उसका वजन बहुत ज्यादा यानी करीब 120 किलो था और पढ़ाई में औसत थी. मां-बाप अपने काम-धंधे में व्यस्त रहते हुए हमेशा उसे वजन घटाने को कहते रहते थे. दिल्ली के एक स्कूल में 11वीं क्लास की यह छात्रा अपनी पढ़ाई और मां-बाप से दिन-रात मिलती झिड़कियों से उकता चुकी थी. स्कूल में भी वह सबसे अलग-थलग और कटी हुई रहती थी. शुरू में फेसबुक और इंस्टाग्राम ने उसका मन लगाए रखा, लेकिन जल्दी ही उनसे भी मन भर गया. ऑनलाइन दुनिया में और गहराई से गोते लगाते हुए उसने एक अलग ई-मेल आइडी के साथ अपनी मनपंसद सोशल मीडिया साइट पर अलग एकाउंट खोल लिए, अपनी संवारी हुई तस्वीर अपलोड की और अजनबियों से चैटिंग शुरू कर दी.
इंटरनेट के अलग ब्रह्मांड में वह बेहद लोकप्रिय हो गई. अब कॉलेज के पहले साल में उसके चार बॉयफ्रेंड हैं. ये चारों विवाहित पुरुष उसे ऑनलाइन मिले. वह अपने बॉयफ्रेंड्स के साथ फोरप्ले (संभोग से पहले की मस्ती) पर बात करती है. वह उनसे शारीरिक संबंध बनाने की क्रिया के बारे में पूरी जानकारी लेती है और उन सारे विवरणों को सुनकर हस्तमैथुन करती है. अब उसका अंतर्मन कुछ हद तक संतुष्ट हो रहा है. उसे दूसरों से स्वीकृति चाहिए थी. उसके बॉयफ्रेंड उसके सेक्सी अवतार को स्वीकृति दे रहे थे. उन्हें उसकी असलियत जानने की जरूरत नहीं थी. असल जिंदगी में वह अब भी अकेली थी.
किशोरों की रहस्यमय दुनिया और उनकी ऑनलाइन आदतों पर सरसरी नजर डालते ही उनकी उम्मीदों और सपनों, भय और आशंकाओं, आकांक्षाओं और असुरक्षाओं का इंटरनेट पर खुला खेल दिखाई देता है. इंडिया टुडे ने जिन बहुत से किशोरों से बात की, उन्होंने स्वीकृति पाने की अनकही आवश्यकता को धता बताया. उनकी कहानियों में एक अजीब किस्म की करुणा है. उनके ऑनलाइन सेक्स प्रयोगों की कथाओं का भी यही हाल है.
अनेक किशोरों के लिए इंटरनेट प्रयोग करने और अनजान दुनिया को टटोलने की प्रयोगशाला है. आज टेक्नोलॉजी हमारे जीवन के हर पहलू पर हावी है, टिंडर, हाइक, मैच.कॉम, प्लेंटी ऑफ फिश, ओकेक्युपिड जैसे अनेक डेटिंग ऐप और व्हाट्सऐप तथा वाइबर जैसे चौटिंग और विडियो शेयरिंग ऐप मुफ्त उपलब्ध हैं. सैन डिएगो यूनिवर्सिटी में कम्युनिकेशन स्टडीज की प्रोफेसर सुजैना स्टर्न का कहना है, ‘‘इंटरनेट और मोबाइल मीडिया सहित टेक्नोलॉजी बहुत से किशोरों की दैनिक जिंदगी का हिस्सा है. इसलिए यह स्वाभाविक है कि टेक्नोलॉजी के सहारे वे सेक्सुअलिटी की दुनिया को टटोलते हैं.’’
स्नैपचैट ऐसी पिक्चर शेयरिंग मोबाइल ऐप है, जो आप के भेजे संदेश/तस्वीर को प्राप्त करने वाले के देखने के दस सेकंड के भीतर मिटा देता है. ऐसे मोबाइल ऐप्स ने सेक्सटिंग या मोबाइल और/या सोशल मीडिया के जरिए सेक्स से जुड़ी तस्वीरें/ बातें भेजना आसान कर दिया है और इनमें जोखिम भी कम है (वैसे एक और ऐप स्नैपसेव से आप स्नैपचैट की तस्वीरें सेव कर सकते हैं). नोएडा में एमिटी यूनिवर्सिटी में पढऩे वाले अर्णव (बदला हुआ नाम) जैसे कुछ किशोरों के लिए यह और भी कूल है. उनका कहना है कि गर्लफ्रेंड के साथ सेक्सटिंग करना खुद को ‘‘खतरनाक और सेक्सी’’ दिखाने का तरीका है. आज अधिकतर किशोर ये दोनों गुण पाना चाहते हैं.
लेकिन बहुत कम इसकी खामियां देख पाते हैं. खासकर जब वे अजनबियों की बजाए जानकारों के साथ व्यवहार कर रहे होते हैं. अपने बॉयफ्रेंड के 16वें जन्मदिन पर अनीता (बदला हुआ नाम) ने उसे सरप्राइज उपहार के रूप में अपनी नग्न तस्वीरें भेजने का फैसला किया. तस्वीरें पाकर वह बेहद खुश हुआ, लेकिन कुछ महीने बाद दोनों की दोस्ती टूट गई. चोट खाए दिल में बदला लेने और उसे वापस पाने की आग जलने लगी. दिल्ली के एक प्रतिष्ठित स्कूल के 10वीं क्लास के इस छात्र के हाथ में अचानक एक जबरदस्त हथियार लग गया-वे तस्वीरें उसने अपने फोन से मिटाई नहीं थीं. अब वह इन तस्वीरों से उसे ब्लैकमेल करना चाहता है.
तो क्या किशोर भी जानते हैं कि वे किन खतरों से खेल रहे हैं? क्या अनीता जानती है कि उसका बॉयफ्रेंड उसकी तस्वीरों से उसे ब्लैकमेल कर सकता है? क्या वह लड़का जानता है कि अगर उसके पास न्यूड तस्वीरें मिल गईं तो उसे भारतीय कानून के अनुसार दोषी ठहराया जा सकता है? शायद यहीं माता-पिता की भूमिका शुरू होती है. दिल्ली में काउंसलिंग साइकोलॉजिस्ट गीतांजलि कुमार के अनुसार, ‘‘माता-पिता को इस बात से हैरान नहीं होना चाहिए कि किशोर सेक्सटिंग करते हैं, बल्कि किशोर के सेक्सटिंग में लिप्त होने से पहले ही वे इसकी चाहत और संभावित नतीजों के बारे में उसके साथ सार्थक चर्चा कर सकते हैं.’’ इंस्टीट्यूट फॉर रिस्पॉन्सिबल ऑनलाइन ऐंड सेलफोन कम्युनिकेशन के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर रिचर्ड ग्वेरी के अनुसार, ‘‘असल बात यह है कि जिम्मेदार होने और ऐसा कुछ न करने जो सार्वजनिक या स्थायी होने के लायक नहीं है, के बारे में निरंतर संवाद होना चाहिए.’’
भारत में अपने बच्चों के साथ सेक्स के बारे में बात करना आज भी अजीब माना जाता है, तो माता-पिता इस नए सांस्कृतिक धरातल पर कदम कैसे बढ़ाएं? दिल्ली की रहने वाली 14 साल के बेटे की मां शालिनी सेठ कहती हैं कि वे बेटे को खुद ही इस बारे में खोजबीन करने देंगी. उनका सवाल है, ‘‘यह अजीब नहीं लगेगा क्या? मैं उससे इस बारे में बात नहीं कर सकती.’’ लेकिन दिल्ली पब्लिक स्कूल, आर.के. पुरम में पढ़ाने वाली एक किशोर बेटे की मां सोहिनी चक्रवर्ती ने उस पर नजर रखने के अप्रत्यक्ष तरीके निकाल लिए हैं. बेटा जो कंप्यूटर इस्तेमाल करता है, वे एक बार उसकी इंटरनेट हिस्ट्री टटोलकर देख लेती हैं कि वह सही रास्ते पर है या नहीं.
स्टर्न का कहना है कि सेक्सुअलिटी के बारे में बात करना अजीब हो सकता है, ‘‘लेकिन क्योंकि हम सब मानते हैं कि वह अजीब होगा. माता-पिता बच्चों के जीवन में जितनी जल्दी सेक्सुअलिटी के बारे में बात करने लगेंगे, बच्चे के बड़े होने के दौरान यह बातचीत उतनी ही अधिक सहज और कम अजीब लगेगी.’’ स्टर्न का मानना है, ‘‘रिसर्च से पता चला है कि सेक्स के बारे में बात करने का मतलब यह नहीं है कि किशोरों के सेक्स में लिप्त होने की संभावना बढ़ जाती है, बल्कि उन्हें अपने साथियों और मीडिया की बजाए अधिक सार्थक और सटीक सूचना मिल पाती है.’’
सीबीएसई के काउंसलर और साइकोलॉजिस्ट नवीन कुमार के अनुसार, ‘‘अगर पांच साल पहले की बात होती तो हम घर में इंटरनेट कनेक्शन कटवा देते. अब स्मार्टफोन के युग में हमें इस समस्या को संभालना सीखना होगा. मेरे ख्याल से हमें इसके बारे में अब बड़ा और समझदार हो जाना चाहिए.’’
इस बीच, यह सच है कि वह मोटी लड़की अब भी ऑनलाइन होगी और अपने वैकल्पिक ब्रह्मांड में राहत टटोल रही होगी.
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सेक्स के बारे में बात करने में माता-पिता की आनाकानी की वजह से स्मार्ट फोन के इस युग में इंटरनेट किशोरों के लिए सेक्स की दुनिया टटोलने का एक प्रमुख माध्यम हो गया है.

अपडेटेड 13 जनवरी , 2015
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