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डार्क मोड

आतंक की राह पर भटके युवाओं को गुप्तचर एजेंसिया पढ़ाएंगी ऑनलाइन पाठ

इंटरनेट पर आतंक की दीक्षा पा रहे भटके हुए युवाओं को पटरी पर लाने के लिए गुप्तचर एजेंसियां अब पढ़ाएंगी अपना ऑनलाइन पाठ. गुप्त तरीके से रखी जाएगी नजर.

अपडेटेड 13 जनवरी , 2015
जब गूगल के हैदराबाद कार्यालय में काम कर चुके एक 30 वर्षीय इंजीनियर मुनावाद सलमान को पिछले साल अक्तूबर में शहर के हवाई अड्डे से गिरफ्तार किया गया, तब पुलिस का दावा था कि वह सऊदी अरब जा रहा था. वहां से उसकी योजना इराक जाकर जिहादी आतंकी समूह इस्लामिक स्टेट ऑफ  ईरान ऐंड सीरिया (आइएसआइएस) में शामिल होने की थी.

बाद में सलमान को छोड़ दिया गया. उसने आइएसआइएस की प्रचार सामग्री को कथित तौर पर कई महीनों तक इंटरनेट पर पढ़ा था और उसके बाद वहां जाने का का मन बनाया. यहीं पर कहानी नया मोड़ ले लेती है. इस किस्म के कई ऑनलाइन चैट और संवाद सत्र दरअसल गुप्तचर कर्मियों के साथ हो रहे थे जो सलमान जैसे युवाओं को छान मारने के लिए नेट पर अपना जाल बिछाए हुए हैं. उनकी तलाश में वैसे युवा थे जिन्हें आतंकी समूहों में लाने के लिए ऑनलाइन दीक्षा दी जा रही है. भारतीय गुप्तचर एजेंसियों का यह ताजा काउंटर इंटेलिजेंस प्रोग्राम है जिसे नाम दिया गया है ‘ऑपरेशन चक्रव्यूह’. अभी यह विचार विकास के चरण में है लेकिन यह एक ऐसी रणनीति है जिसका वक्त आ चुका है.

ऑपरेशन चक्रव्यूह के बारे में एक काउंटर इंटेलिजेंस एजेंसी के एक सदस्य ने इंडिया टुडे को बताया, “अफसर जिहादी समूहों की पहचान के साथ अपने खाते खोलते हैं और फेसबुक, याहू या अन्य चैट मंचों पर ऐसे युवाओं को लुभाने की कोशिश करते हैं जो ऑनलाइन आतंकी प्रचार सामग्री से प्रभावित हों. शुरुआती बातचीत के बाद जिनके बारे में यह पता लगता है कि वे जिहाद करने में दिलचस्पी रखते हैं, उन्हें अलग चैट रूम में ले जाया जाता है या फिर ईमेल के जरिए राब्ता कायम करने के लिए कहा जाता है.”

उस गुप्तचर अधिकारी ने बताया कि सलमान उनकी चपेट में तब आया जब एजेंसियों ने आइएसआइएस के मुखिया अबू बक्र अल बगदादी की तस्वीर लगाकर एक चैट रूम शुरू की और इस जिहादी समूह से संबद्ध होने का दावा किया, जिसका काम इच्छुक अभ्यर्थियों की भर्ती करना है. एक बार जब ऐसे लोगों की स्पष्ट शिनाख्त हो जाती है, फिर उनकी असली पहचान, विवरण आदि पता करने और उन पर निगाह रखने का काम बचता है.

सलमान को ऐसे ही पकड़ा गया था. इसी तरीके से पिछले छह माह में करीब 120 युवाओं की पहचान की गई है जो आइएसआइएस में जाने के इच्छुक थे. फिलहाल कार्रवाई करने में खुद को अक्षम पाने के कारण एजेंसियों ने अभी सिर्फ उन पर अपनी निगरानी बनाए रखी है.

पिछले साल दिसंबर में गिरफ्तार किए गए बेंगलूरू के इंजीनियर मेहदी मसरूर बिस्वास जैसे आइएसआइएस के समर्थकों की ओर से ट्विटर के दुरुपयोग ने बहुत से लोगों के लिए ‘ऑनलाइन आतंक प्रशिक्षण’ नाम के एक पिटारे को खोल दिया है. लेकिन गृह मंत्रालय ने ऐसे मामलों पर अभी संयम बरतते हुए इससे दूसरे तरीके से निबटने का फैसला किया है. आतंकी समूहों की ओर से युवाओं के ऑनलाइन प्रशिक्षण पर निगरानी रखने और उन्हें पहचानने के लिए चलाए गए ऑपरेशन चक्रव्यूह के अगले चरण के तौर पर मंत्रालय के आंतरिक सुरक्षा विभाग को एक राष्ट्रीय कार्यक्रम तैयार करने को कहा गया है. उसका प्राथमिक जोर इंटरनेट पर मौजूद जिहादी प्रचार सामग्री से निबटना होगा. 
आतंक के खिलाफ जंगपिछले साल नवंबर में पुलिस महानिदेशकों के सालाना सम्मेलन में गुवाहाटी में इस विचार को विस्तार से प्रस्तुत किया गया था. वहां इंटेलिजेंस ब्यूरो ने काउंटर-रेडिकलाइजेशन और डी-रेडिकलाइजेशन प्रोग्राम की जरूरत पर विस्तार से अपनी बात रखी. पुलिस प्रमुख इस बात से सहमत थे कि साइबर स्पेस पर निगरानी रखने में ज्यादा क्षमता विकसित करने की जरूरत है. और इसके लिए एक उलट प्रचार सामग्री तैयार करके उसे इंटरनेट पर प्रचारित किया जाना चाहिए ताकि युवाओं को आतंकियों के चंगुल में फंसने से रोका जा सके.
 
पहले भी ऐसे प्रयास किए गए हैं. ऑनलाइन जिहाद पर निगरानी रखने के लिए एक प्रयास तो इसलिए नाकाम हो गया था क्योंकि यह नेशनल टेक्निकल रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन (एनटीआरओ), आइबी और रिसर्च ऐंड एनालिसिस विंग (रॉ) के बीच नौकरशाही के जाल में फंस गया था. ये तीनों एजेंसियां राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के मातहत होती हैं. अधिकारियों ने बताया कि इसीलिए अब जो योजना बनाई जा रही है उसके तहत जेलों के भीतर ऐसे केंद्र बनाए जाएंगे जहां विशेषज्ञ दीक्षित कट्टरपंथियों का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण और मूल्यांकन करेंगे.

गुप्तचर एजेंसियों की एक दिक्कत यह है कि जोखिम उठाने और किसी जिहादी को बढऩे देने के बीच की विभाजक रेखा बहुत पतली है. इंडियन मुजाहिदीन के पहले मॉडयूल को उजागर करने वाले दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल के पूर्व मुखिया करनल सिंह कहते हैं, “हम नहीं जानते कि संलिप्त लोग किस हद तक जा चुके हैं या जाने के इच्छुक हैं. इसलिए ऐसी पहल (काउंटर और डी-रेडिकलाइजेशन) भविष्य में जांचकर्ताओं के लिए एक औजार बन सकती है.”

इस रणनीति की आलोचनाएं भी मौजूद हैं. यहां तक कि वरिष्ठ आइबी अधिकारियों के साथ-साथ गुप्तचर एजेंसियों के भीतर भी कई लोगों का मानना है कि ऐसे कार्यक्रमों से अल्पसंख्यक खुद को और ज्यादा अलग-थलग महसूस कर सकते हैं. इसके अलावा, आलोचकों का कहना है कि कोई भी फूलप्रूफ काउंटर-रेडिकलाइजेशन प्रोग्राम नहीं होता. वे दिसंबर में ऑस्ट्रेलिया के सिडनी बंधक कांड के आरोपी मैन होरिन मोनिस का हवाला देते हैं जो स्वयंभू प्रचारक था. वह ऑस्ट्रेलिया में इस किस्म की एक ऐंटी-रेडिकलाइजेशन पहल का हिस्सा भी रहा था. जाहिर है, कार्यक्रम उसके भीतर के कट्टर तत्वों को बाहर निकाल पाने में नाकाम रहा. इसके बावजूद एक तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता है कि कट्टर विचार, सिद्धांत और उपदेश ऑनलाइन बड़ी आसानी से उपलब्ध हैं. दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल के विशेष आयुक्त एस.एन. श्रीवास्तव कहते हैं, “सोशल मीडिया ने उन्हें अपने कट्टर विचारों को जाहिर करने और प्रचारित करने का काफी बड़ा अवसर दिया है.”

तकनीक के जानकार जिहादी अच्छे से जानते हैं कि अपने पक्ष में इंटरनेट का अधिकतम इस्तेमाल किस तरह किया जा सकता है. उन्हीं में एक तरीका प्रॉक्सी सर्वर के इस्तेमाल का भी है. आइबी के पूर्व विशेष निदेशक राजेंद्र कुमार बताते हैं, “आप एक ट्विटर खाता बंद कर दीजिए, वे दूसरा खोल लेंगे.” तकनीक की जानकारी को छोड़ दें तो किसी आतंकी मॉडयूल को उजागर करने के बाद भी हमारी इंटेलिजेंस एजेंसियां प्रायः खाली हाथ ही रह जाती हैं. इस क्षेत्र में हुए कम शोध और सामग्री के अभाव में उनके पास कुल मिलाकर संदिग्धों की काउंसलिंग करने के लिए मनोविश्लेषक ही बचते हैं. मसलन उनके पास अल कायदा का प्रचार करने वाली पत्रिका अजान की काट नहीं है. नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (एनआइए) के एक अधिकारी कहते हैं, “लेकिन ये लोग कट्टरता में जबरदस्त ढंग से दक्ष होते हैं. जब आइएम का यासीन भटकल पकड़ा गया था तब हमने उसकी काउंसलिंग की कोशिश की थी लेकिन हम असफल रहे थे.”

जिहादी प्रचार की मुखालफत करने के लिए दिल्ली से एक वेबसाइट चलाने वाले सुलतान शाहीन बताते हैं कि उनकी साइट को पाकिस्तान में प्रतिबंधित कर दिया गया है. कुछ दूसरे देशों में हालांकि जहां ऐसे कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं, वहां से सबक लेने की जरूरत है. वे कहते हैं, “डी-रेडिकलाइजेशन प्रोग्राम भले बहुत कामयाब न हो, लेकिन भारत के परिप्रेक्ष्य में काउंटर-रेडिकलाइजेशन मददगार हो सकता है.”

एनआइए के मुखिया शरद कुमार कहते हैं, “ऐसे युवा बड़ी आसानी से इंटरनेट पर फंसा लिए जाते हैं. एक बार ये कट्टर बन गए तो फिर कहीं भी खतरा पैदा कर सकते हैं-भारत में, चाहे बाहर. हमें इनकी जड़ पर ही हमला करना होगा.”
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