस के लिए वैसे फैसले लेने में आसानी होगी, जिन्हें उन्होंने गठबंधन के कारण रोक रखा था. जैसे, पूर्व मुख्यमंत्री नारायण राणे को राज्य मंत्रिमंडल में शामिल करना. इस बीच उद्धव के शीघ्र सरकार से अलग होने की संभावना नहीं है. वे चुनाव से पहले के महीनों में पार्टी को फिर से संगठित करने में जुटेंगे.

