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जम्मू-कश्मीरः यहां भी नहीं शरण?

राज्य भाजपा अब चाहती है कि रोहिंग्या शरणार्थियों को यहां से बाहर किया जाए, उसे पार्टी और केंद्र सरकार की शह हासिल

बारक्राॉपट मीडिया/गेट्टी इमेजेज
बारक्राॉपट मीडिया/गेट्टी इमेजेज
अपडेटेड 20 दिसंबर , 2017

अभी 8 दिसंबर को केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि पांच पूर्वोत्तर राज्यों में 'जम्मू-कश्मीर जैसी सीमा सुरक्षा ग्रिड' बननी चाहिए, ताकि रोहिंग्या शरणार्थियों को बांग्लादेश से भारत में आने से रोका जा सके. इसके लगभग फौरन बाद जम्मू-कश्मीर के उप-मुख्यमंत्री निर्मल सिंह ने कहा कि रोहिंग्या मुसलमान राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा हैं और उन्हें हटाया जाना चाहिए.

दिल्ली से संकेत मिले बिना शायद ही कभी कुछ बोलने वाले निर्मल सिंह राज्य में अवैध प्रवासियों की समस्या पर सुझाव देने के लिए बने चार मंत्रियों के समूह के मुखिया हैं. उनका मानना है कि म्यांमार के ये शरणार्थी देश के लिए खतरा हैं, जो कुछ साल पहले जम्मू के आसपास बस गए हैं. वे यह भी कहते हैं कि जम्मू-कश्मीर में सक्रिय ''आतंकी संगठन उनका इस्तेमाल कर सकते हैं.''

भारत में आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, 40,000 रोहिंग्या शरणार्थी रहते हैं, जिनमें करीब 7,000 जम्मू, सांबा और आसपास के अन्य इलाकों में बनी झुग्गी बस्तियों में रहते हैं. राज्य में 2015 में पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) के साथ गठबंधन सरकार बनने के बाद स्थानीय भाजपा नेताओं ने इस बारे में आवाज उठानी शुरू की. उनका दावा है कि ''2010 में रोहिंग्या के राज्य में आने का क्रम शुरू होने के बाद से अब तक उनकी जनसंख्या कई गुना बढ़ चुकी है.''

हालांकि, उप मुख्यमंत्री इसके बारे में कोई जानकारी देने से इनकार करते हैं कि रोहिंग्या शरणार्थियों को वापस लौटाने की क्या योजना है. उन्होंने कहा कि वे 'राज्य के व्यापक सुरक्षा हितों और सांप्रदायिक सौहार्द बनाए रखने के लिए जो भी कुछ संभव होगा' करने को तैयार हैं. निर्मल सिंह ने कहा कि केंद्र सरकार का रोहिंग्या मसले पर रुख स्पष्ट है. असल में, पश्चिम बंगाल, असम, मिजोरम, मेघालय और त्रिपुरा के मुख्यमंत्रियों से एक 'सीमा सुरक्षा ग्रिड्य और एकीकृत कमांड ढांचा तैयार करने के आह्वान के चार दिन पहले ही राजनाथ सिंह ने जम्मू-कश्मीर सरकार से इस बारे में एक रिपोर्ट मांगी कि रोहिंग्या अब आगे राज्य में न आ सकें, इसके लिए क्या कदम उठाए गए हैं.

ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायोग (यूएनएचसीआर) के प्रतिनिधियों के दिसंबर में जम्मू के आसपास की रोहिंग्या बस्तियों के दौरे के बाद इस बारे में कोई कदम उठाया जाएगा.

रोहिंग्या बस्ती में रहने वाले लोगों का कहना है कि यूएनएचसीआर प्रतिनिधियों ने किसी दूसरे राज्य में उनके पुनर्वास में मदद करने का प्रस्ताव रखा है, क्योंकि अब ''जम्मू उनके लिए सुरक्षित'' नहीं रहा. लेकिन म्यांमार से आकर जम्मू में अब कुछ छोटे-मोटे काम पा चुके और कुछ स्थायित्व हासिल कर चुके ये परेशान शरणार्थी अब कहीं और नहीं जाना चाहते. वे उन 50 परिवारों के खराब अनुभवों से भी हतोत्साहित हुए हैं, जिन्हें एक महीने पहले यूनएनएचसीआर की निगरानी में हैदराबाद भेजा गया था.

ऐसे में जब भाजपा के निर्मल सिंह जैसे मंत्री जम्मू में रोहिंग्या शरणार्थियों की मौजूदगी के खिलाफ मुखर हैं, गठबंधन सरकार की बड़ी साथी पीडीपी स्पष्ट तौर से चुप्पी साधे हुए है. मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने इस बारे में एक शब्द भी नहीं बोला है.

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