मनोहर पर्रीकर मार्च 2018 में बतौर मुख्यमंत्री एक साल पूरा करेंगे, पर वे पहले ही रास्ता भटकते नजर आ रहे हैं. अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर उनके कामकाज को लेकर पूरे गोवा में सवाल उठ रहे हैं. ऐसा उनके पहले के तीन कार्यकालों में नहीं हुआ था. लोग मानते हैं कि मुख्यमंत्री केंद्र और सहयोगी दलों के दबाव की कीमत चुका रहे हैं.
बात 11 दिसंबर की है. मुख्यमंत्री विधायकों को एक प्रजेंटेशन दे रहे थे. इसमें उन्होंने अपने श्रोताओं को यह भरोसा दिलाने की भरपूर कोशिश की कि गोवा की नदियों का राष्ट्रीयकरण करने और मोरमुगाव पोर्ट ट्रस्ट (एमपीटी) की कोयला वहन क्षमता बढ़ाने की केंद्र की योजना राज्य के हित में हैं. पर वे नाकाम रहे. स्थानीय लोग नदियों के राष्ट्रीयकरण और कोयला वहन क्षमता बढ़ाने संबंधी इन दोनों परियोजनाओं का तीखा विरोध कर रहे हैं, जबकि नितिन गडकरी इन पर खासा जोर दे रहे हैं. उधर एक्टिविस्ट बता रहे हैं कि केंद्रीय परिवहन मंत्रालय अपनी राष्ट्रीय जलमार्ग परियोजना के हिस्से के तौर पर जिस तरह चापोरा, साल, मापुसा, पोमबुरपा, मंडोवी और जुआरी नदियों के इस्तेमाल का मंसूबा बना रहा है, उससे इन नदियों पर राज्य का अधिकार खत्म हो जाएगा और आखिरकार इसका असर मछली पकडऩे पर पड़ेगा—जो गोवा का तीसरा सबसे बड़ा उद्यम है. उधर 60 ग्राम सभाओं ने पर्यावरण की चिंताओं का हवाला देते हुए ज्यादा कोयला ढोने का विरोध किया है.
जानकारों की राय में, खुद पर्रीकर भी मानते हैं कि ये दोनों प्रस्ताव गोवा के हितों के खिलाफ हैं. मगर इन भीतरी लोगों का कहना है कि मुख्यमंत्री गडकरी के एहसान तले दबे हैं, जिन्होंने पिछले साल विधानसभा चुनावों में भाजपा के स्पष्ट बहुमत हासिल करने में नाकाम रहने के बाद गोवा फॉरवर्ड पार्टी, महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी और तीन निर्दलीय विधायकों का समर्थन जुटाने में अहम भूमिका अदा करके पर्रीकर के फिर से मुख्यमंत्री बनने का रास्ता साफ किया था. जाहिर है, मुख्यमंत्री मजबूर हैं. उनसे संपर्क की इंडिया टुडे की कई कोशिशों के जवाब में तो वे ''मौजूद नहीं" थे, पर पणजी में पर्रीकर ने कहा, ''गोवा की छह नदियों को राष्ट्रीय जलमार्ग के तौर पर केंद्र से अधिसूचित करने का काम हो गया है. नदियों को जहाजरानी और नौवहन के लिए खोल दिया गया है. यह नदियों का राष्ट्रीयकरण नहीं है." पता चला है कि सरकार एमपीटी और अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण के साथ सहमति पत्रों पर दस्तखत की तैयारी में है.
गोएंचिआ रामपोन्नकरंचिआ इकवॉट्ट नाम के एक एनजीओ ने इस कदम को अदालत में चुनौती देने की धमकी दी है. इसके संयुक्त महासचिव ओलोंशिओ साइमंस कहते हैं कि स्थानीय मछुआरों की करीब 70 फीसदी मछलियां अंतर्देशीय जलमार्गों से आती हैं. मगर पर्रीकर का कहना है कि अगर गोवा सहमति पत्रों पर दस्तखत करने से इनकार कर देता है, तब भी केंद्र राष्ट्रीय जलमार्ग कानून को तो लागू करेगा ही. उन्होंने कार्यकर्ताओं से कहा, ''मुझसे चांद तोड़कर लाने की मांग मत कीजिए." वहीं, उन्होंने यह भी दलील दी कि राज्य के पास गाद से भरी अपनी नदियों की तलछट साफ करने के संसाधन नहीं हैं.
ताज्जुब की बात यह है कि गोवा के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने एमपीटी के खिलाफ आपराधिक शिकायत दर्ज कराई है, जिसमें मंजूर क्षमता से ज्यादा कोयला निकालने के लिए बंदरगाह के अफसरों पर कार्रवाई की मांग की गई है. हालांकि एमपीटी ने आरोपों से इनकार किया है. इन दोनों मुद्दों पर बवाल बढऩे का अंदेशा है, वहीं लौह अयस्क की खुदाई के मोर्चे पर भी दिक्कतें मुंहबाए खड़ी हैं. मौजूदा सीजन के पहले दो महीने में लौह अयस्क के निर्यात में 76 फीसदी की गिरावट आई है, फलस्वरूप सरकार के खनन राजस्व में 400 करोड़ रु. का पलीता लगने का अंदेशा है. यह तब है जब गोवा की बहुत छोटी-सी अर्थव्यवस्था 17,000 करोड़ रु. के कर्ज की वजह से पहले ही मुश्किल में है. यह कर्ज राज्य की जीडीपी के 20 फीसदी के बराबर है और खतरनाक ढंग से 23 फीसदी की ऊपरी सीमा के करीब पहुंच रहा है.
अब पर्रीकर के दोस्त भी उनका दामन छोड़ रहे हैं. गोवा फाउंडेशन के डायरेक्टर और पर्यावरणविद् क्लाउड अल्वारेस मुतमइन हैं कि पर्रीकर ''भाजपा के चुनाव अभियान में पैसा लगाने वाली खनन कंपनियों के बाहरी दबावों में काम कर रहे हैं." अल्वारेस कहते हैं, ''मैं तो उन पर (पर्रीकर) से भरोसा खो चुका हूं."
नशीले पदार्थों की खेपों की बढ़ती बरामदगी पर्रीकर के लिए एक और शर्मिंदगी वाला मुद्दा है. गृह महकमे को तब खासा नीचा देखना पड़ा जब उन्हें राज्य के नंबर 2 आइपीएस अफसर बिमल कुमार गुप्ता को घूसखोरी के आरोपों के बाद हटाना पड़ा.
सियासी मोर्चे पर भी पर्रीकर को गठबंधन के साझीदार दलों को संतुष्ट करने की मुश्किल से जूझना पड़ रहा है. उन्हें गोवा फॉरवर्ड पार्टी के दागी नेता एंटानैसिओ मॉन्सेराट को नवगठित ग्रेटर पणजी विकास प्राधिकारण का अध्यक्ष बनाना पड़ा था. उसी तरह उन्हें महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी को भी लोक निर्माण महकमा मनमर्जी से चलाने की छूट देनी पड़ी है.
फिलहाल भाजपा में कोई भी मुख्यमंत्री के ''संदिग्ध" फैसलों पर सवाल नहीं उठा रहा है. लिहाजा मनोहर पर्रीकर अपनी अल्पमत सरकार को जमाने में भले कामयाब हो गए हों, पर विश्लेषकों का कहना है कि इस सबसे उनकी निजी छवि को जरूर धक्का पहुंच रहा है.

