जब दुनिया का हर पत्रकार और टिप्पणीकार पेरिस में हुए कत्लेआम पर अपना पाला तय कर रहा हो, ऐसे में यह स्तंभ इस बिरादराना एका से दूरी नहीं बनाना चाहेगा. एक बात तो तय है कि पिछले कुछ समय से आतंकियों के निशाने पर ऐसे पत्रकारों का आना चलन-सा बन गया है जो उनके आड़े आते हैं.
दूर क्यों जाना, पड़ोस के पाकिस्तान में ही वॉल स्ट्रीट जर्नल के डेनियल पर्ल का कैसे सिर कलम कर दिया गया था जबकि उनका हत्यारा फांसी की सजा मिलने के बावजूद जेल से ही ऐसी और वारदात को अंजाम देने की साजिश मोबाइल से रच रहा है. भारत में पत्रकारिता पर पहला बड़ा हमला अस्सी के दशक में पंजाब में देखने में आया था जब भिंडरांवाले के लोगों ने न सिर्फ कुछ चुनिंदा अखबारों के संपादकों, मालिकों और रिपोर्टरों को बल्कि हॉकरों और वेंडरों तक को मार डाला था.
सबसे बड़ी हत्या हिंदी दैनिक पंजाब केसरी के मालिक और संपादक लाला जगत नारायण की हुई थी और उनके बाद अखबार संभालने वाले उनके बेटे रमेश चंदर को भी मार दिया गया था. अखबार के मौजूदा संपादक अश्विनी कुमार चोपड़ा (मिन्ना) करनाल से बीजेपी सांसद हैं जो आज भी भारी सुरक्षा के साये में चलते हैं.
इस्लामी जगत को हालांकि कुछ ज्यादा ही जवाब देना होगा. पुरानी दलीलें अब किसी को राजी नहीं कर पातीं कि ऐसी आतंकी हरकतों को कुछ मुट्ठी भर दहशतगर्द अंजाम देते हैं, लिहाजा समूचे समुदाय को दोषी नहीं ठहराया जा सकता या फिर यह कि इस्लाम में निर्दोषों की जान लेना मना है.
अधिकतर लोग इसे बहुत लचर तर्क मानते हैं. यह अब कारगर नहीं है क्योंकि एक के बाद एक घट रही ऐसी सिलसिलेवार घटनाओं ने साबित किया है कि 'नरम’ इस्लामी जगत और उसके प्रतिनिधि अहम देशों और उनके नेताओं की ओर से की जाने वाली निंदा शायद ही कभी बेशर्त रही हो. उनकी ओर से हमेशा ही 'बुनियादी कारणों’ पर प्रत्याशित किस्म की बात होती है और आतंक के खिलाफ पूरी दुनिया के एक हो जाने जैसे मासूम बयान सुनने में आते हैं.
उनका यह रवैया तब ज्यादा जाहिर होता है जब आतंक का शिकार कोई ऐसा शख्स होता है जिसने कथित तौर पर आस्था को चोट पहुंचाई हो. पेरिस हत्याकांड के तुरंत बाद भी यही नजारा देखने को मिल रहा है. बाकी समूची दुनिया इसके खिलाफ जहां बराबर आक्रोश में है, वहीं सबसे ताकतवर इस्लामी देशों जैसे पाकिस्तान, मिस्र, ईरान, सऊदी अरब और यूएई के नेताओं ने कोई प्रतिक्रिया दी भी है तो वह बेहद सतर्कतापूर्ण है.
ध्यान दें कि इनमें से कई देशों में खुद ऐसे बर्बर ईश-निंदा कानून मौजूद हैं जिनके तहत वैसे भी पेरिस के कार्टूनिस्टों को फांसी पर चढ़ा दिया जाता. सलमान रुश्दी के खिलाफ ईरान के फतवे पर शायद ही कभी इस्लामी नेताओं और विद्वानों ने सवाल उठाया होगा और ऐसा तब है जबकि उनमें से शायद ही किसी ने उन कथित अपमानजनक अध्यायों को पढ़ा हो या फिर (मेरे ही जैसे) जादुई यथार्थवाद को समझने की सलाहियत रखता हो.
अमेरिका में 9/11 के हमले पर आपको ''पश्चिम द्वारा मुसलमानों को प्रताडि़त किए जाने का बोध” जैसे तर्क मिल सकते हैं. भारत में 26/11 और उसके जैसी घटनाओं के लिए तो कश्मीर से शुरू करके गुजरात 2002 तक तमाम बहाने गिनाए जा सकते हैं. आप एकाध दिन बस इंतजार करिए और शार्ली एब्दो पर भी ऐसी ही दलीलें सुनने में आएंगी. सवाल उठता है कि क्या उन्होंने वाकई कार्टून में ज्यादती की थी?
उनकी नीयत निंदा करने की रही हो या नहीं, लेकिन क्या उन्हें जान-बूझकर एक महान धर्म को चोट पहुंचाने वाली हरकतें करके खुद को आजादी और शिष्टता की अंतिम सरहद पर धकेल देने की कोई जरूरत थी? जाहिर है, ऐसे तमाम सवालों के साथ एक पुछल्ला हमेशा जुड़ा रहेगा कि ''आतंक चाहे जैसा हो बुरा होता है,” ''किसी को भी किसी की जान लेने का हक नहीं है,” वगैरह. मैं बहुत सोच-विचार कर कह रहा हूं कि इस्लामी जगत में तो कोई भी आपको ऐसा नहीं मिलने वाला जो इन पत्रकारों के लिए 'बेकसूर’ शब्द का इस्तेमाल कर सके.
उपर्युक्त तथ्यों और इतिहास के मद्देनजर जो कुछ भी स्वाभाविक रूप से तर्कपूर्ण लगता है, वही किया जाना आसान भी है—यानी दुनिया भर में उठे आक्रोश का हिस्सा बनाया जाए, अभिव्यक्ति की आजादी के साथ एकजुटता दिखाई जाए, फिर इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उससे चोट किसे पहुंची है.
मुझे याद है कि 1989 में मैंने इस पत्रिका के लिए रुश्दी के फतवे पर कवर स्टोरी की थी और लियोन वीसेल्शियर का एक खतरनाक उद्धरण इस्तेमाल किया था जो द न्यू रिपब्लिक के साहित्य संपादक हुआ करते थे, ''मैं कुफ्र के लिए ईश्वर का शुक्रगुजार हूं क्योंकि कुफ्र ने ही हमें मुक्त किया है.”
मैं रुश्दी के लिखने की आजादी के साथ खड़ा हूं, लेकिन अभिव्यक्ति की आजादी के साथ एकजुटता दिखाने के लिए क्या मैं उसे छापूंगा भी? मैं ऐसा नहींकर पाऊंगा. क्या मैं कुफ्र के बचाव में दिए गए वीसेल्शियर के उस आक्रामक कथन को छपने से रोक दूंगा? कतई नहीं. क्या मैं ऐसा कुछ लिखूंगा, छापूंगा जिसे वास्तव में कोई पंथ ईश-निंदा मानता हो? मेरा जवाब फिर ना होगा.
अब आप मेरी दलील के दोनों सिरों को शायद पकड़ पा रहे होंगे. अभिव्यक्ति की आजादी के प्रति मेरी वचनबद्धता संपूर्ण और बेशर्त है. मैं आपकी बोलने की आजादी के अधिकार की रक्षा किसी भी कीमत पर करता रहूंगा, भले ही मैं खुद उससे असहमत हूं और इसे खींचते हुए मैं यह भी कहना चाहूंगा कि मेरे असहमत होने का अधिकार उतना ही अक्षुण्ण है जितना आपकी अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार. इस हफ्ते एक घटना पर उबलती हुई दुनिया में अब मैं जो बात कहने जा रहा हूं, उसमें थोड़ा जोखिम है: मैं उन कार्टूनों को दोबारा छापकर अभिव्यक्ति की आजादी के साथ एकजुटता दिखाने और हत्यारों पर उंगली उठाने से विनम्रतापूर्वक इनकार करता हूं.
और मैं #JeSuisCharlie (मैं चार्ली हूं) हैशटैग के साथ ट्वीट भी नहीं करूंगा. अगर मुझे फिर भी इस मसले पर एक पाला चुनने को कहा गया, तो बड़ी मुश्किल से जिंदगी में कमाई अपनी उदार और सेकुलर हैसियत (आजकल लिबरल और सेकुलर को वैसे भी लिबटार्ड और सिक्युलर कह कर गाली देते हैं) को दांव पर लगा दूंगा और कहूंगा- -I Am NOT Charlie. फिर भी, मैं चार्ली की अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार की रक्षा करूंगा, चाहे वे कार्टून कितने भी बुरे क्यों न रहे हों.
जब पाले खींच दिए गए हों और आपको बस इतना तय करना होता हो कि आप किसी चीज के विरोध में हैं या पक्ष में, वैसे में कोई जटिल या सुविचारित दलील देना खतरनाक होता है. फिर भी मैं कहना चाहूंगा कि एक तरफ अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार की पूरी तरह रक्षा करना और दूसरी ओर एकजुटता में चलाए गए हैशटैग से ट्वीट करना अपने आप में विरोधाभासी बातें हैं.
आपको सामने वाले की बोलने की आजादी का समर्थन करते हुए उसकी आलोचना करने की सामर्थ्य होनी चाहिए. आप पर यह दबाव नहीं होना चाहिए कि आप उससे सहमत हों या उसके शब्द या कार्टून को दोहराएं. किसी की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करने का मतलब यह नहीं होता कि आपको उसके कहे की अंतर्वस्तु के साथ सहमत ही होना है.
मुझे अपनी इस राय पर वाम, दक्षिण और मध्यमार्गियों की ओर से तितरफा गाली सुननी पड़ेगी, इसलिए मैं यहीं बिल्कुल साफ कर देना चाहता हूं कि किसी भारतीय पत्र का संपादक होने की स्थिति में मैं इन कार्टूनों को नहीं छापता क्योंकि ये उसके लायक नहीं हैं, अनावश्यक रूप से घातक हैं और मनोरंजक तो बिल्कुल भी नहीं हैं. जिस तरह मैं हैशटैग से विनम्रतापूर्वक इनकार कर रहा हूं, वैसे ही मैं अपनी उदार और सेकुलर वचनबद्धता को दिखाने के लिए सोशल मीडिया पर भी इन कार्टूनों को नहीं छापूंगा.
यह बात मैंने कई बार कही है और यह एक ऐसा सार्वभौमिक सत्य है कि एक संपादक के हाथों में सबसे बड़ी ताकत और जिम्मेदारी यह फैसला करने की होती है कि वह क्या छापेगा और क्या नहीं छापेगा, दोनों की ही कीमत उसे चाहे जो चुकानी पड़े. कोई चीज जान-बूझकर आस्था को चोट पहुंचाने के लिए बनाई गई है तो मैं हाथ जोड़कर इनकार कर दूंगा. लेकिन यदि कहीं और ऐसा कुछ छापने पर आपको निशाना बनाया जाता है तो मैं आपकी रक्षा करने के लिए मोर्चे पर डटा रहूंगा.
मेरे इस पक्ष पर कुछ स्वाभाविक सवाल उठाए जाएंगे जिन्हें मैं पहले ही यहां गिनवा देता हूं. उन मुद्दों का क्या जिन पर दूसरे धर्मों के लोग, खासकर हिंदू आहत महसूस करते हैं? जो लोग हिंदू भगवानों का अपमान करते हैं वे इस्लाम और ईसाइयत को निशाना क्यों नहीं बनाते? इतना ही बता दीजिए कि आमिर खान और पीके पर आपकी क्या राय है? उनके बारे में क्या कहना है जो रामायण और महाभारत की विश्वसनीयता पर सवाल उठा रहे हैं?
एम.एफ.. हुसैन और हिंदू देवियों की उनकी बनाई तस्वीरों का क्या हो? जहां तक मेरे विवेक का सवाल है, वही संपादकीय छननी मैं इनमें भी लगाऊंगा, जो शार्ली एब्दो के कार्टूनों के मामले में मैंने इस्तेमाल की है. जिसको जो कुछ भी करना हो या कहना हो, मैं उसकी आजादी की रक्षा करूंगा, पर मैं कुछ से सहमत हो सकता हूं, कुछ को महज स्वीकार कर सकता हूं और अन्य की आलोचना कर सकता हूं.
इसीलिए पीके का बचाव करने में मुझे कोई दिक्कत नहीं है क्योंकि यह फिल्म एलियन के मुताबिक 'भगवानों के प्रबंधकों’ यानी बाबाओं पर हमला करती है और आजकल तो वैसे भी यह प्रजाति बदनाम है, भले ही सारे जेल में न भी हों तो क्या. जहां तक हिंदू रूढिय़ों, अंधविश्वासों, मूर्तिपूजा और रीति-रिवाजों पर हमले का सवाल है, तो इसमें कुछ भी ऐसा नया नहीं है जो बीती सदियों में महान सुधारकों ने हमें न सिखाया हो, चाहे गौतम बुद्ध रहे हों, गुरुनानक या फिर महर्षि दयानंद.
हिंदू धर्म सहिष्णु, रूढ़िमुक्त और बदलाव के लिए खुला रहा है, यही वजह है कि इसका फैलाव हुआ है और यह फला-फूला है. ऐसा इसलिए है क्योंकि हिंदू धर्म आलोचनाओं और नए विचारों के लिए खुला हुआ था और इसने सब कुछ को अपने भीतर पचा लिया.
हुसैन के मामले में जरूर पिछले साल बंगलुरू लिटरेचर फेस्टिवल में मेरे कहे पर त्योरियां चढ़ गई थीं. मेरे हिसाब से हुसैन बेशक हिंदू देवियों की तस्वीरों को बनाने के लिए आजाद थे, लेकिन जिनकी आस्था आहत हुई उन्हें भी तो प्रदर्शन करने और अदालत में जाने का अधिकार था, बशर्ते वे ऐसा शांतिपूर्ण तरीके से करते. उदार लोकतंत्रों की खूबसूरती दरअसल इसी में है कि उनमें आपको विरोध करने का अधिकार होता है.
सुप्रीम कोर्ट ने हुसैन का उत्पीडऩ रोकने के लिए उनके खिलाफ मुकदमों को एक जगह दिल्ली की एक अदालत में केंद्रित करके सही निर्णय लिया था. उस वक्त सेकुलर यूपीए सरकार थी और बेहतर होता अगर वे यहीं रुककर इंसाफ के लिए लड़ते, बजाए इसके कि इन मुकदमों को उन्होंने एक ऐसे देश में अपने स्थायी प्रवास का बहाना बना डाला जहां धार्मिक आजादी का सूरज तो कम से कम नहीं ही चमकता है.
बिल्कुल इसी तर्ज पर मैंने कहा था कि दीपा मेहता ने एक हिंदू मध्यवर्गीय परिवार में प्रेम से वंचित दो महिलाओं के बीच समलैंगिक रिश्ते दिखाकर कुछ भी गलत नहीं किया. यह कोई अपराध नहीं था, लेकिन क्या शबाना आजमी और नंदिता दास का नाम सीता और राधा रखना जरूरी था?
किसी आस्था पर चोट के लिए उदारवाद की आड़ लेने से उपजा विवाद आपको प्रचार, यश और व्यावसायिक कामयाबी दिला देगा. उदार लोकतंत्रों में आहत लोगों को कानून के दायरे में विरोध करने का अधिकार मिल जाएगा. हां, अगर कोई आप पर हिंसा करता है, तब मैं आपकी रक्षा में खड़ा हो जाऊंगा. इसके बावजूद मैं इस बिरादरी के साथ चिपके रहने के लिए मुलम्मा अपने ऊपर नहीं चढ़ाऊंगा, चाहे वह #AmHusain का हैशटैग हो या #AmCharlie.

