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उत्तर प्रदेश : मिशन मुलायम

मुख्यमंत्री अखिलेश यादव हैं, मंत्रिमंडल भी उनका है, लेकिन फैसले मुलायम सिंह यादव के हैं. मंत्रिमंडल में फेरबदल भी उसी का नतीजा है

अपडेटेड 10 नवंबर , 2015
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव लोकसभा चुनाव में मिली हार के डेढ़ साल बाद सपा सरकार का पहला मंत्रिमंडल विस्तार कर रहे थे. 31 अक्तूबर की सुबह दस बजे से राजभवन के गांधी सभागार में मंत्री पद की शपथ लेने वाले नेता पहुंचने लगे थे. मंच के बाईं ओर कैबिनेट मंत्री के रूप में शपथ लेने वाले नेताओं के लिए कुर्सियां डाली गई थीं. 15 मिनट बाद नीले रंग की पगड़ी और सदरी पहने एक बुजुर्ग नेता भी इन्हीं कुर्सियों पर विराजमान हो गए. दूसरे नेताओं ने उन पर अचरज भरी नजर डाली तो सभागार में मौजूद सुरक्षागार्ड दौड़ पड़े, लेकिन उनके हाथ में एक खास लिफाफा देखकर ठिठक गए. 

ठीक साढ़े दस बजे जब मुख्य सचिव आलोक रंजन ने कैबिनेट मंत्री के रूप में शपथ लेने वाले नेताओं के नामों की घोषणा की तो पता चला कि ये वरिष्ठ अकाली नेता 73 वर्षीय बलवंत सिंह रामूवालिया हैं. शपथ ग्रहण समारोह से ठीक दो घंटे पहले रामूवालिया ने फैक्स के जरिए अकाली दल के उपाध्यक्ष पद से इस्तीफा देकर सपा की सदस्यता ग्रहण कर ली थी. केंद्र में एच.डी. देवेगौड़ा और इंद्र कुमार गुजराल की सरकार में सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के साथ मंत्री रहे रामूवालिया अब यूपी की सियासत में 'नेता जी' के हमराह बने हैं. दो दिन पहले 29 अक्तूबर को दोपहर डेढ़ बजे जब राजभवन ने प्रदेश में सत्तारूढ़ सपा सरकार से हटाए गए 8 मंत्रियों की सूची जारी की, तभी इस बात के संकेत मिलने लगे थे कि मुलायम सिंह अभी भी अखिलेश यादव को उनकी पसंद की टीम देने के मूड में नहीं हैं. यही वजह रही कि पिछले दो सालों के दौरान प्रदेश में सबसे ज्यादा विवादित रहे खनन विभाग के कैबिनेट मंत्री गायत्री प्रसाद प्रजापति मुलायम सिंह की पसंद होने के चलते क्षमादान पाने में सफल रहे. वहीं दूसरे सबसे विवादास्पद नेता गोंडा से विधायक और सपा सरकार में माध्यमिक शिक्षा राज्यमंत्री रहे विनोद कुमार सिंह उर्फ पंडित सिंह को मुलायम सिंह की नजदीकी का फायदा मिला. ये राज्य मंत्री से प्रमोशन पाकर कैबिनेट मंत्री बन गए. इतना ही नहीं, 31 अक्तूबर को हुए मंत्रिमंडल विस्तार में अपने पसंद के नेताओं को प्रमुखता दिलाकर (देखें बॉक्स) मुलायम सिंह ने साफ कर दिया कि वे 2017 के विधानसभा चुनाव से पहले अखिलेश यादव को 'फ्री-हैंड' देने के मूड में नहीं हैं. अब यह भी साफ है कि अगले विधानसभा चुनाव में सपा का चेहरा तो मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ही होंगे, लेकिन चुनावी जंग मुलायम के सिपहसालार लड़ेंगे. 

रैलियों से अखिलेश की 'ब्रांडिंग'
मिशन-2017 में जुटे मुलायम सिंह ने पूरे प्रदेश में सघन रैलियां करके अखिलेश यादव सरकार की उपलब्धियों का बखान करने की रणनीति बनाई है. अक्तूबर के पहले हक्रते में उन्होंने अखिलेश यादव समेत सपा के अन्य शीर्ष नेताओं के साथ बैठक कर रैलियों की रूपरेखा तैयार कर ली है. पार्टी के एक महासचिव कहते हैं, ''ये रैलियां लोकसभा चुनाव के पहले हुई-देश बचाओ, देश बनाओ की तर्ज पर होंगी. लेकिन इस बार पूरा फोकस सपा सरकार की उपलब्धियों का प्रचार करने पर होगा. '' पंचायत चुनाव के फौरन बाद ये रैलियां प्रदेश के सभी मंडल मुख्यालयों पर होंगी और इनमें मुख्य वक्ता के रूप में मुलायम सिंह ही मौजूद रहेंगे. 

इसके लिए पार्टी के जिला स्तरीय नेताओं को सपा मुख्यालय से दो किताबें वितरित की जा रही हैं. इनमें एक किताब में अखिलेश यादव सरकार की उपलब्धियों का जिक्र है तो दूसरी में केंद्र की बीजेपी सरकार के अधूरे वादों का बहीखाता है. सपा के प्रवक्ता और कैबिनेट मंत्री राजेंद्र चौधरी कहते हैं, ''इन किताबों के माध्यम से प्रदेश सरकार की उन उपलब्धियों का जिक्र किया गया है, जिन्हें मीडिया में भी स्थान नहीं मिल सका. इन्हें पढ़कर पार्टी के नेता जनता के सामने सपा का पक्ष बखूबी रख सकेंगे. '' 

इतना ही नहीं समाचार चैनलों और सार्वजनिक तौर पर सपा सरकार की उपलब्धियों को बताने में नेताओं को पारंगत करने के लिए पार्टी जल्द ही जिला स्तर पर विशेष शिविरों का आयोजन करने जा रही है. इनमें सपा के वरिष्ठ नेता और एक्सपर्ट जिलास्तरीय नेताओं को प्रभावी भाषण देने की तरकीबें सुझाएंगे. 

गुटबाजी बनी चुनौती
अगले विधानसभा चुनाव में जाने से पहले मुलायम सिंह पार्टी के भीतर विरोधी खेमों को साधने में भी जुटे हैं. हरदोई की राजनीति में परस्पर 36 का आंकड़ा रखने वाले नरेश अग्रवाल और डॉ. अशोक वाजपेयी से 16 अक्तूबर की दोपहर सपा मुख्यालय पर मुलायम ने तकरीबन डेढ़ घंटे बातचीत की. डॉ. वाजपेयी को विधान परिषद सदस्य बनाने के बाद से अग्रवाल कुछ नाराज चल रहे थे. यही वजह थी कि 1 अक्तूबर को अग्रवाल ने हरदोई में अपना जन्मदिन 'कौमी एकता सम्मेलन' के तौर पर मनाया था. पिछली बार के उलट इस बार सपा के वरिष्ठ नेता समारोह से दूर ही रहे और समारोह स्थल पर सपा के भी झंडे नहीं दिखे. यह अग्रवाल का ही प्रभाव था कि मुलायम चाहकर भी डॉ. वाजपेयी को अखिलेश सरकार में मंत्री न बनवा सके. वहीं असंतुष्ट अग्रवाल के पुत्र नितिन अग्रवाल को राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) पद पर प्रोन्नत करके नाराजगी दूर करने की कोशिश की. 
हालांकि मंत्रिमंडल विस्तार में जिस तरह राष्ट्रीय लोकदल नेता अमर सिंह के करीबियों पर मेहरबानी दिखाई गई है, उससे आजम खां के खेमे में बेहद नाराजगी है. एक ओर अमर सिंह के करीबी मदन चौहान को राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) बनाया गया और दूसरी ओर आजम के विरोधी रहे अमरोहा से विधायक कमाल अख्तर को कैबिनेट मंत्री और रियाज अहमद को राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) के रूप में प्रमोशन देकर मुलायम ने अपने संकेत स्पष्ट कर दिए हैं. 

विकल्प के जरिए सत्ता संतुलन
मंत्रिमंडल में शामिल किए गए नए मंत्रियों को काबू में रखने के लिए मुलायम सिंह ने इस बार एक खास रणनीति तैयार की है. पार्टी के एक राष्ट्रीय महासचिव बताते हैं, ''मंत्रिमंडल में शामिल किए गए नए मंत्रियों के जिले से ही दूसरे गुट के नेताओं को भी तवज्जो दी गई है ताकि ये मंत्री ऐसी स्थिति में न आ सकें कि पार्टी के लिए अपरिहार्य हो जाएं. '' 

बाराबंकी से आने वाले अरविंद कुमार सिंह 'गोप' को कैबिनेट मंत्री के रूप में प्रोन्नति दी गई है तो इसी जिले के दूसरे मंत्री फरीद महफूज किदवई को राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) बनाया गया है. पीलीभीत से आने वाले रियाज अहमद  राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) बनकर जिले में ठसक नहीं दिखा सकेंगे क्योंकि यहीं से पहली बार विधायक हेमराज वर्मा को भी राज्यमंत्री बनाकर इन पर नियंत्रण का दूसरा खेमा तैयार कर दिया गया है. कुछ ऐसा ही बहराइच के यासिर शाह के साथ भी है, जिन्हें (राज्यमंत्री) स्वतंत्र प्रभार के रूप में प्रमोशन मिला है. पिछले साल इसी जिले की बेलहा विधानसभा सीट से उपचुनाव जीतने वाले बंशीधर बौद्घ को राज्यमंत्री बना दिया गया है. इलाहाबाद विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र विभाग के पूर्व प्रोफेसर एस.के. राय कहते हैं, ''सपा नेताओं को काबू में रखने के लिए मुलायम सिंह शुरू से ही हर जिले में पार्टी के दो खेमे तैयार करते रहे हैं. इस बार के मंत्रिमंडल विस्तार में भी ऐसा ही है. ''

मंत्रियों के बीच उलटफेर कर अखिलेश यादव की छवि चमकाने में जुटे मुलायम सिंह यादव को असली चुनौती अगले ही दिन मिली, जब 1 नवंबर को उनके आवास से कुछ दूरी पर सपा पार्षद बंटू यादव को गोली मार दी गई. अपराधियों के बुलंद हौसलों ने यह संकेत भी दे दिया कि सुधरी कानून व्यवस्था के लिए मुलायम को नए सिरे से प्रयास करना होगा. तभी अखिलेश यादव की छवि निखरेगी.
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