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करिश्माई कारोबारी: कलपुर्जों के बूते किया कमाल

आजादी के दौर में पंजाब के छोटे-से कस्बे से शुरुआत करने वाली कंपनी आज ऑटो पार्ट्स की दुनिया में जाना-माना नाम है

अपडेटेड 14 दिसंबर , 2015
गुरसरण सिंह 80 वर्ष  एमडी, जीएनए ग्रुप

पंजाब के छोटे-से कस्बे गोराया से सफर शुरू करने वाला व्यक्ति अपनी मेहनत के बल पर ऑटोमोबाइल क्षेत्र की दुनियाभर की बड़ी कंपनियों की जरूरत बन जाएगा, यह शायद ही किसी ने सोचा होगा. इस कस्बे के रहने वाले गुरसरण सिंह ने होशियारपुर के गांव मेहतियाना स्थित अपनी जी.एन.ए. एक्सेल्स लिमिटेड कंपनी को आज उस मुकाम पर पहुंचा दिया है जहां अशोक लीलैंड, महिंद्रा, जेसीबी, एस्कॉट्र्स, कैटरपिलर, करारो और एक्लटेक इंटरनेशनल जैसी देश और विदेश की अनेक जानी-मानी कंपनियां उनके बनाए ऑटो पाट्र्स पर भरोसा करती हैं. उनकी कंपनी जीएनए ग्रुप ट्रक, ट्रैक्टर जैसी कृषि मशीनरियों समेत विभिन्न गाडिय़ों के लिए कल पुर्जे बनाती है.

गुरसरण के पिता अमर सिंह ने जीएनए एक्सेल्स के नाम से 1947 में फगवाड़ा से करीब 22 किमी दूर जालंधर के गांव बुंडाला में कंपनी की स्थापना की थी. आज जीएनए समूह का सालाना टर्नओवर करीब 700 करोड़ रु. है. इसके अलावा, समूह की गांव मेहतां और श्री हरगोबिंदगढ़ में जीएनएआइआइटी यूनिवर्सिटी भी है जिसमें लगभग 2,500 छात्र पढ़ते हैं.

गुरसरण सिंह अपने प्रोफेशनलिज्म और सादगी के लिए प्रसिद्ध हैं, जो करीब 80 वर्ष की आयु में फैक्ट्री का कामकाज उसी जोश के साथ संभाल रहे हैं. वे तुलसी ग्रीन टी पीने के शौकीन हैं जो उनके लिए खास तौर से लंदन से मंगवाई जाती है. उन्हें पाकिस्तान का जोशांदा भी खासा पसंद है. गाडिय़ों में उनकी पसंद मर्सिडीज एस है.

गुरसरण बताते हैं कि उन्होंने प्राथमिक शिक्षा बुंडाला के हाइस्कूल से हासिल की थी, जहां उनके साथ आर.एस. तलवाड़ भी पढ़ा करते थे, जो बाद में स्वतंत्र भारत के पंजाब के चीफ सेक्रेटरी बने. गुरसरण के बेटे रणबीर उनके साथ जीएनए एक्सेल्स, जीएनए ड्यूरापाट्र्स और जीएनए उद्योग में हाथ बंटाते हैं तो दूसरे बेटे गुरदीप जीएनएआइआइटी यूनिवर्सिटी को संभालते हैं.

ऑटोपाट्र्स बनाने वाले व्यक्ति का शिक्षा के क्षेत्र में कैसे आना हुआ? इस सवाल पर गुरसरण बताते हैं कि यूनिवर्सिटी बनाना उनके पिता का सपना था. वे कहते हैं, ''यूनिवर्सिटी बनाने का उद्देश्य पैसा कमाना नहीं बल्कि समाज में शिक्षा का प्रसार करके युवाओं को तरन्न्की के अवसर प्रदान करना है.'' अपने पिता के सपने को पूरा करने के लिए उन्होंने 12 साल पहले जिस शिक्षण संस्थान की स्थापना की थी, उसे डेढ़ साल पहले यूनिवर्सिटी की मान्यता मिल गई. यहां आइटी, कंप्यूटर साइंस, बीकॉम, एमकॉम, बीसीए, एमसीए जैसे कई पाठ्यक्रम हैं.

क्वालिटी के साथ कभी समझौता नहीं करने के लिए प्रतिबद्ध जीएनए समूह की खासियत यह है कि यहां बनने वाले सभी उत्पादों का सारा कच्चा माल भारत से ही मंगवाया जाता है. लेकिन अपने यहां बनने वाले 50 फीसदी उत्पादों की सप्लाइ वे विदेश में करते हैं.

अपने काम को अपनी आराधना मानने वाले गुरसरण बताते हैं कि मेहनत और उत्पादों की गुणवत्ता ने उन्हें मार्केट में अलग पहचान दी है. इसके अलावा, उन्हें पेपर पढऩा, कंप्यूटर पर काम करना और विशेष तौर पर स्वास्थ्य से जुड़ी किताबों को पढऩे का शौक है. पढऩे के शौकीन गुरसरण सिंह ने खुद भी दो किताबें लिख डाली हैं. इनमें से एक का नाम है हेल्थ इज वेल्थः प्रिजर्व इट, जो उन्होंने पिछले साल लिखी है. सकारात्मकता उनके व्यक्तित्व की खासियत है. टीवी पर भी वे उन्हीं फिल्मों को देखना पसंद करते हैं जो सकारात्मक संदेश देती हों, मोटिवेशन पर आधारित हों और अच्छा मैसेज देती हों. उन्हें बागबानी का भी बहुत शौक है खासकर अपने यहां सब्जियां उगाने का. वे कुकिंग करना भी पसंद करते हैं.

गुरसरण घूमने के भी शौकीन हैं और दुनिया का शायद ही कोई ऐसा देश बचा हो जहां वे न गए हों. उनका कारोबार उन्हें अपने इस शौक को पूरा करने में भरपूर मदद देता है. शुरुआत में उन्होंने पश्चिम एशिया से ही विदेश में निर्यात शुरू किया था. उनका मानना है कि ग्राहक संतुष्टि हो तो बिजनेस अपने आप बढ़ता है. इसी कारण, उनका सफलता का मंत्र ईमानदारी और वचनबद्धता है. 

वे मानते हैं कि ग्राहक से किए वादे को हर हालत में पूरा करना चाहिए. वे याद करते हैं कि जब उन्होंने शुरुआत की थी तब बाजार में जनरल मोटर्स जैसी बड़ी कंपनियों का दबदबा हुआ करता था और डीलर स्थानीय कंपनी को मौका तक नहीं देना चाहता था. लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी. वे यादों में खोते हुए बताते हैं, ''हीरो ग्रुप के संस्थापकों में रहे बृजमोहन मुंजाल, जिनका हाल ही इंतकाल हुआ है, 1960 के दशक में अक्सर मेरे साथ विदेशी दौरों पर जाया करते थे.'' उनमें कभी भी व्यापारिक टकराव नहीं रहा क्योंकि दोनों के बिजनेस अलग-अलग थे. उनके लुधियाना से संबंधित औद्योगिक घराने भोगल समूह के साथ भी अच्छे संबंध रहे हैं.

वे मानते हैं कि अगर कंपनी के उत्पाद अच्छे हों तो उसको अपने प्रचार की जरूरत नहीं होती. उन्होंने भी अपनी कंपनी के उत्पादों के प्रमोशन को लेकर कोई विशेष मुहिम नहीं चलाई, बल्कि उनके उत्पादों को ग्राहकों ने ही आगे प्रमोट करने में अहम भूमिका निभाई. वे बताते हैं, ''हमारा माल अशोक लीलैंड को जाता था. वे हमारे उत्पादों से खुश थे इसलिए उन्होंने टेल्को को हमारी सिफारिश की. टेल्को ने महिंद्रा को हमारे बारे में बताया और यह क्रम आज भी जारी है.''

गुरसरण जोर देते हुए कहते हैं कि उद्योगों को तकनीक और मांग के अनुरूप काम करना चाहिए. वे बताते हैं कि एक वक्त था जब उन्हें यह भी समझ नहीं आता था कि ग्राहकों को माल के सैंपल कैसे दिखाए जाएं, आज वे इसके लिए कैमरों, लैपटॉप और मोबाइल का इस्तेमाल करते हैं.
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