ढाई माह पहले की बात है. मुंबई के एक स्कूल में पढऩे वाली एक 14 वर्षीया लड़की साथ के लड़कों से दूर-दूर रहने लगी. खतरे की घंटी तब बजी जब एक दिन उसने घर से बाहर निकलने से ही इनकार कर दिया. उसकी मां उसे एक मनोचिकित्सक के पास ले गई. परामर्श के लंबे सत्रों के बाद पता चला कि उसके दिमाग को यौन कल्पनाओं और विचारों ने जकड़ लिया था.
ये तमाम विचार बीते दिनों बेंगलुरू, हैदराबाद, दिल्ली और कोलकाता के स्कूलों में हुई यौन उत्पीडऩ की कथित घटनाओं के सिलसिले से उपजे थे. उसे इस स्थिति से बाहर निकालने वाली चिकित्सक डॉ. सोनाली गुप्ता कहती हैं, ‘‘उसके लिए पिछले कुछ महीने बहुत पीड़ादायी रहे हैं. वह निराश थी और कुछ भी समझ नहीं पा रही थी. दिक्कत यह थी कि ऐसा कोई नहीं था जिससे वह सवाल पूछ पाती.’’
इस समस्या से जूझने वाली यह लड़की अकेली नहीं है. इंडिया टुडे समूह का सेक्स सर्वेक्षण बताता है कि देश के 91 फीसदी किशोर सेक्स नाम की अनंत समस्या से अकेले जूझ रहे हैं. यह सर्वेक्षण इन किशोरों के दिमाग के भीतर झांकने की तो कोशिश करता ही है, उनके पालन-पोषण से जुड़ी दिक्कतों को भी सामने लाता है.
सेक्स की चौतरफा मौजूदगी के इस दौर में किशोरों और प्रौढ़ों के बीच पहल से जो खाई मौजूद है, माता-पिता और स्कूल उसे और चौड़ा कर रहे हैं जिसके चलते बच्चों के दिमाग में भ्रम और घबराहट की मिलीजुली खलबली मची हुई है. इसका एक उदाहरण काफी होगाः देश भर के स्कूलों से आ रही यौन उत्पीडऩ की खबरों के बीच मुंबई के कुछ स्कूलों ने लड़कों और लड़कियों के बीच बातचीत बंद करवा दी.
एक वाकया सुनेः उत्तरी मुंबई के एक जाने-माने स्कूल में हाफ टाइम के समय 13 साल के बच्चों का एक समूह हमेशा की तरह गलियारे में खड़ा था. संबित ने तनाज के कंधे पर हाथ रखा था और सारे लड़के उस रोमांचक क्रिकेट मैच के बारे में सुन रहे थे जो उनके दोस्त ने बीती रात टीवी पर देखा था.
तभी एक तमतमाया हुआ शिक्षक संबित और तनाज को खींचते हुए सुपरवाइजर के कमरे में ले गया. उनके माता-पिता को चेतावनी दी गई कि उनके बच्चों ने वह हरकत दोबारा की तो उन्हें स्कूल से निकाल दिया जाएगा. बच्चों को नहीं पता कि उन्होंने ऐसा किया क्या था. संबित कहता है, ‘‘हमने तो कुछ नहीं किया था.’’
यह चलन बन चुका है. मुंबई के हीरानंदानी फाउंडेशन से लेकर आर्य विद्या मंदिर तक और पुणे के करीब स्थित सह्याद्रि स्कूल तक बच्चों पर खतरनाक तरीके से नजर रखी जा रही है. एक शिक्षक का कहना है, ‘‘अब हमें ज्यादा सतर्कता बरतनी पड़ती है.’’ जिन स्कूलों में शिक्षकों और बच्चों का अनुपात कम है, वे कोई खतरा नहीं उठाना चाहते. माता-पिता का भय भी शिक्षकों को निगरानी बढ़ाने के लिए बाध्य कर रहा है.
सांताक्रूज के आर.एन. पोद्दार स्कूल में तीन-चार साल के मासूमों को अच्छे स्पर्श और बुरे स्पर्श की शिक्षा दी जा रही है. चेंबूर के सेंट ग्रेगोरियोस हाइस्कूल में 10वीं और 12वीं के बच्चों को दो डॉक्टर सेक्स शिक्षा के पाठ पढ़ा रहे हैं. यहां की प्रिंसिपल अदिति बनर्जी कहती हैं, ‘‘हमें जब अटपटी हरकतें दिखती हैं, तो हम बच्चों के साथ अकेले में परामर्श सत्र चलाते हैं.’’
नतीजतन, बच्चों में आतंक का माहौल हैः काउंसलर बताते हैं कि अभिभावक दिन में बीस बार बच्चों को फोन करने लगे हैं. गुप्ता कहती हैं, ‘‘इस आतंक के भय से बच्चे या तो माता-पिता से सच बोलना छोड़ देंगे, बचाव के उपायों को गंभीरता से नहीं लेंगे या फिर अभिभावकों की इस सनक का शिकार बन जाएंगे-इनमें से कुछ भी फायदेमंद नहीं रहने वाला है.’’
एसएनडीटी विमेंस यूनिवर्सिटी में मनोविज्ञान विभाग की प्रमुख डॉ. अनुराधा सोवानी के मुताबिक यह एक ऐसी समस्या है जहां शिक्षक और अभिभावक को लगता है कि बच्चों से संवाद कायम करना रात की बात भर है. वे कहती हैं, ‘‘अगर आपने बचपन से ही बच्चे से संवाद कायम नहीं किया और उसमें यह भरोसा नहीं जगाया कि वह कभी भी आकर आपसे बात बता सके, तो अचानक 13 साल की उम्र में आप यह उम्मीद नहीं कर सकते कि वह आपके पास अपने सवाल लेकर आएगा.’’
दोस्ती और विश्वास पर इसकी दोहरी मार पड़ रही है. संबित और तनाज की दोस्ती में अब दरार आने लगी है क्योंकि संबित को लगता है कि कहीं उसे खलनायक न बना दिया जाए. सोवानी कहती हैं, ‘‘बच्चे स्कूल को भरोसेमंद जगह के तौर पर देखते हैं.’’ वे दक्षिणी मुंबई के एक स्कूली बच्चे के बारे में बताती हैं जो दोस्तों को दिखाने के लिए अश्लील सीडी लेकर स्कूल आया था, एक लड़की जो अपने भाई का मोबाइल फोन इस्तेमाल कर रही थी, उसे और परिवार को उस पर अश्लील क्लिप मिली.
ऐसे मामलों में स्कूल ऐसी तकनीकों का इस्तेमाल प्रतिबंधित कर देते हैं, स्कूल से निकालने की धमकी देते हैं. फिर अभिभावकों को तलब किया जाता है और बच्चे को डांटा-फटकारा जाता है. सोवानी कहती हैं, ‘‘यह तो बस एक तरीका हुआ इस समस्या को देखने का, लेकिन दूसरा तरीका यह महसूस करना है कि बच्चों को ऐसे वातावरण में आजादी महसूस होती थी.’’ सवाल उस ‘‘भरोसे’’ को कायम करने का है.
‘‘क्या गर्भ निरोधक गोलियां सुरक्षित हैं?’’ ‘‘मेरी सारी सहेलियों के पास वेलेंटाइन डे के लिए बॉयफ्रेंड हैं. बॉयफ्रेंड पाने के लिए मुझे क्या करना चाहिए?’’ काउंसलरों के मुताबिक ऐसे सारे सवाल बच्चे अपने माता-पिता या शिक्षक से नहीं पूछ सकते, लिहाजा स्कूल की वर्कशॉप्स में ये सुनने को मिलते हैं. इसीलिए, बिना किसी आखिरी निर्णय, भय या गुस्से के आपको प्रतिक्रिया देनी होगी और बच्चों को ऐसे विकल्प देने होंगे जो कारगर हों. बशर्ते आप वास्तव में यह चाहते हों कि आपका बच्चा आपके सामने खुले.
सेक्स सर्वे 2015: क्या बदल रही है सेक्स को लेकर माता-पिता की सोच?
अपने ऊपर चौतरफा निगरानी रखने वाले अभिभावकों और स्कूलों के आतंक में जी रहे किशोर यह नहीं तय कर पा रहे कि उनके लिए क्या अहम है और कौन-से विकल्प सही हैं.

अपडेटेड 13 जनवरी , 2015
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