अगर लोक सेवक के नाते अधीनस्थ या नियंत्रित संपत्ति को बेईमानी या फर्जीवाड़े या दूसरे तरीके से निजी इस्तेमाल में लाता है या दूसरे को ऐसा कुछ करने की छूट देता है.
अगर कोई इरादतन अपने कार्यकाल के दौरान खुद को या दूसरों को समृद्ध करता है, उसके पास अपने कार्यकाल के दौरान कोई ऐसी चीज, संसाधन या संपत्ति वगैरह पाई जाती है, जो एक लोक प्रशासक के पास नहीं होनी चाहिए और जो उसकी घोषित आय से ज्यादा है.
सतह पर शांत दिखने वाली लुटियन्स दिल्ली में भीतर ही भीतर एक तूफान घुमड़ रहा है. बाबुओं का यह शहर ऐसी उथल-पुथल से गुजर रहा है जैसा राजीव गांधी या इंदिरा गांधी की बहुमत वाली सरकारों के दौरान महसूस किया गया था. दिल्ली के कई लोगों को अब भी याद है कि राजीव गांधी ने प्रधानमंत्री रहते हुए कैसे एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान ही एक नौकरशाह को निलंबित कर दिया था. एक आला अफसर यह भी याद करते हैं कि इंदिरा गांधी के राज में तो “नौकरशाहों की लगातार बदली होती रहती थी.”
आज तीन दशक बाद देश को वास्तव में चलाने वाले नौकरशाह खुद को फंसा हुआ पा रहे हैं. वे सशंकित हैं और नाराज भी हैं. उनकी हताशा के कई कारण हैं. कमजोर मंत्री, भ्रष्टाचार निरोधक कानून का मंडराता साया और सूचना का अधिकार, जो उनके मुताबिक मिलकर एक ऐसा माहौल बना चुका है जिसमें एक कदम भी आगे बढ़ाना या कोई फैसला लेना उनके लिए असंभव हो चला है. कुछेक मंत्रियों, जैसे वित्त, रक्षा, सड़क परिवहन और राजमार्ग और कमोबेश रेलवे को छोड़ दें तो अधिकतर मंत्री अपने सारे फैसले उस प्रधानमंत्री कार्यालय के जिम्मे छोड़ चुके हैं जिसके पास अक्तूबर तक करीब 1,200 फाइलें लंबित पड़ी हुई थीं जबकि समान्य तौर कुछ सौ फाइलें ही लंबित रहती हैं.
दरकिनार किए जाने का दर्द
नौकरशाहों की मानें तो इस सरकार को एक अलग किस्म की नीतिगत लकवाग्रस्तता अपने आगोश में जकड़ती जा रही है. यूपीए राज में जहां अफसरों के पास फैसले लेने की इच्छाशक्ति और साहस की कमी थी, वहीं अब उनके पास नए विचार और कूव्वत तो है मगर वे खुद को कानूनों में बंधा पा रहे हैं. सत्ता के अत्यधिक केंद्रीकरण के कारण तमाम अधिकारों के छिन जाने से हालात और मुश्किल हो गए हैं.
नौकरशाही का भय नरेंद्र मोदी के उस केंद्रीकृत प्रशासनिक मॉडल से उपज रहा है जिसमें मंत्रियों को कमजोर बना दिया गया है जबकि पीएमओ को इतनी ताकत दे दी गई है कि वह अधिकारियों की नियुक्ति और तबादले कर रहा है. एक बड़े अधिकारी कहते हैं, “पहले यूपीए के सशक्त मंत्रियों के तहत अधिकारियों में यह भाव था कि “मेरे मंत्री ने मंजूरी दे दी है तो अब ठीक है.” मंत्रियों का यह सुरक्षा कवच चले जाने से अधिकारी खुद को बेसहारा पा रहे हैं. इसके अलावा प्रदर्शन करने का दबाव और पीएमओ के साथ सप्ताहांत की बैठकें भी तनाव को बढ़ा रही हैं. संरक्षण और अधिकारों के साथ काम करने की जो आजादी मिलती है, वह नदारद है. अब अधिकारियों का सिर्फ चयन और छंटनी ही पीएमओ नहीं कर रहा बल्कि अचानक तबादला भी कर दिया जा रहा है. पिछले 18 महीनों में मोदी सरकार ने तीन बार अधिकारियों के पदों में बड़ा फेरबदल किया है. पूर्व कैबिनेट सचिव के. एम. चंद्रशेखर कहते हैं, “मेरे लिए चिंताजनक बात अफसरों के तबादले की बढ़ती प्रवृत्ति है, यहां तक कि संयुक्त सचिव स्तर पर भी यह देखा जा रहा है. इसने ऐसी धारणा पैदा की है कि कुछ को छोड़कर बाकी प्रशासनिक अधिकारी दोयम दर्जे के हैं और उनके सिर पर लगातार तलवार लटकी हुई है.” वे कहते हैं कि ऐसी घटनाएं अतीत में भी होती थीं लेकिन कम थीं. इसके अलावा, उनके मुताबिक, टीम वर्क के लिहाज से भी यह प्रवृत्ति अनुकूल नहीं है.
सेवा में करीब चार दशक बिता चुके एक बड़े अधिकारी इन शब्दों में दिल्ली का हाल बयान करते हैं, “डर इस बात का है कि मैं क्यों कोई फैसला लूं. मुझ पर भरोसा नहीं किया जा रहा, मेरी जासूसी की जा रही है कि मैं किसी से मिल न सकूं. बेहतर होगा कि मैं खुद को बचाऊं और कोई फैसला न लूं.” वे कहते हैं, “नितिन गडकरी के आवास से जासूसी उपकरणों की बरामदगी हो या गृह मंत्री के पुत्र के वित्तीय लेनदेन का मामला, सरकार ने पर्याप्त संकेत दे दिए हैं कि सब पर नजर रखी जा रही है.”
विवादास्पद कानून
नौकरशाही को विशेष रूप से किसी बात से डर लगा हुआ है तो वह है 1988 का भ्रष्टाचार विरोधी कानून, जिसके तहत 2013 के बाद से सीबीआइ ने कई अधिकारियों को पकड़ा है जिनमें सेबी के पूर्व अध्यक्ष सी.बी. भावे और पूर्व कोयला सचिव एच.सी. गुप्ता तथा पी.सी. पारेख शामिल हैं.
यह कानून कहता है कि कोई लोकसेवक आपराधिक कृत्य में लिप्त कहा जाएगा, अगर वह किसी व्यक्ति से अपने लिए या किसी अन्य के लिए कोई पारितोषिक स्वीकार करता है या स्वीकार करने को राजी होता है या ऐसा प्रयास करता है. ऐसे ही कई प्रावधान इसमें शामिल हैं जिसके चलते अधिकारी खुद को फंसा हुआ पा रहे हैं. इस कानून के प्रावधानों के दायरे में सभी अधिकारी आते हैं, साथ ही इसमें प्रधानमंत्री समेत सरकार के सभी नेता भी आते हैं.
नौकरशाहों से ताल्लुक रखने वाला इसका सबसे विवादास्पद प्रावधान वह है जो कहता है कि उनके द्वारा लिया गया कोई फैसला अगर किसी तीसरे पक्ष को लाभ पहुंचाता हो तो उसकी जिम्मेदारी उनकी होगी. अधिकारियों का कहना है कि टेलीकॉम, कोयला, सड़क परिवहन और राजमार्ग जैसे मंत्रालयों के संदर्भ में इस प्रावधान के दीर्घकालिक परिणाम हो सकते हैं जहां तीसरे पक्ष से जुड़े फैसले लिए ही जाने होंगे और किसी न किसी को लाभ भी जरूर होगा. ऐसा करके कोई अधिकारी फंस न जाए, इस डर से फैसले ही नहीं लिए जा रहे हैं.
बड़े मंत्रालय इस मामले में फूंक-फूंक कर कदम रख रहे हैं और फैसलों को टाल दे रहे हैं. हाल ही में जहाजरानी मंत्रालय ने कुछ पुराने जहाजों की बिक्री से संबंधित एक फैसला विनिवेश विभाग को बढ़ा दिया था.
जांच एजेंसियों का डर भी बना हुआ है जो आज भी यूपीए राज के मामलों को देख रही हैं. अक्सर सीबीआइ के अधिकारी विदेशी निवेश संवर्धन बोर्ड (एफआइपीबी) के दक्रतर में देखे जा सकते हैं जहां वे एयरसेल-मैक्सिस सौदे में पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम की भूमिका की जांच के सिलसिले में चक्कर लगाते रहते हैं. गौर तलब है कि निवेश आवेदनों को मंजूरी देने की एकल खिड़की व्यवस्था के तहत अंतरमंत्रालयी इकाई के रूप में एफआइपीबी ने 2006 में 3,500 करोड़़ के एयरसेल-मैक्सिस सौदे को मंजूरी दी थी.
एक आला अधिकारी पूछते हैं, “सीबीआइ यहां बैठी रहती है, उसके सामने एफआइपीबी कैसे किसी चीज को मंजूरी देगा? सदिच्छा से फैसले लेने वाले अफसरों को हतोत्साहित किया जा रहा है. आज यह कानून मंशा पर नहीं जाता. इस कानून ने ईमानदार अफसरों की प्रतिष्ठा को नष्ट कर डाला है.”
तीन साल तक नरक की जिंदगी बिताने वाले पूर्व दूरसंचार सचिव श्यामल घोष की कहानी आजकल नौकरशाहों की जबान पर चढ़ी रहती है. सीबीआइ ने घोष पर आपराधिक षड्यंत्र के लिए भ्रष्टाचार विरोधी कानून की धाराओं के तहत मुकदमा किया था. इस साल अक्तूबर में एक विशेष अदालत ने सीबीआइ की चार्जशीट को खारिज कर दिया, घोष को क्लीन चिट दे दी और सीबीआइ के निदेशक को उसके अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने का निर्देश जारी किया. इसके बावजूद जो नुक्सान होना था, वह तो हो चुका था. एक और अधिकारी कहते हैं, “सीबीआइ ने हमारे सबसे अच्छे अफसरों में एक की प्रतिष्ठा नष्ट कर दी.”
एक अन्य अधिकारी विवेकाधीन अधिकारों के अत्यधिक इस्तेमाल की शिकायत करते हैं. वे कहते हैं, “इन लोगों ने कोहराम मचा रखा है.” अधिकारियों का मानना है कि भ्रष्टाचार विरोधी कानून का इस्तेमाल राजनैतिक औजार के रूप में किया जा रहा है.
सरकार इस कानून के विवादास्पद प्रावधानों से वाकिफ है. इस साल अप्रैल में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कानून की समीक्षा की जरूरत पर जोर दिया था और कहा था कि इस कानून को ऐसे विकसित किया जाना होगा कि उन देशों के संदर्भ में फैसले लेने की प्रक्रिया में तेजी आ सके जहां आर्थिक गतिविधियों का विस्तार हो रहा है.
जेटली ने कहा था, “क्या ऐसी हालत में कोई फैसला ले सकता है जहां फैसला लेने वाला हर शख्स लगातार रक्षात्मक मुद्रा में हो, इस बात से लगातार सतर्क रहे कि उसने फैसला ले लिया तो जाने उसका अंजाम क्या होगा? आर्थिक निर्णय की प्रक्रिया में भूल-चूक भी होती है... इसमें जोखिम का एक तत्व भी होता है. क्या 1988 का यह कानून भ्रष्ट कार्रवाई और ईमानदारी से की गई कार्रवाई में हुई गलती के बीच पर्याप्त फर्क कर पाता है? मुझे लगता है कि यहां यह कानून नाकाम हो जाता है.”
कानून के संशोधित संस्करण के मजमून में उस विवादास्पद प्रावधान को हटाया गया है जिसमें किसी अधिकारी की कार्रवाई से तीसरे पक्ष को लाभ पहुंचने का जिक्र है. पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च में सीनियर एनालिस्ट प्रियंका राव कहती हैं, “एक लोकसेवक के बतौर मैं अपना काम आजादी से करना चाहूंगी और अदालत में घसीटा जाना नहीं चाहूंगी. संशोधित कानून इसका ध्यान रखता है.”
इस संशोधन में भ्रष्ट अफसरों के खिलाफ दंड के प्रावधान भी कड़े किए गए हैं. इस संशोधित कानून को संसद के शीत सत्र में पारित किया जाना है. इसे पारित करने की मांग नौकरशाहों की ओर से लगातार बढ़ती जा रही है और ऐसा लगता नहीं है कि यह सरकार भ्रष्टाचार के मुद्दे पर अपनी छवि कमजोर दिखाना चाहेगी, खासकर इसलिए क्योंकि पिछले साल हुए चुनाव में इसी मुद्दे को उसने यूपीए के खिलाफ अपने प्रचार का केंद्र बनाया था.
सरकार लोकपाल कानून पर भी शांत है. उसे आशंका है कि इसके चलते अधिकारी और ज्यादा दबाव और भय में आ जाएंगे.
वृद्धि पर लगाम
निर्णय प्रक्रिया में सुस्ती इन्फ्रास्ट्रक्चर से जुड़े कई मंत्रालयों को प्रभावित कर रही है. अक्तूबर की एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी नौकरशाहों पर भड़क गए थे और उन्होंने कह डाला था, “अफसर फाइलों पर बैठे हुए हैं और फैसले नहीं ले रहे. जिन्हें काम नहीं करना है वे वीआरएस ले लें. हमें सकारात्मक नजरिए वाले लोगों की जरूरत है. प्रदर्शन की जांच करवाई जाएगी.”
इन मंत्रालयों के पास पूरे करने के लिए महत्वाकांक्षी लक्ष्य हैं जो अर्थव्यवस्था को रक्रतार दे सकते हैं. मसलन, सड़क मंत्रालय अब भी रोजाना 20 किलोमीटर सड़क बनाने में ही जूझ रहा है जबकि उसका लक्ष्य इसे 100 किलोमीटर तक पहुंचाना था. मंत्रालय चाहता था कि परियोजनाओं को कैबिनेट तक भेजे बगैर उसे 1,000 करोड़ रु. तक की परियोजनाओं को मंजूर करने के अधिकार मिल जाएं या फिर उसकी मौजूदा मंजूरी क्षमता को दोगुना कर दिया जाए. सरकार को यह मंजूरी देने में दो माह लग गए. विलंबित परियोजनाओं में निर्माता को मुआवजे के बतौर अतिरिक्त समय देने का फैसला भी दो महीने तक लटका रहा. यूपीए सरकार में मंत्रियों को विशेषाधिकार प्राप्त थे जिसके चलते सिर्फ रणनीतिक मामले पीएमओ को भेजे जाते थे. आज की तारीख में मंत्रियों को “अनुभवहीन” और “सशंकित” समझा जाता है.
एक अहम मंत्रालय के एक अधिकारी कहते हैं, “शायद उन्हें (मंत्रियों) भी नौकरशाहों से सावधान रहने को कहा गया हो, कि ये किसी भी चीज पर साइन करवा लेंगे.” कुल मिलाकर अविश्वास का माहौल चरम पर है जो सरकार की सेहत के लिए ठीक नहीं है.

