भारत का परमाणु कार्यक्रम ठप्प होने के कगार पर जा पहुंचा है. पिछले चार साल से कोई बड़ा टेंडर नहीं दिया जा सका है. विडंबना यह कि यह ऐसा दौर है जिसमें उम्मीद की जा रही थी कि भारत-अमेरिका असैनिक परमाणु करार के बाद देश में नए परमाणु युग की शुरुआत हो जाएगी. हरियाणा के गोरखपुर के संयंत्र में पहले चरण में 720-मेगावाट के स्वदेश निर्मित प्रेशराइज्ड हेवी वाटर रिएक्टर तैयार होने थे, लेकिन वहां काम रुका हुआ है क्योंकि कच्चे माल की आपूर्ति करने वालों ने निविदा पर आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया है. वे इस बात का आश्वासन मांग रहे हैं कि किसी तरह की परमाणु दुर्घटना होने पर उन्हें जिम्मेदार नहीं ठहराया जाएगा.
परमाणु ऊर्जा विभाग (डीएई) के पूर्व अध्यक्ष अनिल काकोदकर ने इंडिया टुडे को बताया, “मेरा ख्याल है कि उन्होंने (कच्चे माल की आपूर्ति करने वाले) इस आशय का पत्र भी लिखा है. भारत में परमाणु ऊर्जा क्षेत्र के विस्तार में बिलाशक यह एक बड़ी बाधा है. इसका कोई समाधान निकालना ही पड़ेगा वरना परमाणु कार्यक्रम को नुक्सान पहुंचेगा.”
समस्या की जड़ 2010 का असैनिक परमाणु क्षतिपूर्ति जवाबदेही अधिनियम है, जिसमें परमाणु दुर्घटना होने पर ऑपरेटर के साथ-साथ आपूर्ति करने वालों को भी जिम्मेदार ठहराने का प्रावधान है. अधिनियम की विवादास्पद धारा 17 (बी) के तहत कहा गया है कि अगर निर्माण की ‘प्रत्यक्ष या परोक्ष’ खराबी होने से कोई परमाणु दुर्घटना होती है तो ऑपरेटर को आपूर्ति करने वाले से सौदा पलटने का अधिकार है.
इसके अलावा कानून में धारा 46 में भी काफी कड़े प्रावधान हैं. यह धारा साफ कर देती है कि ऑपरेटर को किसी अन्य कानून के तहत भी राहत नहीं मिल सकती, जिसका सहारा पीड़ित अधिक मुआवजे की मांग के लिए ले सकता है. इस धारा में आपूर्ति करने वालों का विशेष उल्लेख नहीं किया गया है लेकिन आपूर्तिकर्ताओं की चिंता यह है कि दुर्घटना की हालत में दूसरे मुकदमों की भी संभावना बन जाती है.
क्या है समस्या
अधिनियम के ये दो प्रावधान भारतीय और विदेशी आपूर्तिकर्ताओं के लिए सबसे बड़ी बाधा बन गए हैं, जिससे परमाणु विस्तार योजनाओं के ठप्प पड़ जाने का खतरा पैदा हो गया है. अमेरिका की अगुआई में विदेशी रिएक्टर आपूर्तिकर्ताओं ने हर्जाने के इन प्रावधानों पर कड़ी आपत्ति उठाई है. न्यूक्लियर पावर कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (एनपीसीआइएल) के पूर्व अध्यक्ष एस.के. जैन कहते हैं, “अगर हमने इस बारे में जल्द ही कोई समाधान नहीं निकाला तो वर्तमान परमाणु संयंत्र भी मुसीबत में फंस जाएंगे. यह ऐसी समस्या है जिससे भारतीय और विदेशी, दोनों ही आपूर्तिकर्ता आशंकित हैं.”
भारत-अमेरिका परमाणु करार की एक अनिवार्य शर्त थी कि जवाबदेही तय करने वाला कोई कानून फौरन बनाया जाए. परमाणु कारोबार से जुड़े सभी पक्षों को व्यवसाय के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करने की खातिर विश्व स्तर पर एक सिद्घांत यह निकल कर आया कि किसी तरह की दुर्घटना होने पर जवाबदेही तय करने और मुकदमे के बारे में कुछ बातें तय की जाएं.
इस तरह बुनियादी सिद्घांत यह उभर कर आया कि दुर्घटना की हालत में किसी तरह के नुक्सान के लिए परमाणु संयंत्र का ऑपरेटर जिम्मेदार होगा. दुनिया भर में जवाबदेही तय करने का यही नियम सर्वमान्य हुआ है. इसका यह अर्थ भी हुआ कि आपूर्ति करने वाला दोषी नहीं माना जाएगा. जलवायु परिवर्तन के इस दौर में ऐसी व्यवस्था से परमाणु ऊर्जा को स्वच्छ ऊर्जा के रूप में विकसित करने में मदद मिली है.
इस दिशा में आगे बढ़ते हुए अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी ने भी इसी के आधार पर कन्वेंशन ऑन सप्लीमेंटरी कंपेंसेशन (सीएससी) नाम से आचार संहिता तैयार की है, जिसके अनुसार ऑपरेटर पर हर तरह की जिम्मेदारी डाल दी गई है. परमाणु करार के तहत भारत सीएससी नियमों जैसा ही विधेयक लाने को राजी हो गया था और कालांतर में कन्वेंशन में संशोधन करना था. केंद्र सरकार ने सीएससी पर हस्ताक्षर कर दिए हैं लेकिन अमेरिका का कहना है कि भारतीय नियम सीएससी मॉडल के अनुरूप नहीं हैं.
बड़े पैमाने पर देखें तो यह मुद्दा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस लक्ष्य के अनुरूप भी नहीं है कि भारत में कारोबार करने के लिए अनुकूल और सहज वातावरण तैयार किया जाएगा. अमेरिका को दो स्थानों पर रिएक्टर लगाने का आश्वासन दिया गया है, और वह मोदी सरकार पर समाधान तलाशने का दबाव बना रहा है. अब जब अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा गणतंत्र दिवस पर मुख्य अतिथि के रूप में आ रहे हैं, तो समाधान तलाशने के प्रयास तेज हो रहे हैं.
दक्षिण कोरिया एकमात्र दूसरा ऐसा देश है जहां परमाणु जवाबदेही संबंधी कानून में इस आशय के प्रावधान हैं कि परमाणु दुर्घटना होने पर ऑपरेटर को आपूर्तिकर्ता से सौदा पलटने और हर्जाना वसूलने का अधिकार है. लेकिन कोरिया का कानून यह भी स्पष्ट करता है कि ये प्रावधान तभी लागू होंगे जब ऑपरेटर और आपूर्तिकर्ता के बीच व्यावसायिक करार में इसका स्पष्ट उल्लेख किया गया हो. दूसरे शब्दों में कहें तो करार को ही सर्वोपरि माना गया है.
यूपीए सरकार ने सौदा पलटने या हर्जाना वसूलने को करार से जोड़कर रखने का प्रावधान करने की कोशिश की थी. लेकिन बीजेपी की अगुआई में विपक्ष ने इस पर हंगामा खड़ा कर दिया और सरकार पर पिछले दरवाजे से बदलाव लाने का आरोप मढ़ दिया. यूपीए सरकार झुक गई और उसने नियमों में फेरबदल करके मुद्दा सुलझाने की कोशिश की. खासकर नियम 24 में आपूर्तिकर्ता के लिए समय सीमा तय करने की कोशिश की गई जो बहुत कुछ वारंटी की समय सीमा जैसा है. इसके साथ ही हर्जाने की रकम भी तय करने की कोशिश की गई कि रकम किसी भी सूरत में करार की राशि से अधिक नहीं होगी.
इस पर भी उस समय राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली ने, जो अब वित्त मंत्री हैं, आपत्ति उठाई थी. सितंबर 2013 में बीजेपी की वेबसाइट पर उन्होंने लिखा, “हालांकि नियम 24 का संबंध अधिनियम की धारा 17 (ए) से है, लेकिन धारा 17 (बी) की भाषा को जबरन उठाकर उत्पाद जवाबदेही अवधि की परिभाषा में जोड़ दिया गया है. इससे स्थिति अस्पष्ट हो गई कि धारा 17 (ए) और 17 (बी) को एक-दूसरे से जोड़कर पढ़ा जाएगा, अलग-अलग नहीं.”
अब साल भर बाद सत्तारूढ़ बीजेपी के सामने वही समस्या आ खड़ी हुई है, जो ऊर्जा क्षेत्र के लिए विदेशी निवेश को आकर्षित करने का प्रयास कर रही है ताकि भारत के परमाणु कार्यक्रम को इस कानून के दुष्प्रभावों से बचाया जा सके.
क्या है समाधान
अमेरिका ने यह मुद्दा मोदी सरकार के सामने उठाने का कोई अवसर नहीं छोड़ा, प्रधानमंत्री के वॉशिंगटन दौरे के दौरान भी इसे सीधे उठाया गया था. इसके बाद मुद्दे को सुलझाने के लिए अधिकारियों का एक विशेषज्ञ समूह बनाया गया. इस समूह की एक बैठक भी हो चुकी है और ओबामा के भारत दौरे से पहले ठोस समाधान के प्रयास में दूसरी बैठक भी होने वाली है. अगर दोनों पक्षों को मान्य कोई समाधान इस दौरान मिल जाता है तो अमेरिकी राष्ट्रपति के दौरे की यह सबसे बड़ी उपलब्धि होगी.
विदेशी और भारतीय आपूर्तिकर्ताओं की नजर में तो सबसे अच्छा विकल्प कानून में संशोधन करना ही होगा. लेकिन यह बीजेपी के लिए एक और मामले में पलटी मारने जैसा होगा, क्योंकि विपक्ष में रहते हुए उसने दूसरे कई मामलों की तरह ही इस मामले में भी अडिय़ल रुख अपनाया था. इस महीने के शुरू में दिल्ली में विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी द्वारा इस विषय पर आयोजित सेमिनार में अरुण जेटली ने इस पर ज्यादा कुछ बोलने से इनकार कर दिया. उनका कहना था कि इस पर आधिकारिक स्तर पर अभी विचार-विमर्श हो रहा है इसलिए वे ज्यादा कुछ बोलने की स्थिति में नहीं हैं. फिर भी उन्होंने यह जरूर कहा, “मैं सिर्फ इतना ही कह सकता हूं कि जब हम संसद में इस मुद्दे पर बहस कर रहे थे तो दूसरे पक्ष से हमें आश्वस्ति भरी प्रतिक्रिया नहीं मिली थी.”
पिछले साल भर से डीएई कानून में संशोधन किए बिना इस विवादास्पद समस्या का समाधान तलाशने की कोशिश में लगा है. इस दिशा में पहला कदम एक बीमा व्यवस्था तैयार करने का है जिससे सप्लायर और ऑपरेटर को जवाबदेही के लिए सुरक्षा हासिल हो जाए. इस तथ्य के मद्देनजर कि भारत अपने संयंत्रों के निरीक्षण की इजाजत नहीं दे सकता, किसी विदेशी बीमा कंपनी से संपर्क करने का विकल्प नहीं रह गया था. लिहाजा, जनरल इंश्योरेंस कंपनी (जीआइसी) से संपर्क किया गया लेकिन अड़चन यह पैदा हुई कि यह कंपनी 900 करोड़ रु. से अधिक का बीमा नहीं कर सकती जबकि कानून के तहत ऑपरेटर के लिए 1,500 करोड़ रु. तक के मुआवजे की सीमा तय की गई है. सो, यह सोचा गया कि बाकी 600 करोड़ रु. के ‘कैटास्ट्रोफ बॉन्ड’ जारी किए जा सकते हैं. इस विचार पर और सोच-विचार हुआ और उसे ठोस प्रस्ताव की शक्ल दी जा चुकी है. इस प्रस्ताव पर पिछले महीने अमेरिका से भी चर्चा की जा चुकी है.
मोटे तौर पर यह योजना दो स्तरों पर काम कर रही है. पहला भाग ऑपरेटर के लिए है, भारतीय संदर्भ में यह एनपीसीआइएल होगी. अंतरराष्ट्रीय नियमों के मुताबिक, किसी घटना के होने पर सारे संयंत्रों को बंद करना होगा, इसलिए यह जरूरत महसूस की गई कि ऑपरेटर को सारे संयंत्रों के लिए न सही, एक संयंत्र या अधिक से अधिक दो के लिए दुर्घटना बीमा लेना जरूरी है.
फिर, यह सुझाव दिया गया कि इतनी ही रकम की ऐसी ही व्यवस्था आपूर्तिकर्ताओं के लिए भी की जा सकती है. सभी पक्ष इसे सामान्य बीमा पॉलिसी ही मानेंगे, जो उनके द्वारा सप्लाई किए जाने वाले माल के अनुसार तय होगी.
फिलहाल तो इस मॉडल को स्वीकृति नहीं मिल पाई है. सप्लायर धारा 46 हटाने पर जोर दे रहे हैं, जबकि सरकार का जवाब यह है कि वह प्रावधान सप्लायरों को प्रभावित नहीं करता. लेकिन इस बात से सब सहमत हैं कि हर तरह की अस्पष्टता को दूर किया जाना चाहिए, एक प्रस्ताव यह है कि व्यावसायिक करार में इसका स्पष्ट उल्लेख होना चाहिए. परमाणु ऊर्जा आयोग के सदस्य आर.बी. ग्रोवर कहते हैं, “यह स्पष्ट है कि धारा 46 सप्लायर को किसी तरह प्रभावित नहीं करती और करार में इसका उल्लेख होना चाहिए लेकिन कानून करार की सर्वोच्चता को मान्यता दे.”
इससे दूसरी बहस शुरू हो सकती है कि क्या कानून में संशोधन किए बिना हल निकाला जा सकता है. लॉ कमिशन के अध्यक्ष ए.पी. शाह जैसे कानूनी दिग्गज तर्क देते हैं कि नियम 24 कानून की आत्मा का ही विरोधी है इसलिए यह कानूनसम्मत नहीं होगा. ऐसे परिदृश्य में सरकार के सामने पसोपेश की स्थिति है कि वह कानून में संशोधन किए बिना कैसे समाधान तलाश सकती है. अमेरिका में भारत के पूर्व राजदूत रोनेन सेन की राय है कि ओबामा के दौरे से घबराकर सरकार को समाधान तलाशने में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए. वे कहते हैं, “इस समय हमें कृत्रिम समय सीमा पर नहीं चलना चाहिए. इस पर फुरसत से विचार करना चाहिए. बेशक, सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि हम सिर्फ खरीदार-विक्रेता वाला संबंध रखना चाहते हैं या टेक्नोलॉजी का हस्तांतरण भी चाहते हैं?” काकोदकर कहते हैं, “अगर आप बड़े नहीं बन सकते तो ऐसे क्षेत्र में जा सकते हैं, जहां दूसरों के असर में रहेंगे.”
जाहिर है, सरकार के लिए यह महत्वपूर्ण रणनीतिक कार्य होगा जिस पर भारत का परमाणु भविष्य टिका है.
—साथ में मनु पब्बी
परमाणु ऊर्जा विभाग (डीएई) के पूर्व अध्यक्ष अनिल काकोदकर ने इंडिया टुडे को बताया, “मेरा ख्याल है कि उन्होंने (कच्चे माल की आपूर्ति करने वाले) इस आशय का पत्र भी लिखा है. भारत में परमाणु ऊर्जा क्षेत्र के विस्तार में बिलाशक यह एक बड़ी बाधा है. इसका कोई समाधान निकालना ही पड़ेगा वरना परमाणु कार्यक्रम को नुक्सान पहुंचेगा.”
समस्या की जड़ 2010 का असैनिक परमाणु क्षतिपूर्ति जवाबदेही अधिनियम है, जिसमें परमाणु दुर्घटना होने पर ऑपरेटर के साथ-साथ आपूर्ति करने वालों को भी जिम्मेदार ठहराने का प्रावधान है. अधिनियम की विवादास्पद धारा 17 (बी) के तहत कहा गया है कि अगर निर्माण की ‘प्रत्यक्ष या परोक्ष’ खराबी होने से कोई परमाणु दुर्घटना होती है तो ऑपरेटर को आपूर्ति करने वाले से सौदा पलटने का अधिकार है.
इसके अलावा कानून में धारा 46 में भी काफी कड़े प्रावधान हैं. यह धारा साफ कर देती है कि ऑपरेटर को किसी अन्य कानून के तहत भी राहत नहीं मिल सकती, जिसका सहारा पीड़ित अधिक मुआवजे की मांग के लिए ले सकता है. इस धारा में आपूर्ति करने वालों का विशेष उल्लेख नहीं किया गया है लेकिन आपूर्तिकर्ताओं की चिंता यह है कि दुर्घटना की हालत में दूसरे मुकदमों की भी संभावना बन जाती है.
क्या है समस्या
अधिनियम के ये दो प्रावधान भारतीय और विदेशी आपूर्तिकर्ताओं के लिए सबसे बड़ी बाधा बन गए हैं, जिससे परमाणु विस्तार योजनाओं के ठप्प पड़ जाने का खतरा पैदा हो गया है. अमेरिका की अगुआई में विदेशी रिएक्टर आपूर्तिकर्ताओं ने हर्जाने के इन प्रावधानों पर कड़ी आपत्ति उठाई है. न्यूक्लियर पावर कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (एनपीसीआइएल) के पूर्व अध्यक्ष एस.के. जैन कहते हैं, “अगर हमने इस बारे में जल्द ही कोई समाधान नहीं निकाला तो वर्तमान परमाणु संयंत्र भी मुसीबत में फंस जाएंगे. यह ऐसी समस्या है जिससे भारतीय और विदेशी, दोनों ही आपूर्तिकर्ता आशंकित हैं.”
भारत-अमेरिका परमाणु करार की एक अनिवार्य शर्त थी कि जवाबदेही तय करने वाला कोई कानून फौरन बनाया जाए. परमाणु कारोबार से जुड़े सभी पक्षों को व्यवसाय के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करने की खातिर विश्व स्तर पर एक सिद्घांत यह निकल कर आया कि किसी तरह की दुर्घटना होने पर जवाबदेही तय करने और मुकदमे के बारे में कुछ बातें तय की जाएं.
इस तरह बुनियादी सिद्घांत यह उभर कर आया कि दुर्घटना की हालत में किसी तरह के नुक्सान के लिए परमाणु संयंत्र का ऑपरेटर जिम्मेदार होगा. दुनिया भर में जवाबदेही तय करने का यही नियम सर्वमान्य हुआ है. इसका यह अर्थ भी हुआ कि आपूर्ति करने वाला दोषी नहीं माना जाएगा. जलवायु परिवर्तन के इस दौर में ऐसी व्यवस्था से परमाणु ऊर्जा को स्वच्छ ऊर्जा के रूप में विकसित करने में मदद मिली है.
इस दिशा में आगे बढ़ते हुए अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी ने भी इसी के आधार पर कन्वेंशन ऑन सप्लीमेंटरी कंपेंसेशन (सीएससी) नाम से आचार संहिता तैयार की है, जिसके अनुसार ऑपरेटर पर हर तरह की जिम्मेदारी डाल दी गई है. परमाणु करार के तहत भारत सीएससी नियमों जैसा ही विधेयक लाने को राजी हो गया था और कालांतर में कन्वेंशन में संशोधन करना था. केंद्र सरकार ने सीएससी पर हस्ताक्षर कर दिए हैं लेकिन अमेरिका का कहना है कि भारतीय नियम सीएससी मॉडल के अनुरूप नहीं हैं.
बड़े पैमाने पर देखें तो यह मुद्दा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस लक्ष्य के अनुरूप भी नहीं है कि भारत में कारोबार करने के लिए अनुकूल और सहज वातावरण तैयार किया जाएगा. अमेरिका को दो स्थानों पर रिएक्टर लगाने का आश्वासन दिया गया है, और वह मोदी सरकार पर समाधान तलाशने का दबाव बना रहा है. अब जब अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा गणतंत्र दिवस पर मुख्य अतिथि के रूप में आ रहे हैं, तो समाधान तलाशने के प्रयास तेज हो रहे हैं.
दक्षिण कोरिया एकमात्र दूसरा ऐसा देश है जहां परमाणु जवाबदेही संबंधी कानून में इस आशय के प्रावधान हैं कि परमाणु दुर्घटना होने पर ऑपरेटर को आपूर्तिकर्ता से सौदा पलटने और हर्जाना वसूलने का अधिकार है. लेकिन कोरिया का कानून यह भी स्पष्ट करता है कि ये प्रावधान तभी लागू होंगे जब ऑपरेटर और आपूर्तिकर्ता के बीच व्यावसायिक करार में इसका स्पष्ट उल्लेख किया गया हो. दूसरे शब्दों में कहें तो करार को ही सर्वोपरि माना गया है.
यूपीए सरकार ने सौदा पलटने या हर्जाना वसूलने को करार से जोड़कर रखने का प्रावधान करने की कोशिश की थी. लेकिन बीजेपी की अगुआई में विपक्ष ने इस पर हंगामा खड़ा कर दिया और सरकार पर पिछले दरवाजे से बदलाव लाने का आरोप मढ़ दिया. यूपीए सरकार झुक गई और उसने नियमों में फेरबदल करके मुद्दा सुलझाने की कोशिश की. खासकर नियम 24 में आपूर्तिकर्ता के लिए समय सीमा तय करने की कोशिश की गई जो बहुत कुछ वारंटी की समय सीमा जैसा है. इसके साथ ही हर्जाने की रकम भी तय करने की कोशिश की गई कि रकम किसी भी सूरत में करार की राशि से अधिक नहीं होगी.
इस पर भी उस समय राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली ने, जो अब वित्त मंत्री हैं, आपत्ति उठाई थी. सितंबर 2013 में बीजेपी की वेबसाइट पर उन्होंने लिखा, “हालांकि नियम 24 का संबंध अधिनियम की धारा 17 (ए) से है, लेकिन धारा 17 (बी) की भाषा को जबरन उठाकर उत्पाद जवाबदेही अवधि की परिभाषा में जोड़ दिया गया है. इससे स्थिति अस्पष्ट हो गई कि धारा 17 (ए) और 17 (बी) को एक-दूसरे से जोड़कर पढ़ा जाएगा, अलग-अलग नहीं.”
अब साल भर बाद सत्तारूढ़ बीजेपी के सामने वही समस्या आ खड़ी हुई है, जो ऊर्जा क्षेत्र के लिए विदेशी निवेश को आकर्षित करने का प्रयास कर रही है ताकि भारत के परमाणु कार्यक्रम को इस कानून के दुष्प्रभावों से बचाया जा सके.
क्या है समाधानअमेरिका ने यह मुद्दा मोदी सरकार के सामने उठाने का कोई अवसर नहीं छोड़ा, प्रधानमंत्री के वॉशिंगटन दौरे के दौरान भी इसे सीधे उठाया गया था. इसके बाद मुद्दे को सुलझाने के लिए अधिकारियों का एक विशेषज्ञ समूह बनाया गया. इस समूह की एक बैठक भी हो चुकी है और ओबामा के भारत दौरे से पहले ठोस समाधान के प्रयास में दूसरी बैठक भी होने वाली है. अगर दोनों पक्षों को मान्य कोई समाधान इस दौरान मिल जाता है तो अमेरिकी राष्ट्रपति के दौरे की यह सबसे बड़ी उपलब्धि होगी.
विदेशी और भारतीय आपूर्तिकर्ताओं की नजर में तो सबसे अच्छा विकल्प कानून में संशोधन करना ही होगा. लेकिन यह बीजेपी के लिए एक और मामले में पलटी मारने जैसा होगा, क्योंकि विपक्ष में रहते हुए उसने दूसरे कई मामलों की तरह ही इस मामले में भी अडिय़ल रुख अपनाया था. इस महीने के शुरू में दिल्ली में विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी द्वारा इस विषय पर आयोजित सेमिनार में अरुण जेटली ने इस पर ज्यादा कुछ बोलने से इनकार कर दिया. उनका कहना था कि इस पर आधिकारिक स्तर पर अभी विचार-विमर्श हो रहा है इसलिए वे ज्यादा कुछ बोलने की स्थिति में नहीं हैं. फिर भी उन्होंने यह जरूर कहा, “मैं सिर्फ इतना ही कह सकता हूं कि जब हम संसद में इस मुद्दे पर बहस कर रहे थे तो दूसरे पक्ष से हमें आश्वस्ति भरी प्रतिक्रिया नहीं मिली थी.”
पिछले साल भर से डीएई कानून में संशोधन किए बिना इस विवादास्पद समस्या का समाधान तलाशने की कोशिश में लगा है. इस दिशा में पहला कदम एक बीमा व्यवस्था तैयार करने का है जिससे सप्लायर और ऑपरेटर को जवाबदेही के लिए सुरक्षा हासिल हो जाए. इस तथ्य के मद्देनजर कि भारत अपने संयंत्रों के निरीक्षण की इजाजत नहीं दे सकता, किसी विदेशी बीमा कंपनी से संपर्क करने का विकल्प नहीं रह गया था. लिहाजा, जनरल इंश्योरेंस कंपनी (जीआइसी) से संपर्क किया गया लेकिन अड़चन यह पैदा हुई कि यह कंपनी 900 करोड़ रु. से अधिक का बीमा नहीं कर सकती जबकि कानून के तहत ऑपरेटर के लिए 1,500 करोड़ रु. तक के मुआवजे की सीमा तय की गई है. सो, यह सोचा गया कि बाकी 600 करोड़ रु. के ‘कैटास्ट्रोफ बॉन्ड’ जारी किए जा सकते हैं. इस विचार पर और सोच-विचार हुआ और उसे ठोस प्रस्ताव की शक्ल दी जा चुकी है. इस प्रस्ताव पर पिछले महीने अमेरिका से भी चर्चा की जा चुकी है.
मोटे तौर पर यह योजना दो स्तरों पर काम कर रही है. पहला भाग ऑपरेटर के लिए है, भारतीय संदर्भ में यह एनपीसीआइएल होगी. अंतरराष्ट्रीय नियमों के मुताबिक, किसी घटना के होने पर सारे संयंत्रों को बंद करना होगा, इसलिए यह जरूरत महसूस की गई कि ऑपरेटर को सारे संयंत्रों के लिए न सही, एक संयंत्र या अधिक से अधिक दो के लिए दुर्घटना बीमा लेना जरूरी है.
फिर, यह सुझाव दिया गया कि इतनी ही रकम की ऐसी ही व्यवस्था आपूर्तिकर्ताओं के लिए भी की जा सकती है. सभी पक्ष इसे सामान्य बीमा पॉलिसी ही मानेंगे, जो उनके द्वारा सप्लाई किए जाने वाले माल के अनुसार तय होगी.
फिलहाल तो इस मॉडल को स्वीकृति नहीं मिल पाई है. सप्लायर धारा 46 हटाने पर जोर दे रहे हैं, जबकि सरकार का जवाब यह है कि वह प्रावधान सप्लायरों को प्रभावित नहीं करता. लेकिन इस बात से सब सहमत हैं कि हर तरह की अस्पष्टता को दूर किया जाना चाहिए, एक प्रस्ताव यह है कि व्यावसायिक करार में इसका स्पष्ट उल्लेख होना चाहिए. परमाणु ऊर्जा आयोग के सदस्य आर.बी. ग्रोवर कहते हैं, “यह स्पष्ट है कि धारा 46 सप्लायर को किसी तरह प्रभावित नहीं करती और करार में इसका उल्लेख होना चाहिए लेकिन कानून करार की सर्वोच्चता को मान्यता दे.”
इससे दूसरी बहस शुरू हो सकती है कि क्या कानून में संशोधन किए बिना हल निकाला जा सकता है. लॉ कमिशन के अध्यक्ष ए.पी. शाह जैसे कानूनी दिग्गज तर्क देते हैं कि नियम 24 कानून की आत्मा का ही विरोधी है इसलिए यह कानूनसम्मत नहीं होगा. ऐसे परिदृश्य में सरकार के सामने पसोपेश की स्थिति है कि वह कानून में संशोधन किए बिना कैसे समाधान तलाश सकती है. अमेरिका में भारत के पूर्व राजदूत रोनेन सेन की राय है कि ओबामा के दौरे से घबराकर सरकार को समाधान तलाशने में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए. वे कहते हैं, “इस समय हमें कृत्रिम समय सीमा पर नहीं चलना चाहिए. इस पर फुरसत से विचार करना चाहिए. बेशक, सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि हम सिर्फ खरीदार-विक्रेता वाला संबंध रखना चाहते हैं या टेक्नोलॉजी का हस्तांतरण भी चाहते हैं?” काकोदकर कहते हैं, “अगर आप बड़े नहीं बन सकते तो ऐसे क्षेत्र में जा सकते हैं, जहां दूसरों के असर में रहेंगे.”
जाहिर है, सरकार के लिए यह महत्वपूर्ण रणनीतिक कार्य होगा जिस पर भारत का परमाणु भविष्य टिका है.
—साथ में मनु पब्बी

