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डार्क मोड

सेक्स सर्वे 2015: कॉलेज कैंपस में सेक्स से जुड़े कारनामे

सेंट स्टीफेंस कॉलेज के एक छात्र देवांश मेहता ने जब एक अनाम सेक्स सर्वे शुरू किया तो कैंपस में खलबली मच गई और उसे सबक मिला कि इस वर्जना को कैसे तोड़ा जा सकता है.

अपडेटेड 13 जनवरी , 2015
हम सब ने कभी न कभी अपने माता-पिता से एक सवाल जरूर पूछा होगा कि हम पैदा कैसे हुए थे. मेरे माता-पिता ने इसके जवाब में मुझे एक हंस की कहानी सुनाई थी, जो नदी में एक कंकड़ डालता था. बदले में उससे एक बच्चा निकालता था और ‘‘भगवान की मर्जी के हिसाब से तय समय पर’’ माता-पिता को सौंप देता था. मेरे लिए प्रजनन का मतलब काफी लंबे समय तक यही था.

ऐसे मामलों पर माता-पिता के संकोच से जो बच जाता, वह कमी मुंबई के स्कूल पूरी कर देते थे, जहां सेक्स शिक्षा तो नहीं ही थी, जीव विज्ञान के शिक्षक भी बहुत झेंपू थे. हम दोस्तों के बीच गंभीर बहसों के लिए सेक्स एक दुर्लभ विषय रहा. पुसी, जी-स्पॉट, सेक्स या हस्तमैथुन जैसे शब्द अक्सर बड़ी चतुराई से लतीफों में पंचलाइन के तौर पर इस्तेमाल किए जाते थे, जिन्हें समझने का मैं नाटक करता रहता था. बच्चे कैसे पैदा होते हैं, यह बात मुझे 13 साल की उम्र में समझ में आई.

हालांकि दिल्ली के सेंट स्टीफेंस कॉलेज में सब कुछ बदल गया. मुझे हॉस्टल में कमरा मिल गया था. आप में से जो भी छात्रावास में रहे हैं, वे यहां होने वाली रैगिंग, गाली-गलौज और भद्दे मजाकों से वाकिफ होंगे, जहां हर शब्द अश्लील व्यंजनाओं की खुराक बन जाता है. मैंने ऐसी बातें पहले कभी नहीं सुनी थीं. लिहाजा अधिकतर मौकों पर मैं चुप ही रहता था.
कॉलेज कैंपस में सेक्स के कारनामे
पहली बार सेक्स का ज्ञान मुझे तब मिला, जब मेरे सीनियरों ने मुझे एक वीडियो दिखाया. वे मुझसे कहते थे, ‘‘ओय बंबई के गुज्जू, तू अभी तक छड़ा ही है?’’ ‘‘तूने हस्तमैथुन भी नहीं किया?’’ हर बार वे मुझसे ये सब पूछते और मैं शर्मिंदा हो जाता.

कॉलेज की पहली गर्मियों में मैंने सोचा कि यह पता किया जाए कि क्या मैं अपने किस्म का अकेला इनसान हूं? मैं खुद चीजों को जानना चाहता था. इसके लिए मैंने एक अनाम सेक्स सर्वे शुरू किया. इसकी प्रेरणा मुझे कॉलेज के ब्लॉग (एसएससी शॉट्स) के ‘‘कनफेशंस पेज’’ (आत्मस्वीकृतियों का पन्ना) से मिली, जहां एक जोड़ा अलग हो गया था और लड़की ने सॉरी कहते हुए एक पोस्ट लिखी थी.

दरअसल, उसने सेक्स के दौरान लड़के का हाथ पलंग के साथ हथकड़ी से बांध दिया था. लड़की का कहना था कि ऐसा करके उसे बहुत मजा आया. लेकिन सारा मजा तब काफूर हो गया, जब उसे पता पला कि हथकड़ी की चाबी गुम हो चुकी थी. समस्या ज्यादा बड़ी इसलिए हो गई क्योंकि लड़के को जोर की पेशाब लगी थी और लड़की के मां-बाप कुछ देर में घर पहुंचने वाले थे.

मजबूरी में लड़के को बाल्टी में पेशाब करनी पड़ी और डेढ़ घंटे बाद उन्हें चाबी मिली, जब मां-बाप पहुंचने ही वाले थे. इसके बाद ही मेरे दिमाग में ऐसे तमाम दुस्साहसिक सेक्स कारनामों को जुटाने का ख्याल आया.

कॉलेज कैंपस में सेक्स के कारनामेसर्वे में बहुत वस्तुपरक सवाल पूछे गए थे, लेकिन अपने तजुर्बों के बारे में विवरण देने के लिए भी इसमें जगह थी. मसलन, ‘‘आप कितनी बार हस्तमैथुन करते हैं’’ के जवाब में एक लड़के ने कमेंट में लिखा, ‘‘गिनता नहीं हूं.’’

मेरा दोस्त भूषण मुझे अपने अनुभव के बारे में बताने वाला पहला व्यक्ति था. वह जब 14 साल का था, तब उसकी बहन की दोस्त, जो उससे उम्र में पांच साल बड़ी थी, उसने उसके साथ सेक्स की पहल की थी. फिर यह अक्सर ही होने लगा. वह लड़कियों को आकर्षित करने की अपनी कला का श्रेय अब भी इस शुरुआती अनुभव को ही देता है. (अभी वह 21 साल का है और 12 लड़कियों के साथ संबंध बना चुका है). मेरे एक सहपाठी प्रशांत ने बताया कि कैसे उसने एक बार 24 घंटे में 10 बार सेक्स किया था.

एक और क्लासमेट जैकब ने बताया कि जब उसका किसी लड़की के साथ संबंध चल रहा होता है, उस दौरान वह हस्तमैथुन नहीं करता क्योंकि इसे वह उसके साथ धोखा मानता है. हां, जब वह अकेला होता है, तब दिन में तीन बार हस्तमैथुन करता है. टीना ने मुझे बताया कि कैसे उसने हस्तमैथुन की कोशिश की, लेकिन नाकाम रही क्योंकि ‘‘उसे पता ही नहीं था कि क्या करना होता है.’’

उसकी सबसे अच्छी सहेली ने बताया कि क्लाइमैक्स पर पहुंचने में उसे कभी-कभार पौन घंटा या उससे ज्यादा वक्त लग जाता है. हो सकता है, यही वजह हो कि एक लड़की ने ‘‘हस्तमैथुन के बाद आप कैसा महसूस करते हैं’’ के जवाब में लिखा था, ‘‘कभी भी संतुष्ट नहीं.’’ जबकि दूसरी ने लिखा, ‘‘थकान.’’ इससे यह समझ में आता है कि सर्वे में शामिल 48 में से 29 लड़कियों ने क्यों कहा कि उन्होंने कभी हस्तमैथुन की कोशिश ही नहीं की है.

सभी हालांकि इतने खुले हुए नहीं थे. कुछ ने तो बड़ी विनम्रता से जवाब देने से इनकार कर दिया और कुछ और थे, जो मुझे चिपकू समझ रहे थे. अनु ने शीट भरने से मना कर दिया क्योंकि उसे इस बारे में सोचकर ही शर्म आती थी. अर्जुन ने पहले तो इनकार किया. फिर तैयार हुआ और तीन दिन बाद सर्वे भरकर दे दिया. कुछ ने सीधे कह डाला कि इससे मुझे कोई मतलब नहीं होना चाहिए.

इस सर्वे ने स्टीफेंस के छात्रों को अपने सेक्स जीवन के बारे में आपस में संवाद करने का एक रास्ता मुहैया कराया. कुछ सवाल इस बारे में थे कि अपने माता-पिता से वे कितना खुले हुए हैं. मुझे यह जानकर हैरत हुई कि सिर्फ 10 फीसदी लड़के-लड़कियां अपने माता-पिता से हस्तमैथुन की बात करते हैं.

अधिकतर इस नीति पर काम करते थे कि ‘‘न पूछो, न बताओ’’. मुझे यह जानकर हैरत हुई कि 37 फीसदी लड़के अपने रिश्तों के बारे में अभिभावकों से बात करते हैं और ‘‘दोनों को बताते हैं.’’ सिर्फ 25 फीसदी लड़कियां माता और पिता, दोनों में विश्वास करती हैं और 18 फीसदी सिर्फ  अपनी मां से खुली हुई हैं.

यह जानना दिलचस्प था कि मेरे कॉलेज में हस्तमैथुन शुरू करने की लड़कों की औसत उम्र 14 साल थी, जबकि लड़कियों के लिए 16 साल थी. इसके अलावा सर्वे में शामिल 35 लड़कों में से सिर्फ एक था, जिसने कहा कि उसने कभी हस्तमैथुन नहीं किया है. मैंने पाया कि करीब 50 फीसदी लड़कों को हस्तमैथुन के बाद ‘‘संतुष्टि’’ मिलती है, जबकि लड़कियों में ऐसा महसूस करने वाली सिर्फ एक तिहाई थीं. इस मसले पर दूसरा सर्वाधिक लोकप्रिय जवाब लड़कियों की ओर (14 फीसदी) से यह था कि ‘‘जैसे मैंने वक्त बरबाद कर दिया हो.’’

अब सवाल उठता है कि इस सेक्स सर्वे को करने के बाद क्या हाल है. सेक्स जीवन के बारे में किए गए सवालों ने हमें कई वर्जनाओं के पार जाने का मौका दिया. हम हंसते, लतीफे बनाते और गंभीर बातें भी करते थे. मैंने तो अपने फिलॉसफी के प्रोफेसर तक से यह पूछ डाला कि उनका सेक्स जीवन कैसा है, जिसके जवाब में उन्होंने कहा कि सेक्स एक उबाऊ और दुहराव वाला काम है और ‘‘इसकी बजाए वे सोना पसंद करते हैं.’’

सर्वे से मैंने जाना कि सेक्स एक अनावश्यक बोझ और वर्जना है, जिसे हम अपने संवादों में ढोते रहते हैं. खासकर विपरीत लिंग के लोगों के संदर्भ में. बस एक छोटी-सी कोशिश, कुछ सवालों और हंसी की जरूरत है, जिससे आप सेक्स नाम के इस राक्षस को हमेशा के लिए खत्म कर सकते हैं.
-साथ में इंद्र शेखर सिंह
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