मौका था उप- मुख्यमंत्री नितिन पटेल के नेतृत्व में 1 अक्तूबर को गुजरात गौरव यात्रा के शुभारंभ का, जो अहमदाबाद से 70 किलोमीटर दूर सरदार वल्लभभाई पटेल के जन्मस्थान करमसाड से शुरू की गई. कुछ दिनों पहले राहुल गांधी ने अपनी गुजरात यात्रा के दौरान भाजपा के विकास के दावों पर सवाल उठाते हुए और यह कहकर मजाक उड़ाते हुए कि (गुजरात में भाजपा के राज में) ''विकास गांडो थायो छे" (विकास पागल हो गया है), जो चुनौती पेश की थी, इस यात्रा को उसका मुंहतोड़ जवाब बताया गया था.
भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने यात्रा को झंडी दिखाते हुए प्रभावी भाषण दिया और दोहराया कि भाजपा इस साल दिसंबर में होने वाले चुनावों में 150 सीटें जीतेगी. शाह ने 1995 तक कांग्रेस के राज के दौरान और पिछले दो दशकों में भाजपा के शासन में राज्य के विकास के आंकड़ों को पेश किया. भाजपा का रिकॉर्ड कई गुना बेहतर नजर आता है, जैसे प्रति व्यक्ति आय, जो 1995 में प्रति वर्ष 13,000 रु. थी, बढ़कर 2016 में 1.41 लाख रु. तक पहुंच गई है (हालांकि इसे इस संदर्भ में जरूर लिया जाना चाहिए कि इसी अवधि में देश की अर्थव्यवस्था भी तेजी से बढ़ी है).
और इसके बावजूद भाजपा के भारी बहुमत से जीतने या यहां तक कि एक सुविधाजनक जीत हासिल करने के दावे के बारे में एक संदेह बना हुआ है. उसी सभा में, भीड़ में उपस्थित रहे कुछ पटेल युवकों ने भाजपा विरोधी नारे लगाए थे. पटेल आरक्षण समर्थक नेता हार्दिक पटेल के समर्थकों को तुरत-फुरत वहां से दूर ले जाया गया.
जाहिर तौर पर कोई भी नहीं मानता है कि भाजपा आगामी चुनावों में हार जाएगी, लेकिन एक महीने पहले आंधी की गति से उडऩे वाली विजयी हवाएं धीमी हो गई हैं. सूरत, राजकोट और जामनगर जैसे औद्योगिक क्षेत्रों में कारोबार को बुरी तरह से प्रभावित कर रही जीएसटी जैसी एक अस्थायी बाधा भी राज्य भाजपा कार्यकर्ताओं को अपना नया नारा ''आ वखत 150" (इस बार 150 सीटें) पूरी ताकत लगाने से रोक रही है. पार्टी ने यह नारा उत्तर प्रदेश में भाजपा की 325 सीटों पर जीत के बाद जल्द ही गढ़ा था और इसे अगस्त के अंत तक खुशी-खुशी लगाया भी था.
जहां भाजपा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गृह राज्य को बरकरार रखने के लिए युद्ध स्तर की तैयारी कर रही है, वहीं हार्दिक के लगातार हल्ला मचाने के कारण भी कार्यकर्ताओं में शांति है. पटेल युवाओं का एक वर्ग उनके साथ है; यह एक ऐसा समुदाय है जो गुजरात में भाजपा का स्तंभ रहा है.
हार्दिक ने अपने समर्थकों के लिए कई सारी सीटों का कांग्रेस पार्टी के साथ कथित तौर पर एक समझौता कर लिया है. अपने स्तर पर राज्य सरकार ने राज्य की 51 प्रतिशत ऊंची जातियों के लिए आर्थिक और सामाजिक लाभों का पता लगाने का वादा किया है (जिनमें से अधिकांश पटेल हैं).
सरकार ने 2015 में आरक्षण आंदोलन के दौरान पटेल युवाओं पर कथित पुलिस अत्याचारों की जिम्मेदारी तय करने के लिए एक आयोग के गठन का भी वादा किया था. गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी का कहना है कि हार्दिक अपना समर्थन खो चुके हैं. मुख्यमंत्री कहते हैं, ''उन्होंने कांग्रेस तक पहुंचकर अपनी राजनैतिक महत्वाकांक्षा स्पष्ट कर दी है, इसलिए पटेल अधिकारों के लिए आंदोलन करने वाले के रूप में उनकी स्थिति खत्म हो गई है. उनके पास कोई जमीन नहीं बची है." रूपाणी ने यह कहकर चुनौती भी पेश की कि ''हार्दिक चाहें तो खुद चुनाव लड़कर देख लें."
इस बीच विपक्षी कांग्रेस पार्टी में हालात बेहतर बनते नजर आ रहे हैं. हाल ही के समय तक गुटों में विभाजित पार्टी, जो राज्य में अपनी राजनैतिक पहचान बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रही थी, उस कांग्रेस ने लोगों को कुछ आकर्षित करना शुरू कर दिया है, जैसा कि पिछले हफ्ते राहुल गांधी की गुजरात यात्रा को मिली प्रतिक्रिया में दिखाई दिया है. वास्तव में, राज्य इकाई के प्रमुख शंकरसिंह वाघेला के पार्टी छोड़कर जाने से—जिन्होंने अहमद पटेल के राज्यसभा चुनाव में क्रॉस वोटिंग की थी—अजीब ढंग से पार्टी एकजुट हो गई है. हालांकि राहुल ने अपनी गुजरात नवसर्जन यात्रा के दौरान सार्वजनिक सभाओं में कोई बहुत भारी प्रदर्शन नहीं किया था, लेकिन उन्हें अधिकांश राजनैतिक पंडितों की राय में बेहतर प्रतिक्रिया मिली थी.
अब जब दोनों पार्टियां अंतिम प्रहार के लिए तैयार हो रही हैं, तो गुजरात सबसे दिलचस्प चुनावी परिदृश्य प्रस्तुत कर रहा है. प्रधानमंत्री मोदी के लिए, यह एक महत्वपूर्ण लड़ाई है जिसका असर 2019 के लोकसभा चुनावों में दूसरे कार्यकाल के लिए उनके दावे पर पड़ेगा. उन्हें गुजरात सिर्फ जीतना नहीं है, बल्कि इसे अच्छे अंतर से जीतना है.
कांग्रेस के लिए, यह मोदी और शाह का खेल बिगाड़ देने का एक अवसर है. और इसलिए दोनों पार्टियां इस पश्चिमी राज्य में ऐसी लड़ाई की तैयारी कर रही हैं, जो पहले कभी भी नहीं लड़ी गई. हालांकि अभी भी बहुत कुछ जातिगत समीकरणों पर निर्भर करेगा. उदाहरण के लिए, कांग्रेस के साथ हार्दिक की सांठगांठ ओबीसी क्षत्रिय जैसी जातियों को—जिन्होंने पटेलों को आरक्षण का लाभ मिलने के खिलाफ अपनी ओर से विरोध किया था—भाजपा के खेमे की ओर कर सकती हैं. इसके अलावा, प्रश्न यह भी है कि हार्दिक पटेलों के कितने वोटों का रुख मोड़ सकते हैं.
भगवा चादर
भगवा पार्टी का मानना है कि विकास पर बहस छेड़कर राहुल गांधी उनके हाथों में खेल गए हैं. पार्टी प्रवक्ता भरत पंड्या कहते हैं, ''अगर सुशासन मुद्दा हो, तो कोई भी ऐसा मानदंड नहीं है, जिसमें भाजपा कांग्रेस पर भारी न पड़ती हो. यह बहस ठीक हमारे ही रास्ते पर है." ''विकास गांडो थायो छे" के कांग्रेस के नारे के खिलाफ, भाजपा ने अपना नारा गढ़ा है— ''हुन छुन विकास, हुन छु गुजरात" (मैं विकास हूं, मैं गुजरात हूं). पार्टी ने कम से कम 100 सरकारी मापदंडों की सूची भी तैयार कर ली है, जो कांग्रेस के समय के दौरान हुई प्रगति की भाजपा के शासन के दौरान हुई प्रगति से तुलना करती हैं. बूथ प्रबंधन पक्ष में भी प्रमुख रणनीतिकार अमित शाह ने पार्टी को चुस्त कर दिया है. कोई 50,000 बूथों की देखभाल के लिए करीब 50,000 कार्यकर्ताओं को तैनात किया गया है. इसके अलावा, बूथ स्तर पर पार्टी के 500 विस्तारक हैं.
टिकटों के चयन के बारे में पार्टी की फीडबैक प्रक्रिया 24 सितंबर तक पूरी हो गई थी. इस प्रक्रिया के दौरान पार्टी को उद्योगों पर जीएसटी के नकारात्मक प्रभाव और नौकरियों की स्थिति का एहसास हुआ. राज्य सरकार तुरंत केंद्र के संपर्क में आई और अधिकांश जिलों में छोटे व्यवसायियों की केंद्र और राज्य के कर अधिकारियों के साथ बैठक आयोजित कराई गई. मुख्यमंत्री रूपाणी कहते हैं, ''यहां तक कि जिला कलेक्टरों ने भी बैठकों में भाग लिया, ताकि वे छोटे व्यवसायियों की समस्याओं को समझ सकें और उनके भय दूर कर सकें." हालांकि, जैसा कि पार्टी के एक नेता कहते हैं, ''बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि जीएसटी परिषद आने वाले दिनों में क्या करती है." भाजपा के खेमे में घबराहट स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही है.
नई सावधानी सबसे अच्छी तरह इस बात में झलक रही है कि भाजपा ने गुजरात के चुनावों में केंद्रीय मंत्रियों निर्मला सीतारमण और नरेंद्र सिंह तोमर को क्षेत्रीय प्रभारियों के रूप में नियुक्त किया है. ये दोनों केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली के मातहत काम करेंगे. भूपेंद्र यादव राज्य के नए प्रभारी महासचिव हैं.
डटा हुआ हाथ
अंदरूनी कलह अब अतीत की बात हो चुकी है, और कांग्रेस पार्टी में कुछ जान आई है. वास्तव में कांग्रेस आज जो उछल रही है, वह अधिकांशतः जीएसटी, कीमतों में वृद्धि और नौकरी के संकट जैसे मुद्दों पर भाजपा से असंतोष के कारण है. राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, जिन्हें इस साल की शुरुआत में गुजरात का प्रभार सौंपा गया था, वह भी अपना सारा अनुभव इस्तेमाल कर रहे हैं. कांग्रेस जहां बैकफुट पर है, वह मुख्यमंत्री रूपाणी के खिलाफ पेश करने के लिए एक व्यावहारिक चेहरा पेश करने का मामला है. वाघेला के पार्टी छोड़ जाने के बाद, पार्टी के पास केवल एक विकल्प पार्टी के राज्य प्रमुख भरतसिंह सोलंकी बचते हैं, जो पूर्व मुख्यमंत्री माधवसिंह सोलंकी के पुत्र हैं. किसी जमाने में अपनी संघर्ष की भावना के लिए जाने जाने वाले सोलंकी समय के साथ नरम हो चुके हैं. उनके अलावा शक्ति सिंह गोहिल हैं जिनमें वह करिश्मा नहीं है. फिर भी नई एकजुटता से कांग्रेस उफान पर दिखती है. उसे हार्दिक पटेल के समर्थकों के अलावा दलितों की नाराजगी का लाभ मिलने की भी उम्मीद है. हाल में दलित भावनाएं भी आहत बताई जाती हैं.
इस बीच, प्रतिद्वंद्वी भाजपा की देखादेखी, कांग्रेस भी पहली बार बूथ प्रबंधन पर ध्यान केंद्रित कर रही है. अपनी गुजरात यात्रा के दौरान राहुल ने स्थानीय नेताओं के साथ कई बैठकें आयोजित कीं, जिनमें उनके सचिव नोट्स ले रहे थे. गहलोत का कहना है कि वे ''कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं. लोग गुजरात में बदलाव की इच्छा रखते हैं." कांग्रेस ने पिछले 15 वर्षों में हर चुनाव से पहले यही सब कहा है, और फिर वह चुनावी मैदान में हार गई है. इस बार भी, यह पार्टी के लिए एक कठिन लड़ाई नजर आ रही है.

